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नेपाल का भारतीय क्षेत्र पर दावा आपत्तिजनक

08/06/2020

नेपाल का भारतीय क्षेत्र पर दावा आपत्तिजनक

नेपाल अपने नये नक्शे के जरिये कुछ भारतीय क्षेत्रों पर दावा कर रहा है जो आपत्तिजनक है। बहरहाल इस मामले में नेपाल जिस सीमा तक चला गया है उसके बाद भारत को मजबूरी में  नेपाल को जवाब देना पड़ेगा।

अवधेश कुमार

भारत और नेपाल संबंध अब बेपटरी होते नजर आ रहे हैं। इसका कारण है कि प्रधानमंत्री के पी ओली की सरकार ने नक्शा विवाद से जुड़ा विधेयक नेपाली संसद में पेश कर दिया है। नक्शे को कानूनी वैधता के लिए संसद में दो-तिहाई समर्थन की जरूरत थी। जो सूचना है उसके अनुसार नेपाली कांग्रेस ने समर्थन करने का निर्णय लिया है। हालांकि पहले नए नक्शे की मंजूरी के लिए संविधान संशोधन बिल को संसद की कार्यसूची से हटा लिया गया था। इस मामले में भारत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया देने की जगह अपने को शांत रखा है। सरकारी सूत्रों के हवाले से इतना ही कहा गया है भारत नेपाल के घटनाक्रम पर नजदीकी से नजर बनाए हुए है। सूत्रों ने कहा कि सीमा से जुड़े मुद्दे स्वभाव से संवेदनशील हैं और पारस्परिक संतुष्टि के लिए विश्वास और भरोसा जरूरी है। वास्तव में नेपाल की केपी ओली कम्युनिस्ट सरकर इस समय भारत विरोध में जिस सीमा तक जा रही है वह हर दृष्टि से चिंताजनक है। भारत के लिए राहत तभी होती जब ओली सरकार नक्शा वापस लेने की घोषणा करती। ऐसा कुछ हुआ नहीं है।

नये नक्शे जारी करने का निहितार्थ

पहले लिपुलेख विवाद को चरम पर पहुंचाने के बाद नेपाल ने अपने देश का नया नक्शा जारी किया जिसमें भारत के 395 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अपना दिखाया गया है। नेपाल ने नए नक्शे में लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के अलावा गुंजी, नाभी और कुटी गांवों को भी शामिल किया गया है। इसमें कालापानी के कुल 60 वर्ग किलोमीटर और लिंपियाधुरा के 335 किलोमीटर के इलाके को जोड़ दें तो यह कुल 395 वर्ग किलोमीटर हो जाता है। इस तरह से नेपाल ने भारत के इलाके पर दावा किया है। चूंकि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में कैबिनेट की बैठक के दौरान इस नक्शे को मंजूरी दी गई है इसलिए इसके निहितार्थ काफी गहरे हैं। स्वाभाविक ही न चाहते हुए भारत को इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देनी पड़ी है। भारत ने इस हरकत पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता में इस तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि नेपाल द्वारा जारी किया गया नया नक्शा किसी ऐतिहासिक तथ्य पर आधारित नहीं बल्कि मनगढ़ंत है। उन्होंने कहा कि नेपाल को भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए। हालांकि ये क्षेत्र विवादित है ही नहीं। बाजवूद संबंधों का ध्यान रखते हुए विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि नेपाल के नेतृत्व को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिससे बैठकर बात हो सके।

वैसे रक्षा मंत्री ने जब लिपुलेख से कैलाश मानसरोवर जाने वाले रास्ते का उद्घाटन किया, तभी से नेपाल इसका विरोध कर रहा है। नेपाल तथ्यहीन बातों से इस हिस्से को अपना बता रहा है। आठ मई को लिपुलेख के लिए सड़क मार्ग खोले जाने के बाद आई नेपाल की कड़ी प्रतिक्रिया पर भारत ने इस सच्चाई को स्पष्ट किया था कि किसी भी नेपाली क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं किया गया है और ये सीमा सड़क कैलाश मानसरोवर की पारंपरिक धार्मिक यात्रा के रूट पर ही बनाई गई है। लेकिन नेपाल के प्रधानमंत्री अपने बयानों से देश में भारत विरोधी माहौल बना रहे हैं। लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को लेकर जानबूझकर वे विवाद को गहरा रहे हैं। आखिर नेपाल का नया नक्शा जारी करने के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भारत पर सत्यमेव जयते की तर्ज पर सिंहमेव जयते जैसा तंज कसने की क्या जरूरत थी? यही नहीं नेपाल इन भारतीय इलाकों में अपनी हथियार बंद उपस्थिति भी बढ़ा रहा है। उसने पहली बार महाकाली नदी से लगे सीमावर्ती इलाके में आर्म्ड पुलिस फोर्स (एपीएफ) की एक टीम भेजी है। कालापानी से लगे छांग गाँव में एपीएफ ने एक सीमा चौकी स्थापित की है। एपीएफ का ढांचा भारत के सशस्त्र सीमा बल और भारत तिब्बत सीमा पुलिस की तरह ही है। नेपाल के विश्लेषक कह रहे हैं कि 1816 की सुगौली संधि के 204 साल बाद नेपाल ने आखिरकार तीन देशों की सीमा से लगने वाले अपने इस इलाके की सुरक्षा के लिए कदम उठाया है।

नेपाल का दावा

नए नक्शे में लिपुलेख पर अपना दावा करते हुए कहा है कि महाकाली (शारदा) नदी का स्रोत दरअसल लिम्पियाधुरा ही है जो फिलहाल भारत के उत्तराखंड का हिस्सा है। उत्तराखंड के धारचूला के पूरब में महाकाली नदी के किनारे नेपाल का दार्चुला जिला पड़ता है। महाकाली नदी नेपाल-भारत की सीमा के तौर पर भी काम करती है। धारचूला से लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के नाम से भी प्रसिद्ध है। छह महीने पहले भारत ने अपना नया राजनीतिक नक़्शा जारी किया था जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में दिखाया गया था। इस नक्शे में स्वाभाविक ही लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को भारत का हिस्सा था। नेपाल सरकार कहती है कि हम हमेशा से महाकाली नदी के पूरब के हिस्से को नेपाल का मानते हैं। अब नक्शे में उसे डाल दिया गया है। नेपाल कहता है कि भारत ने जिस सड़क का निर्माण उसकी जमीन पर किया है, वो जमीन भारत को लीज पर तो दी जा सकती है लेकिन उस पर दावा नहीं छोड़ा जा सकता है। जो जमीन आज तक भारत की है वह नेपाल से लीज पर लेगा यह हास्यास्पद तर्क कौन स्वीकार करेगा?

नेपाल का मधेसी आंदोलन

वर्ष 2015 में नेपाल ने जो संविधान बनाया उसमें तराई इलाके में रहने वाले मधेसियों के साथ भेदभाव था जिसके विरोध में व्यापक आंदोलन हुआ। उन्होंने नाकेबंदी की। नेपाल ने आरोप लगाया कि भारत आंदोलन को भड़का रहा है और उसने ही नाकेबंदी कर दी है। उस समय भी पहाड़ में भारत विरोधी भावनाएं भड़काईं गईं। यह बात सच है कि भारत उस एकपक्षीय संविधान से संतुष्ट नहीं हो सकता था। मधेसियों और भारत के लोगों में रोटी-बेटी का साथ है। भारत के नाकेबंदी के बाद भी नेपाल ने अपने संविधान में कोई बदलाव नहीं किया और नाकाबंदी बिना किसी सफलता के खत्म करनी पड़ी। नेपाल में मधेसियों के साथ भेदभाव के आरोप में काफी हद तक सच्चाई है। नेपाल में सरकारी नौकरियों में पहाड़ी समुदाय का कब्जा है। मधेसियों को पहाड़ी लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं। नेपाल में मधेसियों को धोती कहकर चिढ़ाया जाता है। पहाड़ी ये समझते हैं कि मधेसी लोग नेपाल के प्रति नहीं बल्कि भारत के प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं।

केपी शर्मा की राजनीति

केपी शर्मा की वर्तमान राजनीति भारत विरोध पर टिकी है। वर्ष 2015 में नाकेबंदी के बाद भी उन्होंने नेपाली संविधान में बदलाव का केवल वचन दिया, किया नहीं। वे चीन से नजदीकियां बढ़ाने में लगातार लगे रहे। चीन भी इस कोशिश में था कि किसी तरह भारत के साथ नेपाल के गहरे संबंध कमजोर पड़े। उसने अपने बंदरगाह के इस्तेमाल करने की इजाजत नेपाल को दे दी। नेपाल एक जमीन से घिरा देश है और उसे लगा कि चीन की गोद में जाकर भारत से सामान लाने की स्थिति को खत्म किया जा सकता है। चीन ने थिंयान्जिन, शेंजेन, लिआनीयुगैंग और श्यांजियांग बंदरगाहों के इस्तेमाल की अनुमति दी है। अब नेपाल चीन के महत्वाकांक्षी बोर्डर रोड इनिशिएटिव कार्यक्रम में भी शामिल हो गया। चीन नेपाल तक रेलवे लाइन बिछा रहा है एवं बड़े पैमाने पर नेपाल में निवेश कर रहा है।

ताजा विवाद के पीछे चीन

यह स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं है कि ताजा विवाद के पीछे भी चीन की भूमिका है। थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने संकेत दिए थे नेपाल के लिपुलेख मुद्दा उठाने के पीछे कोई विदेशी ताकत हो सकती है। जनरल नरवणे ने कहा था कि मुझे नहीं पता कि असल में वे किस लिए गुस्सा कर रहे हैं। पहले तो कभी समस्या नहीं हुई। किसी और के इशारे पर ये मुद्दे उठा रहे हों, यह एक संभावना है। नेपाल के राजदूत ने भी कहा कि काली नदी के पूर्व तरफ का क्षेत्र उनका है। इसे लेकर कोई विवाद नहीं है। सेना प्रमुख ने यही कहा था कि जो सड़क बनी है वह नदी के पश्चिम की तरफ बनी है। तो मुझे नहीं पता कि वह असल में किस चीज को लेकर विरोध कर रहे हैं। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हालांकि बयान दिया कि कालापानी का मुद्दा भारत और नेपाल का द्विपक्षीय मुद्दा है। हमें उम्मीद है कि यह विवाद दोनों देश आपसी बातचीत के जरिए सुलझा लेंगे और कोई भी पक्ष एकतरफा कार्रवाई करने से बचेगा ताकि मामला और जटिल ना हो। इस बयान की आवश्यकता क्या थी? कालापानी और लिपुलेख हमारे लिए विवादित मुद्दा है ही नहीं। जानबूझकर विवादित बनाने से यह विवादित नहीं हो जाता।

यह प्रश्न तो अवश्य उठता है कि जिस विषय को लेकर दोनों देशों के बीच कभी कोई तनाव के हालात नहीं बने, उसे लेकर अब ऐसी स्थिति क्यों है? पहली बार केपी शर्मा ओली के रुप में किसी प्रधानमंत्री ने संसद में भारतीय सेना प्रमुख पर निशाना साधा तथा कहा कि कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख हमारा है और हम उसे वापस लेकर रहेंगे। इसी तरह पहली बार वहां एपीएफ तैनात की गई। ओली भारत का डर दिखाकर और इसके खिलाफ माहौल बनाकर चुनाव जीतने और सत्ता तक पहुंचने में सफल हुए और उसे बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इस सीमा तक जाना सामान्य नहीं है। ध्यान रखिए, केपी ओली ने 19 मई को संसद में कहा कि हमारी सरकार के प्रतिनिधि चीन से बात कर रहे हैं। चीन ने कहा है कि लिपुलेख से मानसरोवर तक की सड़क भारत-चीन के बीच व्यापार और पर्यटन के लिए है और इससे लिपुलेख के ट्राई-जंक्शन स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। यहां यह समझना जरूरी है कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित लिपुलेख दर्रा उस भू-सामरिक त्रिकोण पर है, जहां तिब्बत, भारत और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। 8 मई, 2020 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कैलाश मानसरोवर को जोड़ने वाली 80 किलोमीटर सड़क का उद्घाटन किया था। तब भारत में खुशी की लहर थी कि अब मानसरोवर जाने के लिए लंबा रास्ता तय नहीं करना होगा। जो लोग नहीं जाएंगे वो यहीं से देख सकते हैं। किसी को कल्पना नहीं थी कि इस पर विवाद भी हो सकता है। किंतु नेपाल में प्रदर्शन और प्रधानमंत्री मोदी का पुतला दहन आरंभ हो गया। यह माओवादी एवं नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रायोजित विरोध प्रदर्शन था। प्रधानमंत्री ओली ने सर्वदलीय बैठक बुला ली जिसमें सारे पूर्व प्रधानमंत्री शामिल हुए। कहा जा रहा है कि उसके बाद नक्शा जारी हुआ है इसलिए सभी पूर्व प्रधानमंत्री का उसे समर्थन प्राप्त है। हालांकि जो खबर आई उसके अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री व जनता समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. बाबुराम भट्टराई ने बैठक में सुझाव दिया कि कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा से संबंधित सुगौली संधि में जो अभिलेख व नक्शा उपलब्ध है, सरकार उसे जुटाये। इसके कालक्रमों को तैयार करने के बाद भारत से बातचीत करे। इस बातचीत में चीन को भी शामिल किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे डोकलाम विवाद को भूटान ने त्रिपक्षीय मुद्दा बनाया था। चीन को शामिल करने का हमारे लिए कोई कारण नहीं है। लेकिन बाबुराम भट्टराई ने नेपाल में राष्ट्रवाद का उद्धत माहौल पैदा करने को गलत बताया। उन्होंने कहा कि जब तक नेपाल भारत-चीन के बीच बफर स्टेट था, हमने उसका आर्थिक-कूटनीतिक लाभ उठाया। अब इस इलाके में भारत-चीन सड़क मार्ग के जरिये सीधा व्यापार करने लगे हैं। इस कारण दोनों देश नेपाल को नजरअंदाज कर सकते हैं। इस भू राजनीतिक स्थिति को नेपाल को समझने का सुझाव उन्होंने दिया। उनका कहना था कि टकराव के रास्ते पर जाने की जगह दोनों अर्थतंत्र से किस तरह से हम लाभ लें इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। ओली कह रहे हैं कि लिपुलेख में सड़क निर्माण की जानकारी उन्हें नहीं थी। नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली ने बाद में मीडिया से बातचीत कहा कि मीडिया रिपोर्ट से उन्हें सड़क के उद्घाटन की सूचना मिली। उससे हमें पता चला कि भारत लिपुलेख में 2012 से सड़क बना रहा था। इस बयान से कौन सहमत हो सकता है कि जिस क्षेत्र पर आप दावा जता रहे हैं जहां से आपका क्षेत्र जुड़ा है वहां सड़क निर्माण की जानकारी आपको नहीं थी। सच यही है कि शिपकिला-लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली 80 किलोमीटर दुर्गम सड़क 2002 में ही बनना आरंभ हुआ और उस समय की योजनानुसार इसे 2007 में पूरा होना था जो नहीं हो सका। जाहिर है, नेपाल सरकार झूठ बोलकर अपने लोगों को बरगला रही है।

व्यापारिक मार्ग रहा है लिपुलेख दर्रा

सब जानते हें वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध से पहले लिपुलेख दर्रे के रास्ते चीन से भारत का व्यापार हो रहा था। 1962 में युद्ध के समय से ही यहां पर इंडो-तिबतन फोर्स की तैनाती भारत ने कर रखी है। अब नेपाल इसे हटाने की मांग कर रहा है। इसका कोई कागजी आधार नहीं है कि नेपाल की लिखित अनुमति से यहां पर इंडो-तिबतन फोर्स की तैनाती हुई थी। 1962 के युद्ध के तीस साल बाद, 1992 में चीन और भारत ने लिपुलेख दर्रे से व्यापारिक मार्ग खोला था। कैलाश मानसरोवर जाने के वास्ते भी इस मार्ग का इस्तेमाल होता रहा है। उस समय भी नेपाल ने आपत्ति नहीं की। सितंबर, 1961 में जब कालापानी विवाद उठा था, उस समय भारत-नेपाल की तत्कालीन सरकारों ने तय किया था कि द्विपक्षीय बातचीत के आधार पर हम इसे सुलझा लेंगे। 2 दिसंबर, 1815 को सुगौली समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था और उसे 4 मार्च, 1816 को कार्यान्वित किया गया था। नेपाल के पास सुगौली संधि का नक्शा नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं? नेपाल दावा कर रहा है कि साल 2015 में जब चीन और भारत के बीच व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए समझौता हुआ था, तब भी नेपाल ने दोनों देशों के समक्ष आधिकारिक रूप से विरोध दर्ज कराया था। नेपाल का कहना है कि इस समझौते के लिए न तो भारत ने और न ही चीन ने उसे भरोसे में लिया जबकि प्रस्तावित सड़क उसके इलाके से होकर गुजरने वाली थी। सवाल है 2020 में उन्होंने नया नक्शा जारी कर दिया है उसे कौन मानेगा? भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने एवं राज्य का विभाजन कर केन्द्रशासित प्रदेश बनाने के बाद 2 नवंबर, 2019 को जो नक्शा पुनर्प्रकाशित किया था, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। भारतीय विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बावजूद नेपाल मानने को तैयार नहीं।

नेपाल के सर्वे विभाग के अधिकारियों का कहना है कि लिपुलेख और कालापानी हिमालय क्षेत्र के सुदूर इलाके हैं जहां पहुंचना बहुत मुश्किल है और वहां कोई इंसानी आबादी नहीं रहती है। उनका कहना है कि इसी कारण नेपाल ने वहां सीमा सुरक्षा चौकी स्थापित नहीं की और सड़क या पुल जैसे बुनियादी विकास पर ध्यान दिया। यह झूठ है। भारत नेपाल के बीच उस ओर विवाद था ही नहीं। दोनों देशों के संबंधों के कारण कभी सुरक्षा चिंता भी नहीं हुई। नेपाली अधिकारी अगर ये कहते हैं कि सुगौली की संधि के अलावा नेपाल के पास और भी सबूत हैं, जिनमें संधि पर दस्तखत से पहले ब्रितानी अधिकारियों की लिखी चिट्ठी और उस दौर के दस्तावेज शामिल हैं तो उसे सामने लाएं। नेपाल कालापानी और गुंजी के स्थानीय लोगों की मालगुजारी रसीद और नेपाली मतदाता होने का पहचान पत्र भी सबूत के तौर पर दिखा सकते हैं। इसके अलावा साल 1908 में मानसरोवर की यात्रा करने वाले भारतीय संत योगी भगवान श्रीहंस और तीस व चालीस के दशक में वहां जाने वाले स्वामी प्रणवानंद ने भी अपने यात्रा संस्मरणों में लिपुलेख के दक्षिण के छांगरू गांव में नेपाली सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी के बारे में विस्तार से लिखा है। कई नेपाली अधिकारियों और पत्रकारों ने बीते दशकों में कालापानी की यात्रा के बाद वहां के स्थानीय लोगों के पास मौजूद उनके नेपाली दस्तावेज इकट्ठा किए हैं। इनमें लिपुलेख से लगे गुंजी गांव और कालपानी के आस-पास के गांव भी शामिल हैं। ये सब वो लाएं सामने। नेपाली लोगों के बसने का अर्थ वह नेपाली क्षेत्र नहीं हो गया। उस दृष्टि से तो मधेस में भारतीय मूल के लोग रहते हैं जो कभी भारत का ही भाग था तो क्या हम उसे भारतीय क्षेत्र कह दें?

निर्विवाद रही है सीमा

1800 किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर कभी-कभार कुछ विवाद उठे लेकिन वे इस सीमा तक ले जाए जाएंगे इसकी कल्पना नहीं थी। दोनों देशों की सरहद ज्यादातर खुली हुई और आड़ी-तिरछी भी है।

हालांकि अब सीमा पर चौकसी के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ी है। प्राकृतिक स्थिति ऐसी है कि आप सीमा को एकदम स्थायी रुप से विभाजित नहीं रख सकते। महाकाली (शारदा) और गंडक (नारायणी) जैसी नदियां जिन इलाकों में सीमांकन तय करती है, वहां मानसून के दिनों में आने वाली बाढ़ से तस्वीर बदल जाती है। नदियों का रुख भी साल दर साल बदलता रहता है। कई जगहों पर तो सीमा तय करने वाले पुराने खंभे अभी भी खड़े हैं लेकिन स्थानीय लोगों के लिए इससे फर्क नहीं पड़ता वो सामान्य तौर पर दोनों ओर आते-जाते रहते हैं। नेपाल की पश्चिमी सीमा पर महाकाली नदी और दक्षिणी सीमा पर गंडक नदी दोनों देशों की सीमा निर्धारण करती है लेकिन यहां नक्शा तय करने का काम नेपाल की नजर में अभी भी अधूरा है। नेपाल की भावना का ध्यान रखते हुए भारत ने पूरा सहयोग किया है। लेकिन नेपाल की जिद के कारण दोनों देशों के सर्वे अधिकारी और तकनीशियन महाकाली और गंडक नदी पर सीमांकन के बिंदुओं के निर्धारण पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं। सवाल है कि अगर इन नदियों का रुख बीते दशकों में लगातार बदलता रहा है तो उसे उसी रुप में स्वीकार करने में समस्या क्या है।

चीन के खिलाफ एक शब्द नहीं

यह सच है कि मई 2015 में प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा के दौरान लिपुलेख में एक व्यापारिक पोस्ट खोले जाने पर हुई सहमति का नेपाल ने विरोध किया था। 9 जून, 2015 को नेपाल की संसद में इसके विरुद्ध एक प्रस्ताव पारित किया गया। माना जाता है कि स्वयं चीन ने ऐसा कराया था। लेकिन आज पांच वर्ष हो गए नेपाल ने कभी इस विषय पर भारत से बातचीत करने की कोशिश नहीं की। यह भी ध्यान रखिए कि जिस तरह वह भारत के खिलाफ बयान देता है चीन के सामने नहीं। पिछले ही दिनों 2 मई, 2020 को चाइना ग्लोबल टेलीविजन नेटवर्क (सीजीटीएन) ने एक ट्वीट के जरिये पूरे माउंट एवरेस्ट को चीन का हिस्सा बता दिया था। यह नेपाल की संप्रभुता का उल्लंघन था लेकिन नेपाल के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। इसका क्या अर्थ लगाया जाए?

नेपाल का कहना रहा है कि लिपुलेख पर्वत महाकाली नदी के पूरब में स्थित है, जिसकी वजह ये कुदरती तौर पर ये इलाका नेपाल का हिस्सा बन जाता है और ये बात सुगौली की संधि में भी साफ तौर पर कही गई है। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिक्का के अनुसार, सुगौली की संधि से ब्रिटेन-नेपाल युद्ध की औपचारिक तौर पर समाप्ति हुई थी। संधि की शर्तों के तहत नेपाल ने तराई के विवादास्पद इलाके और महाकाली नदी के पश्चिम में सतलज नदी के किनारे तक जीती हुई जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया था। अगर सुगौली की संधि ये स्पष्ट रूप से कहती है कि महाकाली नदी का पूरब का इलाका नेपाल का है तो फिर समस्या कहां है? नेपाली इतिहासकारों और सर्वे अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के बीच गलतफहमी इस बात को लेकर है कि महाकाली नदी का उद्गम स्थल कहां है? और विवाद की जड़ यही है। इसलिए सवाल उठता है कि महाकाली नदी कहां से निकलती है? लिम्पियाधुरा की पहाड़ियों से या फिर लिपुलेख से? गुंजी गांव के पास, जहां लिपुलेख जाने वाली सीमा सड़क बीते शुक्रवार को खोली गई थी, वहां दो छोटी नदियां आकर मिलती है। एक धारा दक्षिण पूर्व में लिम्पियाधुरा की पहाड़ियों से निकलकर आती है तो दूसरी धारा दक्षिण में लिपुलेख से आती है। नेपाल के विशेषज्ञ और अधिकारियों का कहना है कि महाकाली नदी लिम्पियाधुरा से निकलकर उत्तर पश्चिम में भारत के उत्तराखंड की ओर बढ़ती है। लेकिन इसके ठीक उलट भारतीय पक्ष का कहना है कि महाकाली नदी का रुख नेपाल की ओर उत्तर पूर्व में है। उनका कहना है कि लिपुलेख से निकलने वाली जलधारा ही दरअसल, महाकाली नदी का स्रोत है और इसी से दोनों पड़ोसी देशों की सीमाओं का निर्धारण होता है।

क्या है सुगौली की संधि

भारत के लिए सीमा के ये क्षेत्र विवाद के विषय नहीं है लेकिन कुछ विश्लेषक इसकी शुरुआत 1816 से बता रहे हैं। तब ब्रिटिश हुकुमत के हाथों नेपाल के राजा कई इलाके हार गए थे। इसके बाद सुगौली की संधि हुई जिसमें सिक्किम, नैनीताल, दार्जिलिंग, लिपुलेख, कालापानी भारत के हिस्से आया। हालांकि अंग्रेजों ने बाद में कुछ हिस्सा नेपाल का मानकर उसे लौटा दिया। नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच 1816 में सुगौली संधि हुई थी। सुगौली बिहार के बेतिया यानी पश्चिम चंपारण में नेपाल सीमा के पास एक छोटा-सा शहर है। इस संधि में तय हुआ कि काली या महाकाली नदी के पूरब का इलाका नेपाल का होगा। काठमांडो में मान लिया गया था कि लिम्पियाधुरा से निकली काली नदी पश्चिमी सीमा तय करती है, इसके समानांतर दिल्ली ने दावेदारी की कि कालीनदी लिपुलेख से निकली है। बाद में अंग्रेज सर्वेक्षकों ने काली नदी का उद्गम स्थान अलग-अलग बताना शुरू कर दिया। दरअसल महाकाली नदी कई छोटी धाराओं के मिलने से बनी है और इन धाराओं का उद्गम अलग-अलग है। पिछले कुछ समय से नेपाल कहने लगा है कि कालापानी के पश्चिम में जो उद्गम स्थान है वही सही है और इस लिहाज से पूरा इलाका उसका है। भारत दस्तावजों के सहारे साबित कर चुका है कि काली नदी का मूल उद्गम कालापानी के पूरब में है। ध्यान रखने की बात है कि तराई का इलाका भी अंग्रेजों के शासन में था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नेपाल के राजा ने अंग्रेजों का साथ दिया था। तराई में भारतीय रहते थे लेकिन अंग्रेजों ने इनाम में पूरा तराई का इलाका नेपाल को दे दिया। अगर 1816 की संधि में नेपाल के हक की बात है तो उसे वो दिखाना चाहिए। लेकिन नेपाल कह रहा है कि सुगौली की संधि के दस्तावेज गायब हो गए हैं।

नेपाल जिस सीमा तक चला गया है उसके बाद भारत के पास कुछ कदम उठाने की मजबूरी हो जाएगी। हालांकि भारत ने अभी तक संयमित रुख अपनाया है और यही परिपक्वता है। हर भारतीय नेपाल के साथ अपनत्व का भाव रखते हैं। भारत का इतिहास कभी दूसरे देश की जमीन हड़पने का नहीं रहा है। उसमें भी नेपाल जिससे हमारे रोटी-बेटी और खून के रिश्ते हैं। प्रधानमंत्री ओली अगर सदियों पुराने संबंधों को नष्ट करने पर तुले हैं तो यह नेपाल के ही अहित में होगा। चीन किसी का दोस्त नहीं भाई की बात तो छोड़िए। उसने श्रीलंका, मालदीव आदि के साथ क्या किया यह ओली को समझना चाहिए। वहां समस्या यह है कि जो भी ओली का इस मामले पर विरोध करेगा उसे भारत और रॉ का दलाल साबित कर दिया जाएगा। इसलिए चाहते हुए भी कोई खुलकर ओली की नीति का विरोध नहीं कर पा रहा है। हमारी नजर नेपाली संसद में पेश हुए विधेयक के वोटिंग पर है। जैसी परिस्थिति बनेगी भारत सरकार उसी के मुताबिक कदम उठायेगी। ४४४

 

जो सड़क बनी है वह नदी के पश्चिम की तरफ बनी है। तो मुझे नहीं पता कि वह असल में किस चीज को लेकर विरोध कर रहे हैं। – मनोज मुकुंद नरवणे, सेना प्रमुख

 

काली नदी के पूर्व तरफ का क्षेत्र नेपाल का है। इसे लेकर कोई विवाद नहीं है। – नीलांबर आचार्य, नेपाल के राजदूत

 

कालापानी का मुद्दा भारत और नेपाल का द्विपक्षीय मुद्दा है। हमें उम्मीद है कि यह विवाद दोनों देश आपसी बातचीत के जरिए सुलझा लेंगे और कोई भी पक्ष एकतरफा कार्रवाई करने से बचेगा ताकि मामला और जटिल ना हो। – झाओ लिजियन, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता

 


 
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