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दिखावा साबित हो रहीं बुजुर्गों के लाभ की सरकारी योजनाएं

19/06/2019

रामकृष्ण जायसवाल
माज के क्रियाकलापों से यह साबित हो रहा है कि लोगों में दया, करूणा, ममता, सम्मान आदि सभी भावनाओं का लोप हो चुका है। मासूमों के साथ दुष्कर्म, बच्चियों की हत्या कर कूड़ेदान में डालने जैसे अमानवीय कृत्य समाज में पैर पसार चुके हैं। दूसरी ओर बुजुर्गों के हालात भी देश में चिंताजनक हैं। संवेदनाहीन समाज बुजुर्गों का बहिष्कार कर रहा है। सरकार की चलाई गई योजनाएं भी कारगर सिद्ध नहीं हो पा रही हैं। प्रश्न उठता है कि क्या संस्कृतियों वाले इस देश में सभ्यता और मानवता की कमी हो गई है? क्या विरासत स्वरूप वरिष्ठ नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा तिरोहित हो गई है? बुजुर्गों के लिए चलाई गई वय वंदन योजना, अनुदान सहायता योजना, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धा पेंशन योजना, राष्ट्रीय वयोश्री योजना, स्वावलंबन योजना, अटल पेंशन योजना समेत कई प्रकार की योजनाओं के माध्यम से सरकार बुजुर्गों को सहायता प्रदान करने का प्रयास कर रही है। लेकिन सभी योजनाएं एकमुश्त प्रीमियम राशि निवेश करने की मांग करती हैं। लेकिन बुजुर्गो की आर्थिक हालत इतनी सही नहीं होती कि उनको इन तमाम योजनाओं में निवेश कर लाभ दिला सके। नतीजतन, बुजुर्गों की दशा को सुधारने के लिए सरकार के प्रयास कारगर सिद्ध नहीं हो रहे हैं। उनकी सामाजिक सुरक्षा संकटाग्रस्थ ही नजर आ रही। इसका एक विशेष कारण योजनाओं का जमीनी स्तर पर सही से प्रचालन न हो पाना है। सरकार के द्वारा प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाएं मात्र दिखावटी प्रतीत हो रही हैं। सरकार ने बुजुर्गों के लिए अस्पताल में अलग लाइन का प्रबंध किया है। साथ ही कुछ राज्यों के अस्पतालों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष क्लीनिक की व्यवस्था है। लेकिन यह कुछ राज्यों में ही सीमित है। इसे सभी राज्यों में बढ़ाने की जरूरत है। बताने की जरूरत नहीं कि वरिष्ठ नागरिकों की स्थिति सभी राज्यों में दयनीय है।
सरकार की राष्ट्रीय वयोश्री योजना जिसमें बुजुर्गों को सुनने वाली मशीनें, व्हीलचेयर, आरामदायक जूते,बैशाखी और कृत्रिम दांत, चश्मा आदि उपकरण मुफ्त प्रदान करने की योजना है। लेकिन जमीन पर इसका कार्यान्वयन नजर नहीं आ रहा है। सवाल यह कि जब सरकार वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई योजनाएं चला रही तो, उनकी हालत इतनी चिंन्ताजनक क्यों है? इसका लाभ लेने में बुजुर्गों को बड़े अपमान का सामना करना पड़ता है। उनको तिरस्कार की नजर से देखा जाता है। साथ ही उनको वित्तीय परेशानी के अलावा उन्हें मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। सर्वे में शामिल 53 फीसदी बुजुर्गों का मानना है कि समाज उनके साथ भेदभाव करता है। अस्पताल, बस अड्डों, बसों, बिल भरने के दौरान और बाजार में भी बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार के मामले सामने आते हैं।  खासतौर पर अस्पतालों में बुजुर्गों को भेदभाव या बुरे बर्ताव का अधिक सामना करना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में कर्मचारियों का व्यवहार बुजुर्गों के साथ सबसे बुरा होता है। यहां 26 फीसदी बुजुर्गों को बुरे व्यवहार का सामना करना पड़ता है। 12 फीसदी बुजुर्गों को उस वक्त लोगों की कड़वी प्रतिक्रिया झेलनी पड़ती है, जब वे लाइन में पहले खड़े होकर अपने बिल का भुगतान कर रहे होते हैं। इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि सरकार के द्वारा चलाई गई योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर देने वाले लोगों का नजरिया उनके प्रति सदैव घृणा का भाव ही रहता है। साथ ही लोगों को अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाने की जरूरत है। 
भारत इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। यहां युवाओं की तादाद 65 फीसद है। बीते दिनों अमेरिका के जनसंख्या संदर्भ ब्यूरो द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2050 तक आज का युवा भारत 'बूढ़ा' हो जाएगा। उस समय देश में पैंसठ साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ जाएगी। सवाल यह कि क्या तब हम अपनी 'वृद्ध' जनसंख्या के समुचित देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था कर पाएंगे?
अतः सर्वप्रथम वृद्ध व्यक्तियों को सुखद एवं खुशहाल जीवन प्रदान करने के लिए हमें उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाने पर ध्यान देना होगा। बेसहारा वृद्ध व्यक्तियों के लिए सरकार की ओर से आवश्यक रूप से और सहज रूप में मिल सकने वाली पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। ऐसे वृद्ध व्यक्ति जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ हैं, उनके लिए समाज को कम परिश्रम वाले हल्के-फुल्के रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए। देश में बुजुर्गों का एक तबका ऐसा भी है जो या तो अपने घरों में तिरस्कृत व उपेक्षित जीवन जी रहा है या फिर वृद्धाश्रमों में अपनी जिंदगी बेबसी के साये में बिताने को मजबूर है। समाज में बुजुर्गों पर होने वाले मानसिक और शारीरिक अत्याचार के तेजी से बढ़ते मामलों ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। परिजनों से लगातार मिलती उपेक्षा, निरादर भाव और सौतेले व्यवहार ने वृद्धों को काफी कमजोर किया है। बुजुर्ग जिस सम्मान के हकदार हैं, उसको प्रदान करना समाज का कर्तव्य है। साथ ही उनकी समुचित देखभाल करना भी परिवार का धर्म है।
सरकार की केवल योजनाएं लागू होना महत्वपूर्ण नहीं है। अगर उनका समुचित प्रचालन नहीं होता तो सभी योजनाएं दिखावा बन जाएंगी। अगर वरिष्ठ जनों का अस्तित्व और गरिमा बचाना है तो इसके लिए सर्वेक्षण होना जरूरी है कि कितने प्रतिशत बुजुर्गों को योजनाओं का लाभ मिल रहा है और कहां लूप होल है जहां से योजनाएं प्रभावहीन हो रही हैं। बुजुर्गों के सम्मान तथा गरिमा को बचाने के लिए सभी योजनाओं का उन तक सही तरह से लाभ पहुंचाकर ही उनके सम्मान की रक्षा की जा सकती है।

(लेखक अध्यापक हैं।)


 
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