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यूपी पुलिस को तोहफा

14/01/2020

सियाराम पांडेय 'शांत'
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पुलिस को नए साल का तोहफा दे दिया है। 43 साल से उत्तर प्रदेश की पुलिस प्रणाली में बदलाव की मांग हो रही थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव स्वीकृत होने के साथ ही उत्तर प्रदेश में पहली बार पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो गया है। सुजीत पांडेय लखनऊ और आलोक सिंह गौतमबुद्धनगर के पुलिस कमिश्नर बना दिए गए हैं। पुलिस की यह मांग बहुत पुरानी थी लेकिन आईएएस लॉबी के दबाव में कोई भी सरकार इसपर ठोस निर्णय नहीं ले पाई। आईएएस लॉबी को डर था कि उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से उसका एकाधिकार खतरे में पड़ जाएगा।
मायावती और अखिलेश सरकार में भी पुलिस कमिश्नर बनाने की मांग उठी थी लेकिन यह राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ठंडे बस्ते में चली गई थी। कांग्रेस के मुख्यमंत्री भी इसे लेकर उदासीन रहे। जाहिर तौर पर आईएएस लॉबी के दबाव में ही ऐसा कुछ हुआ होगा लेकिन योगी सरकार में जो निर्णय हुआ है, उससे पूरा पुलिस महकमा खुश है। कई राज्यों के पुलिस महानिदेशकों ने अगर यूपी के डीजीपी ओमप्रकाश सिंह को बधाई दी है तो इससे उनकी खुशी को समझा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की मांग 1977 से चली आ रही है। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह मामला तब से आज तक लटका हुआ था। बकौल मुख्यमंत्री उनकी कैबिनेट ने पुलिस कमिश्नर को कुछ न्यायिक शक्तियां भी दी हैं।
भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 व दंड प्रक्रिया संहिता 1973 कहती है कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की जा सकती है। इस लिहाज से देखा जाए तो यह निर्णय बहुत पहले हो जाना चाहिए था। उत्तर प्रदेश में अभी केवल दो जिलों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुई है। देर-सवेर इस संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है। लखनऊ और गौतमबुद्धनगर में सीआरपीसी की धारा 107-16, धारा 144, 109, 110, 145 के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी अब पुलिस को मिल गई है। 145 सीआरपीसी के तहत कुर्की आदि की कार्रवाई, शस्त्र लाइसेंस जारी करने का अधिकार भी जिलाधिकारी के पास थे। आर्म्स एक्ट में कार्रवाई, गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट और एनएसए लगाने का अधिकार भी डीएम के पास था। अभीतक की व्यवस्था में ज्यादातर मामलों में पुलिस से रिपोर्ट ली जाती थी लेकिन फाइनल अथॉरिटी जिलाधिकारी के पास ही होती थी।
भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के सेक्शन 4 के तहत जिलाधिकारी के पास पुलिस पर नियत्रंण करने के अधिकार होते थे। दण्ड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), एक्जीक्युटिव पुलिस अधिकारी कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नहीं थे, वे आकस्मिक परिस्थितियों में डीएम या कमिश्नर या फिर शासन के आदेश के तहत ही कार्य करते थे, लेकिन पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो जाने से जिलाधिकारी और एक्जीक्युटिव मजिस्ट्रेट के ये अधिकार पुलिस अधिकारियों को मिल गए हैं। आमतौर से आईपीसी और सीआरपीसी के सभी अधिकार जिले का डीएम वहां तैनात पीसीएस अधिकारियों को दे देता था। सवाल है कि अगर मुख्यधारा में बैठे आईएएस और पीसीएस अधिकारी पुलिस को सहयोग बंद कर देंगे तो उत्तर प्रदेश में लागू की जा रही इस व्यवस्था का क्या होगा? लखनऊ और नोएडा जिले में पिछले कुछ दिनों से एसएसपी का पद खाली रखा गया था। नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण निलंबित कर दिए गए थे जबकि लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी गाजियाबाद स्थानान्तरित कर दिए गए थे।
मायावती ने योगी सरकार पर तंज कसा है कि उत्तर प्रदेश में केवल कुछ जगह पुलिस व्यवस्था बदलने से नहीं बल्कि आपराधिक तत्वों के विरुद्ध दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सख़्त कानूनी कार्रवाई करने से ही प्रदेश की बदहाल कानून-व्यवस्था में सुधार आ सकता है। भले ही उनकी यह टिप्पणी खिसियाहट भरी हो लेकिन इसमें कुछ हद तक सच्चाई भी है। व्यवस्था बदलने और नाम बदलने भर से बात नहीं बनती। कानून व्यवस्था में सुधार तो इस बात पर निर्भर करता है कि नवसृजित पद पर कौन बैठा है और वह त्वरित निर्णय ले पाने में कितना सक्षम है? सरकार ने अपना काम कर दिया है। कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने का काम पुलिस कमिश्नर को करना है। अब पुलिस के पास अपनी विफलता के लिए कोई बहाना बचा नहीं है। राज्य पुलिस अधिकारियों के पास ज्यादा शक्ति आ गई है तो उनकी जवाबदेही भी बढ़ेगी। जब भी सड़कों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन होते थे तो कार्रवाई के लिए पुलिस अधिकारियों को डीएम से अनुमति लेनी पड़ती थी। कभी-कभी ऐसा होता है कि जबतक डीएम अनुमति देते थे, मामला कंट्रोल से बाहर हो जाता था। कमिश्नर प्रणाली में अब पुलिस को त्वरित कार्रवाई और फैसले लेने की स्वतंत्रता होगी। इससे लॉ एंड ऑर्डर को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
इसमें संदेह नहीं कि देश के 15 राज्यों के 71 जनपदों में यह व्यवस्था बहुत पहले ही बड़ी सफलतापूर्वक चल रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में पता नहीं क्यों, इसे आज तक रोका गया। पुलिस महानिदेशक के इस तरह के सवाल ध्यान खींचते हैं लेकिन अब सरकार ने उन्हें खेलने का पूरा मौका दे दिया है। इससे यूपी पुलिस खासकर नोएडा और लखनऊ की पुलिस कितना बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी, यह देखने वाली बात होगी। योगी सरकार ने पुलिस कमिश्नरों को ताकतवर बनाने में भी कोई कोर कसर शेष नहीं रखी है। लखनऊ पुलिस कमिश्नरी के लिए 56 और गौतमबुद्धनगर पुलिस कमिश्नरी के लिए 38 पुलिस उच्चाधिकारी देकर उन्होंने एक तरह से इस बात का स्पष्ट संकेत दे दिया है कि उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त बनाने में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं होगी।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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