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भय बिनु होई न प्रीति

04/07/2019

भय बिनु होई न प्रीति

युगवार्ता डेस्क

‘भय बिनु होई न प्रीति’। रामचरितमानस के चौपाई का यह अर्धाली इन दिनों जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों पर अक्षरश: चरितार्थ हो रही है। यह इस बात को प्रमाणित करती है कि जब सीधी अंगुली से घी नहीं निकले तो अंगुली को टेढ़ी कर लेनी चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ है कि अगर मान-मनुहार से बात न बनती हो तो फिर सख्ती जरूरी है। यही किया है मोदी सरकार ने। इसका सुखद नतीजा भी निकला है। जिस जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री या किसी राष्ट्रीय स्तर के मंत्री, अधिकारी अथवा केंद्र सरकार के किसी भी प्रतिनिधि के दौरे में अलगाववादी समूह घाटी में बंद बुलाते रहे हैं। यह निश्चय ही अचंभित करने वाला वाकया है कि गृहमंत्री बनने के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर के दो दिवसीय दौरे पर गये अमित शाह के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

वर्ष 1989 में कश्मीर में आतंकी हिंसा का दौर शुरू होने के साथ ही जब भी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, गृह मंत्री समेत किसी भी प्रमुख राष्ट्रीय नेता का कश्मीर में आना हुआ तो अलगाववादियों और आतंकियों ने हमेशा दौरों का बहिष्कार कर बंद का ऐलान किया। इस दौरान कμर्यू जैसी स्थिति रहती थी। इसी साल तीन फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब घाटी का दौरा किया था, उस वक्त गिलानी, मीरवाइज और जेकेएलएफ चीफ यासीन मलिक की अगुआई वाले संगठन संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व (जेआरएल) ने घाटी में पूर्ण बंद बुलाया था। यही नहीं 10 सितंबर, 2017 को जब तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर का दौरा किया, तब भी जेआरएल ने घाटी में बंद रखा था। यह सिलसिला पिछले तीस वर्षों से अनवरत जारी था। लेकिन अमित शाह की इस यात्रा के दौरान सभी अलगाववादी संगठनों ने चुप्पी साधे रखी। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में इसमें बदलाव देखने को मिला है।
गृह मंत्री के रूप में शाह के दौरे की खास बात यह रही कि किसी भी अलगाववादी संगठन की तरफ से कोई बंद नहीं बुलाया गया। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सैयद अली शाह गिलानी हों या मीरवाइज उमर फारूक, किसी भी धड़े की ओर से बंद की अपील नहीं की गई। यही नहीं किसी भी अलगाववादी नेता ने इस संबंध में कोई बयान भी नहीं जारी किया। यहां तक कि लोगों से जुलूस निकालने तक के लिए नहीं कहा। उल्लेखनीय है कि बतौर गृह मंत्री शाह का यह पहला दौरा था। कश्मीर घाटी में आतंकवाद के तीन दशकों के बीच ऐसा पहली बार हुआ है कि अलगाववादी संगठनों ने किसी गृह मंत्री के दौरे के वक्त बंद की अपील नहीं की। इससे पहले वे बंद बुलाकर अपना विरोध दर्ज कराते रहे हैं। गृह मंत्री बनने के बाद अपने पहले दौरे के तहत राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर पहुंचे शाह ने सुरक्षा और विकास से जुड़ी परियोजनाओं के सिलसिले में कई बैठकों की अध्यक्षता की। सुरक्षा के मुद्दे पर एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान शाह ने सभी एजेंसियों से आतंकियों और उपद्रवियों के खिलाफ कोई मुरव्वत नहीं बरतने का निर्देश दिया। उल्लेखनीय है कि आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार की जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत ही आज कई अलगाववादी नेता जेल में बंद हैं तो वहीं 919 अलगाववादी नेताओं को दी गई सुरक्षा वापस ली जा चुकी है।

पाकिस्तानी चैनलों जिनमें भारत विरोधी कार्यक्रमों की भरमार होती थी। उस पर मोदी सरकार ने सख्ती से रोक लगाने का साहस दिखाया। इन कड़े फैसलों का ही यह नतीजा है यह बदलाव। भले ही पूरी तरह से न सही लेकिन अलगाववादियों के बदले सुर बता रहे हैं कि मोदी सरकार की नीतियां सही दिशा में है। इसे ‘मोदी इफेक्ट’ भी कह सकते हैं कि अलगाववादी पहले जैसा हिमाकत करने से बाज आने को मजबूर हुए हैं। बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन के लिए घाटी के हालात में बदलाव एक अच्छा संकेत कहा जा सकता है।


 
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