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जरूरत गांधी के विचारों को जीवन में उतारने की है

01/10/2019

(महात्मा गांधी की जन्म जयंती, 2 अक्टूबर पर विशेष)

सियाराम पांडेय 'शांत'
देश महात्मा गांधी की 150वीं जन्म जयंती मना रहा है। कोई संकल्प यात्रा निकाल रहा है तो कोई शोभा यात्रा। देश का कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं जिसने गांधी जयंती पर कुछ बड़ा करने और मीडिया की नजरों में आने की सोची न हो। महात्मा गांधी की 150वीं जन्म जयंती मनाना गौरव की बात है। उससे भी बड़ी बात है अपने किसी महापुरुष की स्मृतियों को इतने लंबे अंतराल तक जीवंत बनाये रखना। सब गांधी पर एकाधिकार चाहते हैं। नहीं चाहते हैं तो बस उनके सिद्धांतों पर चलना। गांधीजी के पास एक लाठी थी। आज हर नेता के पास गांधी की लाठी है। वह उनके विचारों से खेल रहा है। महात्मा गांधी का जन्मदिन मनाने का चलन देश की आजादी के बाद शुरू हुआ था। आजादी के एक साल बाद ही क्रूर काल ने उन्हें हमसे छीन लिया था लेकिन जबसे गांधी जयंती मनाने का सिलसिला आरंभ हुआ, तब से आज तक यह थमा नहीं है। हर साल उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर देश महात्मा गांधी को याद करता है। उनकी त्याग और तपस्या पर रस्क करता है। उनके विचारों पर चलने का संकल्प लेता है। कुछ दिनों अपने संकल्प पर चलने का प्रयास भी करता है लेकिन फिर अपनी रामधुन में रम जाता है। जब 'नून, तेल और लकड़ी' की याद आती है तो ऐसे में गांधी को याद करना कठिन हो जाता है। गांधीजी के सिद्धांतों पर अमल करना तो बहुत दूर की बात है। गांधी जी के सिद्धांत सम्मान दिला सकते हैं, महान बना सकते हैं लेकिन लखपति-करोड़पति बनने में सहायक नहीं हो सकते। आज व्यक्ति चाहता है कि जल्दी धनवान बन जाए। उसका मानना है कि धन है तो सम्मान खुद पीछे चलकर आ जाएगा। इसलिए वह येन-केन प्रकारेण धन संचय की जुगत में लगा रहता है। गांधीजी धन संचय के खिलाफ थे। भारतीय समाज में अब शायद ही कोई ऐसा हो जो धन न चाहता हो। धन की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन जब पैसे को ही धर्म मान लिया जाता है तो समरसता के भाव दम तोड़ देते हैं। यह ठीक है कि इस भौतिक परिवेश में पैसे की अहमियत है। पैसे के बिना कोई काम नहीं होता लेकिन धनोपार्जन की शुचिता और परिश्रम के महत्व को तो समझा ही जाना चाहिए। इस भाव भूमि से पृथक होकर न तो हम खुद प्रसन्न रह सकते हैं और न ही अपने सान्निध्य में आने वालों को प्रसन्नता दे सकते हैं। 
महात्मा गांधी धनोपार्जन से मना नहीं करते लेकिन संतोष के भाव को मरने न देने की भी सलाह देते हैं। आज लोगों की जिंदगी से संतोष का भाव तिरोहित हो गया है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन में सात सिद्धांतों सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, प्रार्थना और स्वास्थ्य रक्षा का अनुपालन किया था। लोगों से अपेक्षा की थी कि वे भी उनके सात सिद्धांतों पर अमल करें। इनमें से एक भी सिद्धांत काटने-बराने लायक नहीं हैं लेकिन गांधी के सिद्धांतों पर चलने का मतलब है तेज धार वाली दुधारी तलवार पर चलना। दहकते हुए अंगारे पर चलना। जब जुआ, तस्करी और हेराफेरी से धन आ सकता है। शेयर बाजार से धन आ सकता है, तो श्रम करने और कोल्हू का बैल बनने की जरूरत क्या है? गांधीजी ताजिंदगी सत्य के आग्रही रहे। आजादी की पूरी जंग सत्य और अहिंसा के सिद्धांत पर लड़ी गई। वायसराय लार्ड कर्जन ने भारतीय सत्य की यह कहकर खिल्ली उड़ाई कि भारत में सत्य यूरोप से आया है तो उन्हें गलत ठहराते हुए गांधी जी ने कहा था कि भारत में सत्य का स्थान बहुत पुराना है। यहां सत्य परमात्मा का रूप है। गांधीजी मन, वाणी और शरीर से किसी को भी कष्ट देने के हिमायती नहीं थे। उग्र विचारधारा के क्रांतिकारियों से वे स्नेह तो रखते थे, लेकिन उनके विचारों को उन्होंने कभी भी अहमियत नहीं दी। गांधीजी की सोच थी कि अपने पास उतना ही धन रखा जाय जितनी कि जरूरत हो। वे कबीरदास की विचारधारा में यकीन रखते थे कि 'साईं इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय।' उनके अपरिग्रह के सिद्धांत पर अगर इस देश के नेताओं और नौकरशाहों, व्यापारियों और समाजसेवियों ने अमल किया होता तो देश में घपलों-घोटालों की लहलहाती पौध के दीदार ही नहीं होते। उनका अस्तेय का सिद्धांत तो चोरी से बचने की सलाह देता है। वे मानते थे कि दूसरे का हिस्सा अपने पास रखना या उस पर कब्जा करना भी एक तरह की चोरी ही है। गांधी के सात सिद्धांत जिन्होंने उन्हें महात्मा बनाया। जिसने उन्हें राष्ट्रपिता होने का गौरव दिलाया। अगर उस पर भारतीय समाज अमल कर ले तो देश का कायाकल्प हो जाए। देश में रामराज्य आ जाए। अमीर और गरीब का भेद मिट जाए। सहिष्णुता और सहकारिता के भाव परवान चढ़ जाए। गांधी जी 'सादा जीवन, उच्च विचार' के पक्षधर रहे हैं। 
गांधी जयंती पर अनेक संकल्प लिए जा रहे हैं। उनमें एक संकल्प सिंगल यूज्ड पॉलिथीन से देश को निजात दिलाने की भी है। स्वच्छता को अपनाने की भी है। स्वच्छता तन की ही नहीं, मन की भी होनी चाहिए। गांधीजी ने देश की आजादी के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी थी। अब हमें उस आजादी को बचाए रखने की लड़ाई लड़नी है। उस समय भारत अंग्रेजों से लड़ रहा था। आज भारत अपने ही बीच छिपे आस्तीन के सांपों से लड़ रहा है। देश को तोड़ने की राजनीतिक, सामाजिक दुरभिसंधियां पूरे शबाब पर हैं। इसे रोकना होगा। बाहर के शत्रुओं से तो हम फिर भी लड़ सकते हैं लेकिन अपनों से लड़ना बेहद कठिन है। गांधी के सिद्धांत ही ऐसे में आशा की किरण दिखाते हैं। जब तक देश बापू के सिद्धांतों पर अमल नहीं करता, तब उनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने का कोई औचित्य नहीं है। हमें सत्याग्रही और अपरिग्रही होना होगा और यही वक्त का तकाजा भी है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।) 


 
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