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मनुष्यता के सफर की गजलें

14/10/2019

मनुष्यता के सफर की गजलें


नुष्य होना एक सफर है। जो रचनाकार अपनी पुस्तक की भूमिका में यह पहला वाक्य लिखता है, स्वाभाविक है कि वह अंदर की सामग्री का संकेत करता है। इस एक वाक्य के साथ वेद मित्र शुक्ल के गजल संग्रह ‘जारी अपना सफर रहा’ में विचरना सहज हो जाता है। सहज इसलिए कि मनुष्य और मनुष्यता के सफर को भले ही दार्शनिकता का जामा पहनाकर दुरूह किया गया हो, यहां गजलकार सीधी-सपाट भाषा में उसे पाठकों के समक्ष रखता है। लगता है कि रचनाकार समय के साथ बदलते सामाजिक परिवेश से चिंतित है।

 पुस्तक-नाम                जारी अपना सफर रहा

 लेखक                       वेद मित्र शुक्ल

 मूल्य                         400 रुपये

प्रकाशक का नाम   अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं.1इ, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032

संग्रह की पहली ही गजल का यह शेर देखा जा सकता है- ‘‘ये फैशन की चली आंधी कि तुलसी है उजड़ने को/यहां पर पीढ़ियां कैक्टस में आयी हैं उलझने को।’’ इसी गजल का अगला शेर टूटते संयुक्त परिवार के चलते पनप रही नितांत एकांतिकता को दर्शाता है। इस प्रसंग को बड़े ही सहज ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘‘उदासी से भरी नजरें दरख्तों से करें बातें/ कहानी दादी-अम्मा की रहा अब कौन सुनने को।’’ तुलसी का पौधा महज पूजा-केंद्र अथवा धार्मिक आस्था नहीं है। यह पीढ़ियों के बदलाव के साथ बदलते रिश्ते ही नहीं, तेजी से नगरीकरण की ओर भी इशारा करता है- ‘‘तुलसी का एक चौरा, आंगन को ढूंढ़ता हूं/ पेड़ों पे झूलों वाले सावन को ढूंढ़ता हूं।’’ ऊपर दिए कुछ गजल अंश को पढ़कर भरोसा पक्का हो जाता है कि उर्दू से आयी इस विशेष विधा ने अपने स्वयं की भाव-भंगिमा और विषय-विस्तार हासिल कर लिये हैं।

आज वह उर्दू गजल की अनुगामी नहीं, बल्कि सहगामी के स्तर पर है। सच यह है कि दुश्यंत कुमार के साथ प्रारंभ हिन्दी गजल ने अपनी व्यापक स्वीकार्यता के साथ बहुत पहले स्वतंत्र अस्तित्व बना लिया था। वेद मित्र शुक्ल इस दिशा में नयी आशा की तरह हैं। कारण यह है कि उर्दू गजलों के उलट जुल्फों, सागर-ओ-मीना के करीब रहते हुए भी उनके शेर जीवन में दैन्दिन के प्रसंग भी छूते हुए लगते हैं। हिन्दी गजल ने इन्हें बड़ी सहजता के साथ ग्रहण किया है- ‘‘हर शेर इक गजल का है जैसे जुगल किशोर/ कान्हा के होंठ, राधिका के आंगुरी हुई। उसने कही थी बात सारी दिल से ही मगर/मालूम नहीं कैसे किसकी वो बुरी हुई।’’ इस तरह की अनुभूति वैयक्तिक होते हुए भी समाजिकता को स्वर और साहस देती है- ‘‘तुम बिन जीना सीख गया मैं/ आंसू पीना सीख गया मैं। सम्बंधों के सीवन जब-जब/उघरे सीना सीख गया मैं।’’ इस संग्रह की 125 गजलों में से अधिकतर समय-साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।

गजलकार का यह पहला संग्रह विषय वैविध्य से भरा है। खास बात यह कि इसमें पृष्ठ-दर-पृष्ठ नूतनता भी झलकती है। वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र इनके बारे में कहते हैं- ‘‘डॉ. वेद मित्र नये गजलकार हैं इसलिए स्वभावत: ये नवता की ताजगी से दीप्त हैं। इनमें जीवन और जगत के दृश्यों, व्यवहारों और अनुभवों की छवियां व्याप्त हैं।….अपने समय और आस-पास के अनेक खुरदरे सत्य बोलते लक्षित होते हैं। इनमें कहीं-कहीं मिथकों के प्रयोग भी हैं।’’ डॉ. मिश्र के कथन के संदर्भ में वेद मित्र शुक्ल की पंक्तियां देखी जा सकती हंै- ‘‘अब तो केवल नाम बचा है/ होने को होती चरचा है।… सिंग उगा राजा के सिर पर/ यह जुमला फिर कहां पचा है।’’ और फिर यह भी ‘‘अब कहां अहिंसा दिखती है/ ये नहीं रिवायत में यारो!

मजबूरी नाम हुआ गांधी/आ गया कहावत में यारो!’’ लोकोक्तियों, बिंब-प्रतीक आदि के साथ शाश्वतता संग नवीन विषयों पर डॉ. वेद मित्र शुक्ल की गजलें अपने कथ्य में मूल्यों का संवहन करती हुईं आगे बढ़ती हैं। जीवन में शाश्वत और नवीनता का संगम होता ही है और यही उनके रचना संसार के केंद्र में है। इसलिए मनुष्य होने को वे न केवल सफर मानते हैं, बल्कि अपनी इन गजलों में पाठकों के सामने उसी रूप में दिखते भी हैं।


 
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