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आधुनिक बिहार के निर्माता थे डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा

08/11/2019

(10 नवम्बर, जन्मदिन पर विशेष)

मुरली मनोहर श्रीवास्तव
र्षों बीत गए मगर उस घर में आज तक कोई दीप नहीं जल सका। किसी ने उसे सुरक्षित करना भी मुनासिब नहीं समझा। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस व्यक्तित्व को पूरी दुनिया अविभाजित आधुनिक बिहार के निर्माता के रुप में जानती है। वह अपने ही घर में बेगाने हैं। उनके घर और जमीन पर असामाजिक तत्वों का कब्जा होता जा रहा है और बिहार की 'सुशासन' की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। हम बात कर रहे हैं संविधान सभा के प्रथम अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की।
बिहार को उंचा उठाना ही उनके जीवन की अभिलाषा थी। उन्होंने बिहार टाइम्स नामक पत्र के संचालन में तथा इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला को सर्वांगीण विकास में अपना पूरा सहयोग दिया था। सिन्हा साहब ने ही हिन्दुस्तान रिव्यू तथा इंडियन पीपुल नामक पत्रों को निकाला। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का जन्म बिहार के पुराना शाहाबाद (अब बक्सर) जिले के डुमरांव अनुमंडल के मुरार गांव के एक कायस्थ कुल में 10 नवम्बर 1871 को हुआ था। उनके पितामह बख्शी शिवप्रसाद सिन्हा डुमरांव अनुमंडल के तहसीलदार थे। उनके पिता बख्शी रामयाद सिन्हा जाने-माने वकील थे। वे स्वभाव से ही परोपकारी एवं उदार थे।
बाल्यकाल में बड़े लाड़-प्यार से सच्चिदानंद का लालन-पालन हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा आरा जिला स्कूल में हुई थी। वे बचपन से ही बड़े कुशाग्र बुद्धि के थे। 'होनहार विरवान के होत चिकने पात' वाली कहावत उन पर ठीक लागू होती थी। आरा जिला स्कूल से मैट्रिक पास कर आगे की पढ़ाई के लिए वे कोलकाता चले गए। उन्हें विदेश जाने की प्रबल इच्छा थी। उस समय बिहार से इंग्लैंड जाने वाले पहले व्यक्ति डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ही थे। महज अठारह वर्ष की उम्र में 26 दिसम्बर 1889 को वे उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए। वहां से तीन साल तक वकालत की पढ़ाई कर सन् 1893 ई. में स्वदेश लौटे। उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में दस वर्ष तक वकालत की। फिर वे पटना लौट आए थे। डॉ. सिन्हा ने अपनी शादी पंजाब के कायस्थ परिवार में की थी। हालांकि गांव के विरादरीवालों ने इसका काफी विरोध किया था पर धुन के पक्के डॉ. सिन्हा ने इसकी परवाह न की। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने बंगाल से पृथक बिहार के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। इसीलिए उन्हें आधुनिक बिहार का निर्माता कहा जाता है।
डॉक्टर सिन्हा को सन् 1921 ई. में बिहार का अर्थ सचिव और कानून मंत्री बनाया गया। तत्पश्चात पटना विश्वविद्यालय में उप कुलपति के पद पर रहते हुए उन्होंने सूबे में शिक्षा को नया मोड़ दिया। डॉ. सिन्हा बड़े दानवीर भी थे। उन्होंने पटना में पुराना सचिवालय के लिए अपनी भूमि दान में दी थी। पटना के सिन्हा लाईब्रेरी को भी स्थापित करने का श्रेय डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को जाता है। दरअसल, वह उनकी निजी किताबों का संग्रह है जिसे उन्होंने बिहार के लोगों को पढ़ने के लिए सार्वजनिक लाईब्रेरी का रूप दे दिया था। 
डॉ. सिन्हा आरंभ से ही कांग्रेस के सदस्य थे और आजीवन सदस्य बने रहे। वह वर्ष 1912 ई. के इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन के जनरल सेक्रेटरी भी थे। सन् 1946 ई. में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया था। बाद में बिहार के ही लाल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इस पद को स्थाई रूप से सुशोभित किया था।
06 मार्च 1950 को डॉ. सिन्हा दुनिया से कूच कर गए। मगर बिहारवासियों के हृदय में वे हमेशा अमर रहेंगे। वे मुरार और बिहार के ही नहीं बल्कि भारत के सर्वश्रेष्ठ नेताओं में से एक दूरदर्शी नेता थे। दु:खद है कि मुरार गांव में उनकी जन्मभूमि आज वीरान पड़ी है। अब तो कुछ लोगों द्वारा उसे अतिक्रमित भी किया गया है। सरकारें बदलती रहीं मगर नहीं बदली तो उनके पैतृक गांव की स्थिति। वह सिर्फ एक कहानी बनकर रह गई है।
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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