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तीन तलाक से आजादी

09/08/2019

तीन तलाक से आजादी ...

बद्रीनाथ वर्मा

सदियों से जारी तीन तलाक की कुप्रथा अब इतिहास के कूड़ेदान का हिस्सा बन गई है। 415 सांसदों के प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर काबिज राजीव गांधी भी इसका श्रेय ले सकते थे। लेकिन वोट बैंक के लिए कट्टरपंथियों के आगे आत्मसमर्पण कर उन्होंने यह अवसर गंवा दिया। कोर्ट में केस जीत चुकी शाहबानो को उनकी राजनीति ने हरा दिया। लेकिन शाहबानो की जलाई गई क्रांति की वह लौ चार दशकों में कभी बुझी नहीं। उसी का नतीजा है एक अभिशाप का खात्मा। इस कामयाबी के पीछे मोदी सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति को नकारा नहीं जा सकता। इस बार की आवरण कथा में तीन तलाक की परत दर परत पड़ताल।

30 जुलाई का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। सदियों से जारी एक प्रथा की समाप्ति का यह दिन करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के लिए 15 अगस्त से 16 दिन पहले ही आजादी का एहसास कराने वाला साबित हुआ। फौरी तीन तलाक के खिलाफ ताल ठोंकने वाली तमाम महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान है। उन्हें वह जीत और जहां मिला है जिसके लिए वह सालों से अपने घर परिवार, समाज और धर्म के ठेकेदारों से लड़कर, कई बेड़ियों को तोड़कर सामने आई हैं। अब तलाक…तलाक…तलाक कहकर बीवी को अपनी जिंदगी से बेदखल करने की प्रवृत्ति पर कारगर रोक लग सकेगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। तीन तलाक के खिलाफ बिल लोकसभा से तो पहले ही पास हो गया था। घंटों की चर्चा के बाद राज्यसभा ने भी इसे पारित कर दिया। इसके पक्ष में 99 और विपक्ष में केवल 84 वोट पड़े। इसी के साथ सैकड़ों साल पुरानी कुप्रथा का खात्मा हो गया। इस बिल को पास कराने में तमाम तरह की दिक्कतें सामने आई। लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के अपने वादे पर डटी रही। वह न तो झुकी और न ही उसका मनोबल टूटा। तीसरी बार ही सही अंतत: दोनों सदनों से पास हो जाने व राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून के रूप में परिणत हो गया है। इसी के साथ इंस्टैंट तीन तलाक दंडनीय अपराध हो गया।

तुष्टिकरण के नाम पर देश की करोड़ों माताओं-बहनों को उनके अधिकार से वंचित रखने का पाप किया गया। मुझे इस बात का गर्व है कि मुस्लिम महिलाओं को उनका हक देने का गौरव हमारी सरकार को प्राप्त हुआ है। एक पुरातन और मध्यकालीन प्रथा आखिरकार इतिहास के कूड़ेदान तक ही सीमित हो गई है। -नरेन्द्र मोदी

मोदी सरकार ने देश की मुस्लिम महिलाओं के लिए अभिशाप बने तीन तलाक से मुक्ति देकर उन्हें समाज में सम्मान से जीने का अधिकार दिया है। मुस्लिम महिलाओं की गरिमा को सुनिश्चित करने और उसे अक्षुण्ण रखने के लिए उठाया गया यह ऐतिहासिक कदम उनके जीवन में आशा और सम्मान का एक नया युग लाएगा। -अमित शाह

 

यूनिफॉर्म सिविल कोड की स्थिति

तीन तलाक कानून बन जाने के बाद अब एक देश एक कानून खासकर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर चर्चा का बाजार गर्म है। दरअसल, अक्टूबर 2015 में पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से को लेकर कर्नाटक की एक महिला फूलवती वर्सेस प्रकाश एंड अदर्स केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में प्रकाश के वकील ने दलील दी कि हिंदू कानून में कमियों की बात तो होती है। लेकिन मुस्लिम पर्सलन लॉ में कई ऐसे प्रावधान हैं जो सीधे-सीधे मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ है। यह सुनते ही सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अनिल दवे और जस्टिस एके गोयल ने स्वत: संज्ञान लेते हुए एक पीआईएल दायर करने का फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस पर अपना पक्ष रखने को कहा। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि हिंदू और मुस्लिम महिलाओं के साथ अलग-अलग बर्ताव के पीछे भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं होना है। इस पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल था कि केंद्र सरकार सिविल कोड क्यों नहीं बना रही? पहले तो सरकार ने इस पर चुप्पी साधे रखी। बाद में इस संबंध में राय लेने के लिए इसे लॉ कमीशन के पास भेज दिया। लॉ कमीशन भी महीनों तक खामोशी की चादर ओढ़े रहने के बाद 7 अक्टूबर 2016 को 16 प्रश्नों के साथ एक सवालनामा जारी किया और लोगों से इस मामले में अपनी राय देने की अपील की। राय देने के लिए डेढ़ महीने का समय दिया गया। उसके बाद इसकी मियाद एक महीने और बढ़ाकर 21 दिसंबर 2016 कर दिया गया। कई मुस्लिम संगठनों और कुछ राजनीतिक पार्टियों ने इसका बहिष्कार करते हुए इसका जवाब नहीं देने का निर्णय लिया था। हालांकि लॉ कमीशन के मुताबिक लाखों लोगों ने इस पर अपनी राय प्रकट की। आयोग उन सबको फिलहाल पढ़ रहा है। यूनिफॉर्म सिविल कोड की वर्तमान स्थिति यही है।

हालांकि नियमानुसार एक-एक महीने के अंतर पर तीन बार में दिया जाने वाला तलाक इसके दायरे में नहीं है। मुस्लिम महिलाओं की यह बहुप्रतीक्षित मांग पूरी होना केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति का प्रतिफल है। यह कानून 1985 में ही बन गया होता। लेकिन वोटबैंक की मजबूरी ने तत्कालीन राजीव सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। 415 सांसदों के साथ प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर काबिज तत्कालीन राजीव गांधी सरकार एक 62 वर्षीय वृद्धा शाहबानो को महज 125 रुपये महीने गुजारा भत्ता दिला पाने में खुद को असहाय महसूस करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही पलट दिया। तब से आज तक नकचढ़े पतियों की ज्यादती की शिकार न जाने कितनी बेबस महिलाएं दर बदर की ठोकरें खाने को विवश थीं। भले ही कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकते हुए राजीव गांधी सरकार ने सदियों से जारी इस कुप्रथा का अंत करने का अवसर गंवा दिया था। लेकिन शाहबानो की जलाई गई वह क्रांति की लौ कभी बुझी नहीं। यही कारण है कि शाहबानो से लेकर सायरा बानो व इशरत जहां से लेकर अतिया साबरी व आफरीन रहमान तक दर्जनों रणचंडी इस कुप्रथा के खिलाफ रौद्र रूप के साथ मैदान में आ डटीं।

शाहबानो इंदौर की रहने वाली पांच बच्चों की मां शाहबानो को चार दशक पहले सन 1978 में 62 साल उम्र में उनके पति ने तलाक…तलाक…तलाक बोलकर अपना रिश्ता खत्म कर लिया। पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए उन्होंने पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। तलाक के सात साल बाद 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो को बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। लेकिन उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ मुस्लिमों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। इससे घबराकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने द मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन आॅफ राइट्स एक्ट 1986 बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। वोटबैंक के लिहाज से लिये गये इस फैसले की मुखालफत करते हुए तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इस्तीफा दे दिया था। शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली

शायरा बानो (38) की शादी 2002 में इलाहाबाद के एक प्रॉपर्टी डीलर से हुई थी। एक दिन पति ने उन्हें टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेज दिया। इस संबंध में उन्होंने एक मुती से जानकारी चाही। मुती ने टेलीग्राम से भेजे गये तलाक को जायज ठहराया। निराश शायरा ने फरवरी 2016 में तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शायरा की यह छोटी सी चिंगारी देखते ही देखते ज्वाला में तब्दील हो गई। इन कुप्रथाओं के खिलाफ कई और मुस्लिम महिलाओं ने अपने हक की आवाज उठानी शुरू कर दी। उल्लेखनीय है कि हलाला यानी मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है।

आफरीन रहमान एमबीए पासआउट आफरीन रहमान की साल 2014 में जब जयपुर के एक फाइब स्टार होटल में बहुत धूमधाम से शादी हुई थी। अपने वकील पति के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी तक छोड़ दी। शादी के बाद से ही दहेज को लेकर मारपीट होने लगी। वह अवसाद में रहने लगी। एक साल बाद पति ने मायके भेज दिया। पिता की मौत पहले ही हो चुकी थी और सड़क हादसे में मां भी चल बसीं। इसी बीच उनके पति ने एक चिट्ठी में तलाक, तलाक, तलाक लिखकर उन्हें तलाक दे दिया। आफरीन ने अपनी ममेरी बहन की हौसला अफजाई के बाद समाज के लिए नासूर बन चुके तीन तलाक के खिलाफ जंग छेड़ दिया। आफरीन के मुताबिक उनके बच्चे नहीं हुए, इसलिए वह जिंदगी की नई शुरू कर सकती हैं। लेकिन इस कुप्रथा के खिलाफ उनकी लड़ाई इसलिए है ताकि अन्य औरतों के साथ ऐसी नाइंसाफी न हो।

न्याय और अन्याय की इस जंग में उन्हें समाज के कट्टरपंथियों से लेकर पड़ोसियों तक का बहिष्कार झेलना पड़ा। कदम-कदम पर मुश्किलों का सामना किया, ताने सुने। सब कुछ सहा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अंतत: विजय हासिल की। बिल पास होने के बाद इसे उन्नतिशील भारत की शुरूआत करार देते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि दोनों सदनों ने मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिया है। उन्होंने इस बिल पर चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि इस विधेयक को सियासी चश्मे से नहीं देखना चाहिए। यह इंसाफ से जुड़ा विषय है। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है। निकाह को मजाक बना देने वाली तीन तलाक की प्रथा को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 22 अगस्त 2017 में ही शरिया के खिलाफ करार दे दिया था। दो जजों ने इसे असंवैधानिक कहा था और एक जज ने पाप बताया था। इसके बाद दो जजों ने इस पर संसद को कानून बनाने को कहा था। संसद में यह बिल लोकसभा से दो बार पास हुआ। लेकिन दोनों ही बार राज्यसभा में अटक गया। अब जाकर तीसरी बार यह बिल दोनों सदनों से पास होकर कानून का रूप ले चुका है।

तीन तलाक को 2014 से मुस्लिम अस्मिता तथा नागरिकता पर हुए कई हमलों के महज एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। यह एक महिला को एक ऐसे व्यक्ति के साथ वैवाहिक संबंध बनाए रखने को मजबूर करेगा जो जेल में कैद है और जिसने महिला को मौखिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया है। – असदुद्दीन ओवैसी

महिला का धर्म भले ही कुछ भी हो लेकिन वह हिंदुस्तान की बेटी है इसलिए उसकी रक्षा करना हमारा फर्ज है। मैं नरेंद्र मोदी सरकार का मंत्री हूं, राजीव गांधी सरकार का नहीं। -रविशंकर प्रसाद


मुस्लिम समाज में शादी को कॉन्ट्रेक्ट बताने और तीन तलाक का विरोध करने वाले ओवैसी को इस्लाम मुझसे सीखना चाहिए। मैरिज कॉन्ट्रेक्ट भले हो, लेकिन वह कयामत तक रहती है। तीन तलाक को तो खुदा भी गुनाह मानता है। भले ही इस्लाम में चार शादी का प्रावधान हो, लेकिन कुरान में साफ लिखा है कि दूसरी शादी पहली पत्नी की रजामंदी से ही हो। -इंद्रेश कुमार

वैसे राजनीति से हटकर अगर निरपेक्ष भाव से देखें तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि तलाक, तलाक, तलाक कहा और सबकुछ एकबारगी खत्म। एक बेबस औरत बच्चों के साथ घर के बाहर। जिस देश में जाति, धर्म, लिंग से परे संविधान हरेक नागरिक को समान अधिकार देता है वहां आजादी के इतने वर्षों बाद भी मुस्लिम महिलाएं दोजख की जिंदगी बसर कर रही थीं और सरकारें कट्टरपंथियों के आगे खुद को असहाय महसूस करती रहीं। निकाह निकाह न रहा, मजाक बन गया था। फोन पर, व्हाट्सएप्प पर, फेसबुक पर व चिट्ठी के जरिए तलाक, तलाक, तलाक कहा और छुटकारा मिल गया। कुछ करने की जरूरत नहीं। आपने कहा और खत्म। एक बेबस औरत बच्चों के साथ घर के बाहर।

अतिया साबरी सहारनपुर की अतिया साबरी को शादी के सिर्फ ढाई साल बाद ही उनके पति ने दस रुपये के एक स्टांप पेपर पर तीन बार तलाक लिखकर अपनी जिंदगी से बेदखल कर दिया। अतिया के मुताबिक उन्हें दो बेटियां पैदा करने की सजा दी गई। अतिया के मुताबिक शरिया में लिखा है कि निकाह तभी पूरा होता है जब दो लोगों में बातचीत से सहमति बने, तो फिर एक इंसान अकेले तलाक देकर कैसे छुट्टी पा सकता है? एक बार में दिया तीन तलाक औरत की जिÞंदगी को हमेशा के लिए बदल देता है और उसके बच्चों के भविष्य को बर्बाद कर देता है। इसलिए उन्हें इस तरह का तलाक कबूल नहीं था। अतिया ने इस प्रथा को असंवैधानिक करार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अतिया के अनुसार उनके मन के भीतर से आवाज आई कि अगर वह डर गई या हार गई तो उनकी बेटियों का क्या होगा? उन्हें उनके लिए लड़ना है और अपना हक हासिल करना है।

इशरत जहां तीन बेटियों व एक बेटे की मां इशरत जहां की 15 साल पुरानी शादी पल भर में छिन्न भिन्न हो गई। साल 2015 में दुबई से उनके पति ने फोन पर ही तीन बार तलाक बोलकर उनसे छुटकारा पा लिया। बेबस व अनपढ़ इशरत जहां पर तो मानों गमों का पहाड़ ही टूट पड़ा। रही सही कसर पति ने बच्चों को उनसे छीनकर पूरा कर दिया। कोलकाता के एक एनजीओ की मदद से वह अपना केस सुप्रीम कोर्ट के दर तक ले गईं। इसका खामियाजा इशरत को समुदाय के बहिष्कार के रूप में झेलना पड़ा है। इशरत अनपढ़ भले ही हैं लेकिन वह इतना जरूर जानती हैं कि कुरान में एक बार में तीन तलाक दिए जाने का कहीं कोई जिक्र नहीं है। बल्कि कुरान में तो यहां तक लिखा है कि अगर एक मर्द दूसरी शादी करना चाहे तो उसे अपनी पहली पत्नी से अनुमति लेनी होगी।

तीन तलाक की मारी औरतों को सरकार क्या सड़क पर छोड़ दे। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का यह कथन कत्तई गैरवाजिब नहीं है। कानून मंत्री के मुताबिक यह विधेयक नारी सम्मान और लैंगिक समानता से जुड़ा है। इसे सियासी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह इंसाफ से जुड़ा मामला है। इसका धर्म, मजहब या समुदाय से कोई लेना देना नहीं है। कुरान से तो बिल्कुल ही नहीं। यहां तक कि तीन तलाक को पैगम्बर मोहम्मद साहब ने भी गलत बताया है। यही वजह है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, मिस्र, सउदी अरब और ईरान समेत दुनिया के 20 प्रमुख मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध है। ऐसे में सवाल है कि अगर इस्लामी देश कानून बनाकर तीन तलाक को खत्म कर सकते हैं, तो यह भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में कैसे गलत हो सकता है।

तीन तलाक अब संज्ञेय अपराध
एक साथ तीन तलाक अब संज्ञेय अपराध बन चुका है। यानी तीन तलाक की पीड़ित महिला या
उसके खून के रिश्ते के किसी व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस पति को गिरतार कर सकती है।
तीन तलाक देने पर पति को तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया है। हालांकि पीड़ित महिला
का पक्ष सुनने के बाद मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत भी दे सकते हैं और समझौते की अनुमति भी।
पीड़ित महिला के गुजारा भत्ता की रकम व बच्चों की कस्टडी का फैसला मजिस्ट्रेट पर निर्भर करेगा।
इन देशों में बैन है तीन तलाक
तीन तलाक पर भले ही देश में दो विचारधाराएं हैं। लेकिन 20 से अधिक मुस्लिम बहुल देशों में
पहले से ही तीन तलाक पर रोक है। यहां तक कि पाकिस्तान में 1955 में ही जबकि बांग्लादेश में
1971 में तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। वैसे तीन तलाक को प्रतिबंधित करने वाला
दुनिया का पहला देश मिस्र है। वहां 1929 में ही इसमें बड़ा बदलाव किया गया। मिस्र के बाद
सूडान, श्रीलंका, इराक, साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, इरान, ब्रुनेई, मोरक्को, सऊदी अरब, लीबिया,
लेबनान, इंडोनेशिया, कतर और कुवैत तथा संयुक्त अरब अमीरात में भी तीन तलाक पर प्रतिबंध है।

तीन तलाक के खिलाफ कानून पारित हो जाने के बाद हायतौबा मचाने वालों का कुतर्क है कि अगर पति जेल चला जाएगा तो घर कौन चलाएगा? सदन में इसका सटीक जवाब दिया मुख्तार अब्बास नकवी ने। उन्होंने साफ कहा कि ऐसा काम ही क्यों करें कि जेल जाना पड़े। यह तो ऐसी बात हुई कि हत्यारे को अगर सजा हो गई तो उसके परिवार की देखभाल कौन करेगा? यहां गौर करने वाली बात है कि सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह पर रोक जैसी कुप्रथाओं को खत्म करने वाले देश में आज महज वोट की खातिर तीन तलाक जैसी कुरीति को बरकरार रखने की वकालत की जा रही है। सवाल है कि मामूली बातों को आधार बनाकर जिंदगी से बेदखल कर दी जाने वाली महिलाओं के खिलाफ अन्याय क्यों जारी रहना चाहिए? आखिर कब तक हम धर्म के नाम पर बरसों से चली आ रही रुढ़िवादी और बेकार रीति-रिवाजों को झेलते रहेंगे? चाहे हिंदु हो या मुसलमान, औरत हो या मर्द अगर किसी धर्म में, रिवाज में या किसी भी संस्था में उनके शोषण की रिवायत है तो उसे खत्म करने के लिए क्या सभी को साथ खड़ा नहीं होना चाहिए?


 
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