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फेल होगा ट्रंप का जीएसपी दांव

19/06/2019

फेल होगा ट्रंप का जीएसपी दांव

विनय के पाठक

अमेरिका ने भारत से जनरलाइज्ड सिस्टम आॅफ प्रेफरेंस यानी जीएसपी का दर्जा छीन लिया है। इसके बावजूद भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंध पूर्ववत की तरह जारी रहेंगे।

अमेरिका ने आखिरकार भारत को मिला कारोबारी वरीयता का दर्जा जनरलाइज्ड सिस्टम आॅफ प्रेफरेंस यानी जीएसपी को खत्म कर ही दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल 4 मार्च को ही कहा था कि भारत को जनरलाइज्ड सिस्टम आॅफ प्रेफरेंस के दायरे से बाहर किया जा सकता है। उनका तर्क था कि इस सुविधा के तहत भारत को अपने उत्पादों के निर्यात पर अमेरिका में तो टैक्स छूट मिल रही है, लेकिन भारत अमेरिकी उत्पादों के आयात पर टैक्स छूट देने के बारे में कोई ठोस आश्वासन नहीं दे रहा है।
मोटे तौर पर देखा जाए तो अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले से भारतीय निर्यात को फौरी झटका लग सकता है। फिलहाल जीएसपी के तहत विकासशील देशों को आॅटोमोबाइल के कल पुर्जे और टेक्सटाइल समेत लगभग 2,000 से ज्यादा उत्पादों को बिना ड्यूटी चुकाए अमेरिकी बाजार में बेचने की छूट मिली हुई है। अगर भारतीय निर्यात की बात करें तो पिछले वित्त वर्ष में भारत ने अमेरिका को इस सुविधा के तहत 5.6 अरब डॉलर के उत्पादों का निर्यात किया था, जिसमें जीएसपी की सुविधा की वजह से भारत को 19 करोड़ डॉलर की टैक्स छूट मिली थी। इसके पूर्ववर्ती वर्ष में भारत को जीएसपी के तहत 17.2 करोड़ डॉलर की टैक्स छूट मिली थी। कहने का मतलब यही है कि जीएसपी सुविधा छिन जाने से भारत को राजस्व बचत के मामले में कोई बहुत बड़ा नुकसान होने नहीं जा रहा है। निश्चित रूप से जीएसपी की सुविधा छिन जाने से भारत से निर्यात होने वाले सभी उत्पाद वहां टैक्स छूट की सुविधा से वंचित हो जाएंगे, जिसकी वजह से वे अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे और उनकी मांग पर नकारात्मक असर पड़ेगा


लेकिन पिछले चार वर्षों में भारतीय उत्पादों का निर्यात यूरोपीय तथा मिडिल ईस्ट के देशों में जिस तेजी से बढ़ा है और भारत जिस आक्रामक रणनीति के तहत यूरोपीय तथा मिडिल ईस्ट के बाजार पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है, उससे साफ है कि अमेरिका की ओर से जीएसपी की सुविधा खत्म कर दिए जाने के बाद भी भारत के सकल निर्यात पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा। ट्रेड एनालिस्ट वी. मुत्थुराजन के मुताबिक पिछले 4 सालों में मिडिल ईस्ट के बाजार में भारत का निर्यात औसतन 13 फीसदी प्रति वर्ष की रतार से बढ़ा है। जबकि यूरोपियन बाजार में भारतीय निर्यात की औसत विकास दर पिछले चार वर्षों में 17.2 फीसदी रही है। इस लिहाज से अमेरिका की ओर से होने वाले नुकसान की भरपाई एक साल से भी कम समय में यूरोपीय बाजार और मिडिल ईस्ट के बाजार से की जा सकती है। मुत्थुराजन का कहना है कि अमेरिका की नीति भारत और अन्य विकासशील देशों को अपने मुट्ठी में जकड़ कर रखने की है।
पहले पाकिस्तान को उसने अपनी कठपुतली बनाया हुआ था और अब चीन के चुनौतियों का सामना करने के लिए वो भारत को अपनी कठपुतली बनाने की कोशिश में लगा है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों के जानकार निर्मल कुलकर्णी का कहना है कि अमेरिका की ओर से 40 साल से अधिक समय से लागू इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य अधिकांश विकासशील देशों को अपने पाले में रखने की रही है। जीएसपी का झुनझुना दिखाकर अमेरिका इतने सालों से विकासशील और छोटे देशों को अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर करने की कोशिश करता रहा है। तब पूंजी के लिहाज से अमेरिका दुनिया के तमाम देशों से काफी आगे था, लेकिन पिछले कुछ सालों से चीन और भारत के रूप में दो एशियाई देशों ने जिस तरह से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है, उसकी वजह से अमेरिका को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति का अपना सिंहासन डोलता हुआ नजर आने लगा है।


इसके साथ ही डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट की नीति भी प्रायोगिक तौर पर उसे विकासशील देशों को दी जाने वाली सुविधा वापस लेने के लिए बाध्य करती है। एसे में अगर डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी प्रशासन ने 5 जून से भारत को मिल रही जीएसपी की सुविधा खत्म कर दी है, तो इसको लेकर अधिक आश्चर्य नहीं करना चाहिए। इंटरनेशनल ट्रेड के जानकार सुदीप्तो मजूमदार का मानना है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा चीन और मैक्सिको जैसे कारोबारी साझेदारों के खिलाफ छेड़े गए ट्रेड वार का खामियाजा भारत को जीएसपी सुविधा गंवाकर भुगतना पड़ा है। इस सुविधा को खत्म किए जाने के पक्ष में अमेरिका ने जो तर्क रखा है, उसमें उसने अपने व्यापार घाटे को प्रमुख कारण बताया है। लेकिन सच्चाई यह भी है की अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा मैक्सिको तथा चीन की तुलना में नगण्य है।
भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 25 अरब डॉलर का है, जबकि चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 420 अरब डॉलर का है। एसे में निश्चित रूप से व्यापार घाटा को जीएसपी खत्म करने की वजह बताना तर्कसंगत नहीं है। इंटरनेशनल रिलेशन एनालिस्ट सुनील वर्णवाल का कहना है कि अमेरिका का यह कदम हैरान करने वाला है। क्योंकि एक ओर तो वो भारत से जीएसपी की सुविधा वापस ले रहा है, दूसरी ओर वो चीन के खिलाफ अपने संघर्ष में भारत को अपने पाले में भी खड़ा रखना चाहता है। ये दोनों ही बातें परस्पर विरोधी हैं। एसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है की अमेरिका के इस कड़े कदम की वास्तविक वजह क्या है। वहीं वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सरकार ने बीते दो महीने में कई दौर की वार्ता में ट्रंप प्रशासन को यह समझाने की कोशिश की थी कि बातचीत के जरिए अमेरिका के व्यापार घाटे के मुद्दे पर एक राय बनाई जा सकती है। भारत ने अपनी ओर से समाधान के रूप में कुछ सुझाव भी अमेरिकी प्रशासन को दिए थे, लेकिन अमेरिका फर्स्ट की नीति और भारत सरकार द्वारा मेक इन इंडिया को बढ़ावा दिए जाने से अमेरिका को अपने बाजार पर खतरा मंडराता हुआ नजर आने लगा है। डोनाल्ड प्रशासन पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि व्यापारिक मुद्दों में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को ज्यादा तरजीह देने लगा है। स्वाभाविक रूप से हर देश अपने हितों को ही ज्यादा तरजीह देता है।
यदि कोई द्विपक्षीय समझौता न हो तो बाजार पर काबिज होने के लिए दरों में कमी करने का भी तरीका अपनाया जाता है। इसलिए भारत एसा कुछ भी नहीं कर रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मूल सिद्धांतों के विपरीत हो। इसके बावजूद अगर अमेरिका ने भारत से जीएसपी की सुविधा छीन ली है, तब भी भारत ने यूरोपीय और मिडिल ईस्ट के बाजार पर अपना ध्यान केंद्रित कर स्पष्ट कर दिया है कि वह मामूली व्यापारिक फायदे के लिए अमेरिका का पिछलग्गू बनने की नीति पर नहीं चलेगा। जीएसपी की सुविधा वापस लिए जाने के बाद भारत सरकार की ओर से जारी बयान में साफ कहा गया है कि ‘यह सुविधा अमेरिका समेत विकसित देशों की तरफ से भारत समेत कई विकासशील देशों को दी जा रही थी। यह सुविधा देना पहले भी उनका ही फैसला था और इस सुविधा को वापस लेना भी पूरी तरह से उनका ही फैसला है। इस सुविधा के बदले में विकासशील देशों की ओर से अमेरिका या अन्य विकसित देशों को कुछ भी देने की बाध्यता कभी नहीं रखी गई थी।’ भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि निर्यात में उत्पादों को मिलने वाले रियायतों को द्विपक्षीय संबंधों को लेकर होने वाली बातचीत का आधार नहीं बनाया जा सकता है।
इसी वजह से जीएसपी की सुविधा छिन जाने के बाद भी भारत अमेरिका के साथ अपने कूटनीतिक संबंध पहले की तरह ही कायम रखेगा। निर्यात संगठनों के फेडरेशन फियो के अध्यक्ष गणेश कुमार गुप्ता का भी मानना है कि अमेरिका के इस फैसले का भारतीय निर्यात पर काफी सीमित असर होगा। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका को होने वाला निर्यात महज 8 फीसदी है। एसे में कुछ खास उद्योगों को शुरुआती दौरमें मामूली झटका अवश्य लग सकता है, लेकिन आने वाले दिनों में इस नुकसान की भरपाई आसानी से कर ली जाएगी। एसे भी भारत को जीएसपी की सुविधा के साथ निर्यात करने पर भी अमेरिकी निर्यात पर औसतन 5.9 फीसदी का लाभ हो पाता था, क्योंकि इस सुविधा के तहत निर्यात किए जाने वाले उत्पादों को अमेरिका में एक निश्चित दर से अधिक कीमत पर न बेचे जाने की शर्त जीएसपी की मूल प्रस्तावना में ही शामिल की गई है। वहीं यूरोपीय बाजार और मिडिल ईस्ट के बाजार में निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर भारतीय निर्यातकों को औसतन 12.3 फीसदी का फायदा मिल जाता है।

भारत को जीएसपी की सुविधा के साथ निर्यात करने पर भी अमेरिकी निर्यात पर औसतन 5.9 फीसदी का लाभ हो पाता था।

एसे में अगर अमेरिका को भारतीय उत्पादों का निर्यात होना पूरी तरह से बंद भी हो जाए, तब भी लाभदेयता के लिहाज से भारतीय निर्यातकों को कोई नुकसान नहीं होगा। स्पष्ट है कि अमेरिका ने भारत को जीएसपी के नाम पर एक बार फिर से दबाव में लाने की कोशिश की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार विकसित करने की दिशा में पिछले चार वर्षों में भारत ने जिस आक्रामक तरीके से काम किया है, उसकी वजह से भारतीय निर्यातक अपनी पैठ बनाने में सफल होते नजर आने लगे हैं। और भारत की यही आक्रामक नीति आने वाले दिनों में भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में भी अग्रसर करेगी।


 
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