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राहुल गांधी : यह त्यागपत्र है या पलायन

06/07/2019

सुरेश हिन्दुस्थानी
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की किरकिरी के बाद राहुल गांधी ने एक प्रकार से यह प्रमाणित कर दिया है कि वह बदले हुए हालात में कांग्रेस का कायाकल्प करने के लिये स्वयं को अक्षम समझ रहे हैं। राहुल गांधी के त्यागपत्र के कदम को बहुत हद तक पलायनवादी की उपमा भी दी जा सकती है। मात्र 52 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस पार्टी की हालत कमोबेश उसी प्रकार की हो गई है, जिसे कांग्रेसियों द्वारा न स्वीकारते बन रहा है और न ही अस्वीकार करने की स्थिति में है। वास्तव में एक अच्छे राजनेता की निशानी यही होती है कि वह कांग्रेस में उपस्थित हुई चुनौती को स्वीकार करते हुए उत्थान के लिए नवीन प्रयास करते, लेकिन ऐसा न हो सका और कांग्रेस को बेसहारा करके पलायन कर गए।
राहुल गांधी के त्यागपत्र वाले कदम की यूं तो हर तरफ आलोचना हो रही है क्योंकि उन्हें कांग्रेस के समक्ष उत्पन्न स्थिति का सामना करना चाहिए था लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके। दूसरा सबसे बड़ा डर था कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की हालत क्या होगी? इस पर भी राजनीतिक मंथन होने लगा है। क्योंकि कांग्रेस में यह एक आम धारणा सी बन गई है कि कांग्रेस का अध्यक्ष केवल और केवल गांधी परिवार से ही होना चाहिए। कांग्रेस के बारे में यह पूरा देश जानता है कि कांग्रेस गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को पूरी कमान कभी नहीं दे सकती। अगर कांग्रेस नया अध्यक्ष बनाती भी है तो यह स्वाभाविक है कि वह अध्यक्ष नाम मात्र का ही होगा। इसके बाद भी पूरी राजनीति राहुल गांधी ही करेंगे।
लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की जो स्थिति बनी है, उसके बारे में सीधे शब्दों में कहा जाए तो यही कहना समुचित होगा कि देश ने गांधी परिवार के नेतृत्व को नकार दिया है। इस बात को कांग्रेस के कई नेता दबे स्वर में स्वीकार भी कर रहे हैं लेकिन कांग्रेस की मजबूरी यह है कि वह इस परिवार के बिना चल ही नहीं सकती। ऐसे में सवाल यह नहीं कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा, बल्कि सवाल यह है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का क्या होगा? अभी हाल ही में कर्नाटक के एक मंत्री शिवकुमार ने कहा भी है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस संगठित नहीं रह सकती। कांग्रेस के बारे में यह सभी जानते हैं कि पार्टी में हर किसी के अपने-अपने गुट हैं।
यह स्वाभाविक ही है कि कांग्रेस की शर्मनाक हार का ठीकरा निश्चित रूप से कांग्रेस मुखिया होने के नाते राहुल गांधी पर ही फोड़ा जाता लेकिन पहले त्यागपत्र की भूमिका तैयार करना और अब त्यागपत्र को सार्वजनिक करना यही प्रतिपादित करता है कि शायद राहुल गांधी ने अपनी क्षमताओं का आत्म विश्लेषण कर लिया है। कांग्रेस का अध्यक्ष पद का परित्याग करने वाले राहुल गांधी के बाद अब अध्यक्ष पद पर कौन विराजमान होगा, इसपर सबकी निगाहें केंद्रित हो गई हैं। कांग्रेस ही नहीं, देश के अन्य राजनीतिक दल भी टकटकी लगाए हैं। हालांकि विश्लेषण किया जाए तो यही दृष्टिगोचर होता है कि अध्यक्ष जो भी बने, उसके लिये यह पूरा ध्यान रखा जाएगा कि वह गांधी परिवार के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान हो, क्योंकि कांग्रेस वह समय भूली नहीं होगी जब कांग्रेस की कमान सीताराम केसरी और नरसिंह राव के हाथ में रही। उस समय कांग्रेस में ऐसी स्थिति निर्मित होती दिखाई देने लगी थी कि मानो कांग्रेस गांधी परिवार से कोसों दूर हो गई हो। मात्र इसी कारण इन दोनों वरिष्ठ नेताओं की कांग्रेस में समान रूप से स्वीकारोक्ति नहीं है। कांग्रेस के सारे नेताओं पर केवल गांधी और नेहरू परिवार के प्रति भक्ति का ही अवलम्बन है।
कांग्रेस के कई राजनेता आज भी यही मानते हैं कि दस जनपथ की परिक्रमा करने का परिणाम अच्छा ही मिलता है। यह कई अवसरों पर सिद्ध भी हो चुका है। यहां तक कि जिसने भी गांधी परिवार को निशाने पर लिया, वह खुद ही निशाने पर आ गया। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मात्र इसी कारण उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। जयराम रमेश तो अपना दर्द भी व्यक्त कर चुके हैं। उनके कहने का आशय शायद यही था कि अब कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं का समय निकल गया है। हो सकता है कि वरिष्ठों की यही उपेक्षा कांग्रेस की अप्रत्याशित पराजय का कारण हो।
राहुल गांधी का त्यागपत्र होने के बाद अब यह लगभग तय हो चुका है कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर का होगा। इसके लिये अभीतक जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें महाराष्ट्र के कद्दावर नेता सुशील कुमार शिन्दे, राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलौत, उपमुख्यमन्त्री सचिन पायलट के नाम शामिल हैं। हालांकि यह कोई अधिकृत खबर नहीं है। क्योंकि इस पंक्ति में दबी जुबान से यह स्वर भी मुखरित हो रहे हैं कि इस पद पर ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हो सकते हैं। इस बात को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस में सिंधिया के राजनीतिक कद में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं आई है। वे आज भी राहुल गांधी की पसंद हैं। खैर, अब कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिये किसके नाम पर मुहर लगती है, इसका इन्तजार है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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