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प्रदूषण पर आखिर कब चेतेंगे हम

07/11/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'

वायु प्रदूषण पर सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी जताई है। अदालत ने दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा है कि अगर आपको लोगों की जान की परवाह नहीं है तो आप कुर्सी पर बैठने लायक नहीं हैं। सरकार के कामकाज पर इससे तल्ख टिप्पणी और क्या हो सकती है? शीर्ष अदालत ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह 100 रुपये प्रति क्विंटल देकर किसानों की पराली खरीदे। पराली काटने वाली मशीनों की खरीद के लिए किसानों को सहयोग दे। शीर्ष अदालत ने प्रदूषण के लिए सरकार की नाकामियों को जिम्मेदार माना है। वायु प्रदूषण से पूरा देश परेशान है। अपने घरों में भी लोगों का दम घुट रहा है। हवा जहरीली हो चुकी है। कोई ऐसा राज्य नहीं, जहां लोग इससे त्राहि-त्राहि न कर रहे हों। स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। विपक्ष सरकार पर प्रदूषण रोकने में विफल रहने का आरोप लगा रहा है। जीवन के हक की बात कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण पर हर कोई चिंता जता रहा है, लेकिन समाधान कोई नहीं बता रहा है। केंद्र और राज्य में बहुत सारे सलाहकार रखे गए हैं। इनमें सरकारी सलाहकार भी हैं और निजी क्षेत्र से भी हैं, लेकिन किसी भी सलाहकार ने यह नहीं बताया कि प्रदूषण की समस्या से निपटा कैसे जा सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय ने सलाहकारों-विशेषज्ञों से पूछा है कि दिल्ली में प्रदूषण से कैसे निपटा जा सकता है? सलाहकार समय पर सलाह भी न दे सके तो क्या मतलब? सर्वोच्च न्यायालय की इस बात में दम है कि साल-दर-साल दिल्ली वायु प्रदूषण के चलते गैस चैंबर बनती जा रही है और सरकार उसका निदान नहीं कर पा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत ग्राम प्रधान से लेकर राज्य के मुख्य सचिव तक को नोटिस भेजने का निर्देश दिया है। पराली रोकने में अक्षम पुलिस के खिलाफ भी कार्रवाई करने की बात अदालत ने कही है। यह बड़ा निर्णय है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, कार्रवाई का भय नहीं होगा, तब तक लोग समस्या की गंभीरता को न तो समझेंगे और न ही सचेष्ट होंगे।
वायु प्रदूषण के लिए पराली को जिम्मेदार माना जा रहा है। पराली जलाने वाले किसानों पर कार्रवाई की जा रही है। लेकिन वायु प्रदूषण की अकेली वजह पराली और कूड़े का जलना ही नहीं है। किसी भी शहर में आबादी से थोड़ा ही कम वाहनों की तादाद है। यातायात सिग्नल लाल होने पर सड़क पर वाहन ही वाहन नजर आते हैं। इनमें से सभी वाहन ध्वनि और वायु प्रदूषण के मानकों पर खरा ही उतरते हों, ऐसा भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में 15 साल से अधिक पुराने पेट्रोल और 10 साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों को सड़कों पर से हटाने का आदेश दिया था। उन्हें दिल्ली की सीमा से तो बाहर किया गया था लेकिन उनका संचालन अवरुद्ध नहीं हुआ। वे दिल्ली से सटे राज्यों में पहुंच गए। दिल्ली में कल-कारखानों की भी कमी नहीं है। बहुत सारे कारखाने कोयले से भी चलते हैं। बिजली से चलते हैं। बड़े-बड़े जनरेटरों से चलते हैं। उन जनरेटरों का धुआं कहां जाता है, इस पर शायद ही कभी किसी ने विचार किया हो। अन्य राज्यों से आने वाले वाहनों से पूरी रात दिल्ली के व्यापारिक इलाके पटे रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने दीपावली पर पटाखे नहीं जलाने की हिदायत दी थी। लेकिन दिल्ली ही नहीं, देशभर में लोगों ने पटाखे फोड़ने के अपने सुख में कटौती नहीं की। यह भी नहीं सोचा कि इसका श्वांसरोगियों और हृदय के रोगियों पर क्या असर पड़ेगा? वातावरण पर क्या असर पड़ेगा? क्या हम जीने के लिए भी अदालत के आदेश का इंतजार करते रहेंगे? 
सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि हर साल ऐसा होता है। करीब 14 साल से इस तरह के हालात बन रहे हैं फिर भी सरकारें इस समस्या का समाधान नहीं तलाश पा रही हैं, यह चिंताजनक बात है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिल्ली के प्रदूषण पर पंजाब और हरियाणा से जानना चाहा है कि हर साल पराली जलती है। ये क्यों हो रहा है? राज्य सरकार क्या कर रही है? इसे तुरंत रोको। इसके उल्लंघन पर ऊपर से नीचे तक जिम्मेदारी तय होगी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी हरियाणा और पंजाब से अपनी नाखुशी जताई है। कहा गया है कि प्रदूषण रोकने को लेकर वे सभी जरूरी उपाय करें। निर्माण कार्यों को पूरी तरह से बंद करें और उद्योगों से निकलने वाले कचरे पर भी निगरानी रखें। दिल्ली के मुख्य सचिव को उच्च अधिकारियों की अगुवाई में विशेष टीमें गठित करने को भी कहा गया है।
वैसे भी जितनी कवायद आज हो रही है, वह प्यास लगने के बाद कुआं खोदने जैसी है। इस तरह की समस्या आए ही नहीं, बंदोबस्त तो इस बात का होना चाहिए। इसके लिए हर नागरिक को सजग रहना होगा। प्रदूषण व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक समस्या है, इससे सामूहिक रूप से ही निपटा जा सकता है। यह राजनीति का विषय नहीं है। इसलिए इस पर राजनीति न हो तो ही अच्छा है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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