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अमिताभ बच्चन से बड़ा हिन्दी सेवी कौन

30/09/2019

आर.के. सिन्हा

मिताभ बच्चन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाना सच में सुखद समाचार है। वे आधी सदी से हिन्दी फिल्मों में सक्रिय रहकर हिन्दी को गैर-हिन्दीभाषी क्षेत्रों में लेकर जाने में अभूतपूर्व रूप से सफल रहे हैं। दक्षिण भारत से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक के गैर-हिन्दीभाषी लोग भी उनकी जंजीर, कालिया, दीवार, शोले, मर्द जैसी दर्जनों लोकप्रिय फिल्मों के संवाद अक्सर सुना देते हैं। इस लिहाज से वे लता मंगेशकर जी की ही श्रेणी में रखे जा सकते हैं। लता जी को भी सारा देश जानता और सम्मान करता है। उनके गाए गीतों को गुनगुनाता रहता है। यह सच है कि अमिताभ बच्चन  का जन्म साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले ही एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उसका उन्हें लाभ भी मिला। पर, यह भी उतना ही बड़ा सच है कि उन्होंने अपनी फ़िल्मी भाषा को सदैव स्तरीय और सुसंस्कृत ही रखा। उन्होंने इस मोर्चे पर भी कठिन परिश्रम किया। वे एक महान अभिनेता हैं। वे कालजयी हो चुके हैं। उन्होंने अभिनय के दम पर ही शीर्ष को छू लिया है। उन्होंने आम आदमी को वह दे दिया जो वह चाहता था। व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा लेकर जीना किसे कहते हैं, यह हमने 'त्रिशूल' और 'काला पत्थर' में देखा। एक पोशीदा प्रेमी कैसा होता है, यह हमने 'मुकद्दर का सिकंदर' में देखा। शराबी किरदार की एक अलग व्याख्या ही 'शराबी' में है। उनकी फिल्मों पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन मैं यहां अमिताभ बच्चन और हिन्दी पर ही अपनी बात सीमित रखना चाहता हूं।
 हालांकि अमिताभ बच्चन की शिक्षा शेरवुड जैसे अंग्रेजीदा स्कूल में हुई पर उन्होंने अपनी हिन्दी के स्तर पर कभी कोई समझौता नहीं किया। आप जानते ही हैं कि अनेक साहित्यिक परिवारों से संबंध ऱखने वाले बच्चे भी अंग्रेजी परिवेश में जाने-रहने के बाद हिन्दी से दूर हो जाते हैं। पर, अमिताभ बच्चन का हिन्दी के साथ प्रगाढ़ संबंध सदा बना रहा।
अमिताभ बच्चन को यदि किसी कार्यक्रम में सुन लें तो समझ में आ जाएगा कि वे अपनी भाषा को लेकर कितना गंभीर रहते हैं। वे कभी हल्की और दोयम दर्जे की भाषा नहीं बोलते। जबकि उनके समकालीन और मौजूदा सितारों को लीजिए तो पायेंगे कि अधिकांश कायदे से दो वाक्य भी हिन्दी के सही प्रकार से नहीं बोल पाते। वे बीच-बीच में अंग्रेजी के शब्दों से लेकर अपने वाक्य पूरे करने की कोशिश में लगे रहते हैं। संभव है कि वे किसी को प्रभावित करने के लिए अंग्रेजी बोलते हों। इस लिहाज से राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, धर्मेन्द्र से लेकर अनिल कपूर, सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान को भी ले सकते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि इन्होंने अपने जीवन में कभी एक चिट्ठी भी हिन्दी में नहीं लिखी होगी। यानी जिस हिन्दी से इन्हें दौलत-शोहरत सबकुछ मिल रही है, उसके प्रति ही ये निष्ठावान नहीं हैं। कुछ समय पहले राज्यसभा टीवी के एक साक्षात्कार में एक नामवर बॉलीवुड एक्टर गर्व के साथ कह रहे थे कि उन्हें सिर्फ बंबईया हिन्दी आती है। उनका साक्षात्कार देख-सुनकर लगा कि ये शख्स तो सच में सड़क छाप हैं। खैर, अमिताभ बच्चन जब हिन्दी बोलते हैं तो फिर हिन्दी ही बोलते हैं। वैसे वे अंग्रेजी भी स्तरीय ही बोलते हैं। पर, वे खिचड़ी भाषा के प्रयोग से बचते हैं। यही होना भी चाहिए। वे 'कौन बनेगा करोड़पति' कार्यक्रम में मानक हिन्दी बोलते हैं। उनके हर शब्द का उच्चारण कभी भ्रष्ट नहीं होता। भाषा पर इस तरह का महारत हासिल करने के लिए निरंतर अभ्यास करना होता है। यह सब उन्होंने करके एक बड़ी लकीर खींच दी है। बेशक, कुछ स्तरों पर अमिताभ बच्चन भाग्यशाली भी रहे हैं। उन्हें कई संस्कृतियों को करीब से जानने का अवसर मिला है। उनकी मां तेजी बच्चन जी पंजाबी थीं, पत्नी जया बच्चन बंगाली हैं और बहू कन्नड़ हैं। जाहिर है कि उनका परिवार समावेशी रहा है। इसके चलते भी उनकी शख्सियत समृद्ध हुई है। पर, आपको आजकल इस तरह के बहुत से परिवार मिल जाते हैं, जहां पर कई प्रदेशों का मिलन हो रहा होता है। लेकिन कष्ट यह देखकर होता है कि इस तरह के परिवारों में हिन्दी या किसी भारतीय भाषा को सही से जानने की कहीं कोई जिज्ञासा ही नहीं होती। इस बीच, हर साल देश के हिन्दीभाषी राज्यों में सक्रिय हिन्दी अकादमियां उन लोगों को पुरस्कृत और सम्मानित करती हैं, जो हिन्दी के प्रसार-प्रचार में लगे होते हैं। समझ में नहीं आता कि इन्हें अमिताभ बच्चन या बॉलीवुड के किसी अन्य कलाकार, गीतकार, पटकथा लेखक आदि को हिन्दी सेवी सम्मान देने में क्यों परहेज होता है? क्या हिन्दी सेवी वही होगा जो कोई उपन्यास, कहानी संग्रह या कविता संग्रह लिखेगा? भले ही वह खुद ही लिखे और खुद ही पढ़े किसे नहीं पता कि आज के हिन्दी समाज के बड़े लेखकों की किसी किताब की एक हजार प्रतियां भी मुश्किल से छपती हैं और शायद ही सौ-पचास बिकती हैं। इसके बावजूद वे महान हिन्दी सेवी माने जाते हैं। 
मुझे याद है कि कुछ साल पहले अमिताभ बच्चन को भोपाल में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में आमंत्रित करने का कुछ हिन्दी समाज के कथित बड़े हस्ताक्षरों ने विरोध किया था। उनका तर्क था कि अमिताभ बच्चन ने हिन्दी की कोई सेवा ही नहीं की। अमिताभ बच्चन ने उस सम्मेलन में अंतिम समय में स्वास्थ्य कारणों के चलते आने में असमर्थता व्यक्त कर दी थी। पर अमिताभ बच्चन का विरोध करने वाले हिन्दी के महान सेवियों ने सिद्ध कर दिया कि वे कितने आत्म मुग्ध हैं या आत्म ग्लानि से ग्रसित हैं। उन्हें लगता है कि हिन्दी की दुनिया उनसे शुरू होकर उन्हीं पर समाप्त हो जाती है। हालांकि मैंने विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में प्रस्तुत अपने व्याख्यान में हिन्दी फिल्मों के योगदान पर पूरा प्रकाश डाला था।
खैर, अमिताभ बच्चन सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं हैं। वे अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्र, जॉर्डन, सउदी अरब, मलेशिया समेत समूचे अफ्रीका आदि में भरपूर पसंद किए जाते हैं। वे उन सभी देशों में भी पसंद किए जाते हैं, जहां पर भारतीय मूल के लोग बसे हुए हैं। ये सब हिन्दी फिल्मों के सच्चे दर्शक हैं। अमिताभ बच्चन को  फाल्के सम्मान मिलने से देखा जाए तो इस पुरस्कार का सम्मान हुआ है। उनके समक्ष दादा साहब फाल्के  पुरस्कार बौना है। वे एक स्कूल हैं। हिन्दी सिनेमा संसार के अब तक के इतिहास में उनसे सशक्त और सभ्रांत अभिनेता और कोई नहीं हुआ है।
(लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं।) 


 
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