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टिड्डियों से फसलों को बचाने की चुनौती

21/02/2020

रमेश ठाकुर
सरहद पार से आने वाली हर चीज हिंदुस्तान के लिए जैसे मुसीबत बन जाती है। पाकिस्तान से हिंदुस्तान पहुंची टिड्डियों ने आतंक मचाया हुआ है। लाखों की तादाद में पहुंची इन टिड्डियों ने बड़े पैमाने पर फसलों को बर्बाद कर दिया। बाॅर्डर से सटे राज्य राजस्थान, पंजाब और गुजरात के कुछ जिलों में पाकिस्तान से आयी टिड्डियों ने उत्पात मचाया हुआ है। इसे पाकिस्तान की साजिश भी नहीं कह सकते क्योंकि वह खुद टिड्डियों से परेशान है। पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत के इलाके में उनकी भी हजारों एकड़ खड़ी फसलों को टिड्डियों ने चौपट कर दिया। पाकिस्तान के कई इलाकों में टिड्डियों की दहशत है। बताते हैं कि नई किस्म की टिड्डियां कुछ ही घंटे में फसलों को चटकर जाती हैं। ये टिड्डियां छह से आठ सेंटीमीटर आकार का कीड़ा है जो हमेशा लाखों-हजारों के समूह में मंडराता है। इनका समूह एक साथ खड़ी फसलों पर हमला करता है। ये टिड्डियां फसलों के लिए बड़ा खतरा बनी हुई हैं।
पाकिस्तान से हमारी तीन राज्यों राजस्थान, पंजाब और गुजरात की सीमाएं मिलती हैं। इन राज्यों में बीते कुछ माह से टिड्डियों का हमला है। खेतों में इस वक्त गेंहूं की फसलें लगी हैं, जिन्हें खासतौर पर नुकसान पहुंचा रही हैं टिड्डियां। किसान अपने फसलों को बचाने के लिए दिन-रात चौबीस घंटे खेतों की रखवाली कर रहे हैं। टिड्डियों को भगाने के लिए कई देशी और आधुनिक तरीके अपनाए जा रहे हैं। महिलाएं ढोल-बर्तन लिए खेतों में खड़ी हैं। आवाज से टिड्डियां कुछ समय के लिए तितर-बितर हो जाती हैं लेकिन जैसे ही आवाज धीमी पड़ती हैं टिड्डियों का झुंड फिर हमलावर हो जाता है। टिड्डियों के आतंक से तीनों राज्यों की सरकारें पेरशान हैं। टिड्डियों को भगाने के लिए पानी की बौछारें करायी जा रही हैं। कीटनाशक स्प्रे भी खेतों में हो रहा है लेकिन समस्या कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है।
टिड्डियों के चलते पाकिस्तान की इमरान खान सरकार की सांसें फूली हुई हैं। तभी तो टिड्डियों के हमले के बाद समूचे पाकिस्तान में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर दिया गया। पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया हुआ है। उनके नेता सीधे तौर पर इमरान को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि ऐसी हुकूमत का क्या फायदा जो टिड्डियों को भी न भगा सके। टिड्डियां कहां से आई, इसकी तह तक इमरान सरकार नहीं पहुंच पा रही है। उनके वैज्ञानिकों का बड़ा दल और कृषि मंत्रालय लगातार खोज में लगा है।
कमोबेश वैसी ही स्थिति कुछ हमारे यहां भी बनी हुई है। राजस्थान सरकार सबसे ज्यादा परेशान है। वहां भी टिड्डियों को लेकर राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। परेशान होकर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार से टिड्डियों से निपटने को लेकर मदद मांगी है। राजस्थान में अभीतक हजारों एकड़ फसलें टिड्डियों के आतंक से चौपट हो चुकी है। आकाश में मंडराती टिड्डियां एकसाथ फसलों पर हमला करती हैं। उन्हें भगाने के दौरान कुछ लोग घायल भी हुए हैं। टिड्डियों ने किसानों पर भी हमला किया है। मधुमक्खी की भांति टिड्डियां इंसानों पर हमलावर हो रही हैं। टिड्डियां इंसानों के सीधे आंखों पर चोट मारती हैं। राजस्थान को पार कर टिड्डियां पंजाब में भी दस्तक दे चुकी हैं। पंजाब में भी टिड्डियों को लेकर सतर्कता शुरू हो गई है। खेतों में ढोल-नगाड़ों का इंतजाम किया हुआ है। टिड्डियों के झुंड को देखते ही किसान तेजी से ढोल बजाने लगते हैं। ढोल की आवाज सुनकर टिड्डियां भाग जाती हैं।
टिड्डियां का हमला बीते साल दिसंबर से है। सबसे पहले इनका आगमन गुजरात से हुआ। वहां दिसंबर महीने में टिड्डियों का पहली बार हमला हुआ था। अनुमान के तौर पर सिर्फ दो जिलों के 25 हजार हेक्टेयर की फसल तबाह होने का आंकड़ा राज्य सरकार ने पेश किया। टिड्डियों के आतंक को देखते हुए गुजरात सरकार ने प्रभावित किसानों को 31 करोड़ रुपये मुआवजे का ऐलान किया।
वैज्ञानिकों की मानें तो इस किस्म की टिड्डियां पांच महीने तक जीवित रहती हैं। इनके अंडों से दो सप्ताह में बच्चे निकल सकते हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र के उपक्रम फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक एक वर्ग किलोमीटर इलाके में आठ करोड़ टिड्डियां हो सकती हैं। एकसाथ चलने वाला टिड्डियों का झुंड एक वर्ग किलोमीटर से लेकर कई हजार वर्ग किलोमीटर तक फैल सकता है। पाकिस्तान से दिसंबर में हिंदुस्तान में जितनी संख्या में टिड्डियां आईं थीं, अब उनसे सौ गुना की वृद्धि हो चुकी है। इनके प्रजनन का सिलसिला लगातार जारी है। केन्या, इथियोपिया और सोमालिया टिड्डियों के आतंक से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। कई सालों तक वहां टिड्डियों का आतंक रहा। इस समय जो टिड्डियां फसलों को बर्बाद कर रही हैं, वह न पाकिस्तान की जन्मी हैं और न भारत की। अफ्रीका के इथियोपिया, युगांडा, केन्या, दक्षिणी सूडान से निकलकर ओमान होते हुए पाकिस्तान और उसके बाद भारत पहुंची हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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