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मोदी अर्श पर, मोदीनॉमिक्स फर्श पर

03/09/2019

अम्बिकानंद सहाय

भारत अपने वर्तमान समय में एक आश्चर्यजनक विरोधाभासी दौर से गुजर रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रसिद्धि तेज गति से बुलंदियों को छू रही है, दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था तेज गति से नीचे की तरफ लुढ़कती नजर आ रही है। लेकिन इसको लेकर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। हमारी सकारात्मक दृष्टि नकारात्मक सोच से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है। उम्मीद की जा सकती है कि प्रधानमंत्री आर्थिक मोर्चे पर देर-सबेर अपनी पकड़ पहले की तुलना में और भी ज्यादा मजबूत कर लेंगे।
पहले आर्थिक मंदी पर चर्चा कर लेते हैं, जो इन दिनों मीडिया/अखबारों में सुर्खियां बनी हुई है। हममें से कितने लोग हैं जिन्हें याद है कि 2008 में आई वैश्विक महामंदी से भारत ने किस तरह से खुद को उबारा था? उस दौर की महामंदी को 1929 के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे खराब दौर माना गया था। उसकी तुलना में देखा जाए तो 2019 का वर्तमान परिदृश्य राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतना भी बुरा नहीं है। इसके बावजूद खुद को 'कयामत का पैगम्बर' मानने वालों के कहने पर ढेरों सवाल दिमाग को झकझोरते हैं। पर, आखिर हमें उनकी बातों पर ध्यान ही क्यों देना चाहिए, फिर वे चाहे डॉ. मनमोहन सिंह, डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी या रघुराम राजन जैसे आलोचक ही क्यों न हों। ये सभी अनुमान लगा रहे हैं कि सरकार आने वाले कई हफ्तों और महीनों तक इस समस्या का समाधान नहीं निकाल पाएगी? और यह भी कि क्या हम वर्तमान दौर की समस्या की मूल जड़ की सही तरह से पहचान कर पाए हैं?
वस्तुतः सामान्य समझ इतनी भी सामान्य नहीं होती। हम अक्सर ही सोशल मीडिया पर सामान्य से लेकर मेधावी, कथित विशेषज्ञ नहीं, के सम्पर्क में आते हैं। ऐसे ही एक अनाम लेखक ने व्हाट्स एप्प पर लिखा है :
 "कार की बिक्री गिर रही है ... लेकिन ओला / उबर की सेवाएं बढ़ रही हैं। रेस्तरां खाली हो रहे हैं ... लेकिन होम डिलीवरी में लगातार इजाफा हो रहा है। ट्यूशन क्लासेज चलाने वालों को पर्याप्त संख्या में छात्र नहीं मिल रहे हैं ... लेकिन ऑनलाइन शिक्षा में इजाफा हो रहा है। कमीशन आधारित पुराने कारोबार अंतिम सांसें गिन रहे हैं ... लेकिन कम लागत पर ऑनलाइन सेवाएं लेने वालों की तादाद बढ़ रही है। स्थिर ( एक मायने में सरकारी ) नौकरियां घट रही हैं ... लेकिन "स्टार्ट-अप" के जरिये समतुल्य व लचीली नौकरियों में विस्तार हो रहा है।
यह अनाम लेखक आगे लिखते हैं, ‘आज हम जो महसूस कर रहे हैं, वो बदलाव का दौर है। कोई भी बदलाव पूर्व स्थापित मान्यता या व्यवस्था के लिए पीड़ादायक ही होता है। आज के समय में सुनील गावस्कर स्टाइल-35 नॉट आउट से मैच नहीं जीते जा सकते। हमें आज रोहित शर्मा और विराट कोहली स्टाइल की बल्लेबाजी की जरूरत है।'' फिर उनकी पंच लाइन आती है: 'अर्थव्यवस्था बुरे दौर से नहीं गुजर रही है ... बल्कि पूरी दुनिया में कारोबार करने के तरीके बदल रहे हैं।'
तेजी से बदलते समय के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए, एक देश को सबसे पहले एक मजबूत इरादों वाले शक्ति केन्द्र, मजबूत इरादों वाले नेतृत्व की जरूरत होती है, जो बिगड़ैल सांड को उसके सींगों से पकड़ कर काबू कर सके। इसलिए यह समय है जब हम हम नरेन्द्र मोदी की निरन्तर निखरती छवि को निष्पक्ष और तटस्थ तरीके से देखें। यह उनके करिश्माई व्यक्तित्व और आक्रामक वाकपटुता का ही परिणाम है कि बालाकोट हवाई हमले के साये में हुए 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आई। दुनियाभर के लोकतंत्रों ने उन्हें 'महान नेता, काम ही जिसकी पहचान है' के रूप में स्वीकार किया है। भारत में उनके कई विरोधी भी उन्हें 'राजनीतिक स्तंभ' मानने लगे हैं।
थोड़ी हैरानी तब भी हुई जब सत्ता वापसी के तीन महीनों के अंदर ही मोदी सरकार तीन तलाक और अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन जैसे दो विधेयकों को सफलतापूर्वक पास करने में सफल हुई। ऐसा तब हुआ, जबकि संसद के उच्च सदन यानि राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं था। इसके बाद से नरेन्द्र मोदी महानायक के तौर पर स्थापित हुए हैं। इसके विपरीत, विपक्ष के सभी बड़े और सियासी धुरंधर नेताओं ने जैसे अपनी सारी चमक ही खो दी। खास तौर पर राहुल गांधी भारत के राष्ट्रीय मंच पर पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच की बात करें तो वहां भी नरेन्द्र मोदी उतने ही सफल साबित हुए हैं। लगभग पूरी दुनिया उन्हें जम्मू और कश्मीर के मुद्दे पर अपना समर्थन दे रही है। यहां तक कि सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान के एकमात्र मित्र चीन ने भी कूटनीतिक रूप से इस मुद्दे से तटस्थ रहना ही मुनासिब समझा है।
राजनीति में धारणा ही बहुत मायने रखती है। नरेन्द्र मोदी अभी लंबे टिके रहने वाले हैं। उन पर लोगों का भरोसा कायम है। इसलिए सियासी पंडितों की भविष्यवाणी भूल जाइए। देश की अधिकांश जनता यही मानती है कि यही वह करिश्माई व्यक्तित्व है  जो देश को दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि के रास्ते पर ला सकता है। तब फिर जल्दी क्या है ?
लोगों की तो यही राय है। इसलिए उन्हें कुछ समय दिया जाना चाहिए। मुश्किल में घिरी समुद्री नाव को निकालने के लिए नाविकों को ज्यादा स्थान देने की जरूरत होती ही है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।) 


 
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