युगवार्ता

Blog single photo

‘हिन्दू राष्ट्र’ निर्माण ही हमारा उद्देश्य

28/10/2019

‘हिन्दू राष्ट्र’ निर्माण ही हमारा उद्देश्य

सौरव राय

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील अम्बेकर द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘द आरएसएस रोडमैप्स फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी’ आजकल चर्चा में है। पुस्तक संघ को ध्यान में रखकर लिखी गई है। क्या है आरएसएस? कैसी रही उसकी संघर्ष गाथा तथा आने वाले समय में क्या रहेगा उसका रोड मैप। इन सभी विषयों पर यह किताब विस्तार से व्याख्या करती है। इस पुस्तक में कुल दस अध्याय हैं। इन अध्यायों को कुल 223 पृष्ठों में समेटा गया है।

वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी पहचान का मोहताज नहीं है। फिर यह प्रश्न उठता है कि यह किताब क्यों? संघ को लेकर कई तरह की समाज में भ्रांतियां हैं। उन सभी भ्रांतियों को यह किताब दूर करने का एक सफल प्रयास है। यह किताब एक तरह से संघ की वैचारिकी और उसके भविष्य की योजना को साफ तौर पर रेखांकित करती है। किताब में उन सभी मुद्दों पर बिना लाग लपेट के वैचारिक प्रतिबद्धता को मजबूती से रखते हुए, संघ की विचारधारा को सामने रखा है। किताब की शुरुआत संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार के संघर्षों से होते हुए आगे बढ़ती है। आजादी के समय नागपुर राष्ट्रीय आन्दोलन का केंद्र था।
हेडगेवार पर बाल गंगाधर तिलक और संत रामदास का सबसे अधिक प्रभाव था। केसरी में छपे उनके हर लेख को वे पढ़ते थे। बंगाल बाढ़ में हेडगेवार ने एक-एक झोपड़ी में जाकर गरीबों का इलाज किया था। कैसे पहली बार डा. मुंजे ने हेडगेवार को उनके हीरो तिलक से मिलवाया था। और उसका क्या प्रभाव रहा। इन सभी घटनाओं को किताब में उद्धरित किया गया है। आरएसएस के वैचारिक विरोधी यह सवाल खड़ा करते हैं तथा हमेशा कहते हैं कि आजदी की लड़ाई में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है। इस भ्रान्ति को यह किताब दूर करती है।
किताब में साफ लिखा गया है की गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान हेडगेवार भी जेल गये थे। इसके साथ ही भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान नागपुर से नजदीक एक गांव ‘आष्टी’ में आठ लोगों को अंग्रेजों द्वारा फांसी दे दी गई। जिसमें से दो शहीद, स्वयंसेवक थे। इन घटनाओं के माध्यम से यह पुस्तक इस बात की पुष्टि करती है कि आजादी की लड़ाई में आरएसएस का योगदान था। किताब कश्मीर मसले से लेकर, गौ-रक्षा, भाषा के प्रश्न,लिव-इन रिलेशनशिप, नारीवाद, सेकुलरवाद, समलैंगिक संबंधों, तथा हिन्दुत्व की अवधारणा इन सभी मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखती है। पुस्तक के अनुसार नारीवाद की पूरी संकल्पना पश्चिम की है।
यह वाद भारतीय समाज के अनुकूल नहीं है। हर समाज की एक व्यवस्था होती है। और उस सामाजिक व्यवस्था में ही उसका हल निकला जा सकता है। कभी भी सामाजिक व्यवस्था में उधार की व्यवस्था से सुधार नहीं किया जा सकता। इसी तरह सेक्युलरवाद को भी यह पुस्तक नकारती है। इसे भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं मानती। पुस्तक में गांधी जी से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है। जिसमें यह बताया गया है कि 25 दिसम्बर 1934 को गांधी जी वर्धा के संघ कैंप में आये, उस वक्त कुल पन्द्रह सौ स्वयं सेवक अपनी वर्दी में थे। संघ का अनुशासन और कैम्प की साफ सफाई देख गांधी जी खुश हुए और इस बात को उन्होंने हेडगेवार के करीबी अप्पाजी जोशी जिन्होंने संघ की स्थापना में हेडगेवार के साथ मिलकर बड़ी भूमिका निभाई थी, से कहा कि ‘मैंने इससे अधिक आकर्षक दृश्य नहीं देखा’। गांधी जी को तब और आश्चर्य हुआ जब पूछने पर उन्हें बताया गया संघ एक रुपये में अपने स्वयंसेवकों के लिए नौ मील (भोजन) की व्यवस्था करती है।
जबकी गांधी जी के अनुसार वहीं कांग्रेस उस समय में एक रुपये में दो मील (भोजन) की व्यवस्था ही कर पाती है। गांधी जी ने दोबारा 16 सितम्बर 1947 को संघ की वाल्मीकि शाखा में गये और संघ की फिर तारीफ की। पुस्तक में यह बात स्पष्ट रूप से लिखी गई है कि कैसे अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा समाज में गलत तथ्यों के साथ इतिहास पढ़ाया गया है। इसमें हिंदुत्व और उसकी विचारधारा को स्पष्ट रूप से समझाने की कोशिश की गई है। वर्ण व्यवस्था और सामाजिक न्याय की अवधारणा क्या है? इसे कैसे संघ देखता है? इसे भी बताने का प्रयास किया गया। यह पुस्तक संघ की स्थापना से पहले से शुरू होकर उसके भविष्य की योजना पर विस्तार से बात करती है। इस पुस्तक के अनुसार हिन्दू महासभा और आरएसएस में अंतर है।
इसका उद्देश्य हिन्दुओं के राजनैतिक प्रतिनिधित्व को स्थापित करना था। जबकी संघ इससे इतर भारतीयता को मानता है। उसका मानना है कि भारत में पैदा होना वाला हर व्यक्ति भारतीय है। पुस्तक इस बात को स्पष्ट रूप से बताती है कि संघ के अनुसार 21वीं सदी का भारत कैसा होगा। पुस्तक के अनुसार संघ का एक उद्देश्य है भारत को महान बनाना तथा एक मजबूत हिन्दू समाज स्थापित करना। संघ के कई आनुषंगिक संगठन भी हैं। उनका भी समाज में अपना योगदान है जैसे विद्यार्थिओं के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती, स्वदेश जागरण मंच आदि।
यह सभी संघ की ही विचारधारा से समाज को परिचित कराते हैं। संघ के पास अपना लिखा हुआ कोई विस्तृत इतिहास नहीं है। जिसकी वजह से वह विरोधिओं के निशाने पर रहता है। गांधी जी का प्रसंग भी हमें गांधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई के संकलन से प्राप्त हुआ। इस तरह की तमाम घटनाएं हैं, जिनसे आम जन अपरचित है। पुस्तक की यह खूबसूरती है कि कम पन्नो में अधिक से अधिक चीजों को उद्धरित किया है। लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है। इसे थोड़ा और विस्तृत होना चाहिए था। जिससे पाठकों को संघ को जानने समझने का ज्यादा मौका मिलता। संघ को महिला विरोधी भी समझा जाता है लेकिन शायद कम लोगों को पता है कि हेडगेवार संघ की स्थापना के कुछ समय बाद ही लक्ष्मीबाई केलकर के सहयोग से महिलाओं के लिए राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना की। जिसने 1936 में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया।

इस किताब को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि जैसे संघ से कोई खुले तौर पर सवाल कर रहा है और यह किताब उन सभी सवालों का स्पष्ट तौर पर जवाब दे रही है। मैं उन सभी लोगों से कहना चाहूंगा, जिन्हें संघ को लेकर किसी तरह का सवाल है वे लोग इस किताब को जरूर खरीदें और पढ़ें। वैसे तो यह किताब एक बार सभी को पढ़ना चाहिए।

यह समिति संघ के नियम पर ही चलती है। यहां भी वैसी ही कार्य पद्धति है जैसी संघ में है। इस पुस्तक के अध्याय दस में,संघ में महिलाओं का योगदान और सेविका दल की कार्य पद्धति और समाज में किये जा रहे योगदान को रेखांकित किया गया है। संघ के दूसरे सरसंघचालक के अनुसार संघ का उद्देश्य है राष्ट्र की पूजा और आदर्श की पूजा करो। संघ का मूल; भाव ही व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण है। किताब कुछ जगहों पर अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई भी दिखती है। शुरुआती अध्याय में तथ्यात्क सूचनाओं के साथ संघ और उसकी कार्य पद्धति को जानने में रोचकता और क्रमबद्धता है, परन्तु बाद के अध्यायों में थोड़ी सी शिथिलता दिखती है।
जो इसकी रोचकता को थोड़ा मद्धम कर देती है। परन्तु इसके बावजूद अन्य अध्याय सारगर्भित हैं। इस किताब को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि जैसे संघ से कोई खुले तौर पर सवाल कर रहा है और यह किताब उन सभी सवालों का स्पष्ट तौर पर जवाब दे रही है। मैं उन सभी लोगों से कहना चाहूंगा,जिन्हें संघ को लेकर किसी तरह का सवाल है, वे लोग इस किताब को जरूर खरीदें और पढ़ें। वैसे तो यह किताब एक बार सभी को पढ़ना चाहिए। खास तौर से संघ के विरोधियों को इससे उन्हें अनर्गल आशंकओं से निजात मिलने के साथ ही तथ्यहीन आलोचना से भी बच सकेंगे।



 
Top