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पाकिस्तान में बंद 'शिवालय' के खुल जाने का अर्थ

11/07/2019

मनोज ज्वाला
पाकिस्तान के इस्लामी शासन की मजहबी असहिष्णुता से अतिक्रमित सैकड़ों मन्दिरों में से एक शताब्दियों पुराना 'शिवालय तेजा सिंह मन्दिर' 72 वर्षों बाद वहां के पीड़ित-प्रताड़ित हिन्दुओं को वापस मिल गया है। ऐसा वहां की हुकूमत के हुक्म से हुआ है। स्यालकोट शहर में अवस्थित 10वीं शताब्दी का बना हुआ वह शिव-मन्दिर सन 1947 से ही विभाजनजनित मजहबी दहशतगर्दी व 'इस्लामिक स्टेट' की बेअदबी के कारण बंद था। पाकिस्तान में जगन्नाथ मन्दिर व गोरखनाथ मन्दिर सहित सैकड़ों ऐसे देवालय व गुरुद्वारे आज भी बंद पड़े हैं। कारण है वहां की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी तथा इस्लामी शासन का हिन्दू-विरोधी होना। किन्तु, शायद पहली बार किसी वजीर-ए-आजम को वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के प्रति ऐसा संवेदनशील देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि वजीर-ए-आजम इमरान खान सत्तासीन होते ही हिन्दुओं के तमाम ऐसे मन्दिरों को मुक्त कराने की घोषणा किए थे, जो दहशतगर्दी के कारण बंद पड़े हैं अथवा कट्टरपंथी मुसलमानों या शासनिक महकमों के कब्जे में हैं। अब वे अपनी उस घोषणा को क्रियान्वित करते दिख रहे हैं।
मालूम हो कि 'ऑल पाकिस्तान हिन्दू राइट्स मूवमेन्ट' नामक संस्था की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारत-विभाजन के वक्त पाकिस्तान में 428 मठ-मंदिर थे। उनमें से 408 मन्दिरों पर सन 1990 के बाद दहशतगर्द मुसलमानों तथा मुस्लिम संगठनों और शासनिक महकमों ने कब्जा कर लिया था। परिणामस्वरुप वे होटल, रेस्टोरेंट या सरकारी दफ्तरों अथवा मदरसों में तब्दील हो गए थे। इमरान खान की सरकार फिलहाल सिंध प्रान्त में 11 मंदिरों, पंजाब में 4 गुरुद्वारों, बलूचिस्तान में 3 और खैबर पख्तूनख्वा में 2 ऐसे मंदिरों को मुक्त करने की दिशा में सक्रिय है। इसके लिए पाकिस्तानी सरकार ने बजट भी स्वीकृत कर रखा है। इस महीने की 2 जुलाई को पाकिस्तान के स्यालकोट में जिस 1000 साल पुराने मन्दिर को अतिक्रमण मुक्त कर उसकी चाबी हिन्दू समुदाय के हाथों सौंप दी गयी है, वह सन 1947 से ही बंद पड़ा था, जिसे 1992 में जिहादी आतंकियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। मन्दिर का भवन बहुमंजिला था, जिसके हर माले पर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित थीं। उस मन्दिर को अतिक्रमण मुक्त कर श्रद्धालुओं को सौंपने से पहले पाकिस्तान सरकार ने उसके क्षतिग्रस्त स्तम्भों की मरम्मत कराते हुए एक भव्य प्रवेश द्वार का
निर्माण भी कराया है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान में मन्दिरों व गुरुद्वारों का प्रबन्धन देखने की बाबत पाकिस्तान सरकार द्वारा कायम किये गए 'एवेन्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड' ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार कराने के बाद इसे हिन्दू समुदाय को सौंपने के अवसर पर एक धार्मिक समारोह का आयोजन भी कराया, जिसमें उक्त बोर्ड के तमाम मुस्लिम अधिकारियों सहित पाकिस्तान के कई मुस्लिम नेता भी शामिल हुए। हर-हर महादेव की गूंज के साथ पूजा-पाठ-हवन आदि सनातन विधियों से युक्त उस भव्य समारोह की अध्यक्षता बोर्ड के सचिव  सैय्यद फराज अब्बास ने की। उस मौके पर हिन्दू-समुदाय के बीच मिठाइयां बांटी गई और पण्डित काशीराम को पुजारी नियुक्त कर दिया गया, जो अब उस मन्दिर में नियमित पूजा-पाठ किया करेंगे। पाकिस्तान के उक्त बोर्ड ने यह भी निश्चय किया है कि भारत से उन सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां लाकर उस मन्दिर में स्थापित की जाएंगी जो वहां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। पाकिस्तान सरकार इस मन्दिर में भारत के हिन्दू श्रद्धालुओं को भी कटासराज मन्दिर की तर्ज पर दर्शनार्थ आने-जाने की अनुमति देने की बाबत विचार कर रही है।
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में कई ऐसे मन्दिर हैं, जो हिन्दू समाज की आस्था व श्रद्धा के केन्द्र हैं; किन्तु वहां के इस्लामी शासन की पूर्ववर्ती सरकारों की शह पर जिस गति व नीति से हिन्दुओं को पीड़ित-प्रताड़ित व धर्मान्तरित किया जाता रहा, उसी के साथ उनके मन्दिरों को भी पद-दलित किया जाता रहा है। कई मन्दिरों पर आम-अवाम ने कब्जा कर रखा है, तो कई मंदिरों को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया है। इसके अलावा अनेक ऐसे मन्दिर हैं, जिनमें सरकारी दफ्तर और मदरसे आदि चल रहे हैं। 
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ऐसे तमाम मन्दिरों को मुक्त कराने और उन्हें हिन्दुओं के हाथों सौंप देने की वकालत ही नहीं, बल्कि मशक्कत करते दिख रहे हैं। यह पाकिस्तानी सियासत के लिए खास बात है। इमरान खान को इस वजह से विपक्षी सियासतबाजों और मजहबी कठमुल्लाओं के क्षोभ व कोप का सामना भी करना पड़ रहा है। बावजूद इसके, वे मजहबी आलोचनाओं की परवाह किये बिना 'राजधर्म' का निर्वाह करने को प्राथमिकता दे रहे हैं, तो यह कोई निरर्थक सियासी कसरत नहीं है, बल्कि एक सार्थक पहल है।  इसके कई गम्भीर अर्थ हैं। इससे पाकिस्तान में हिन्दू विरोधी इस्लामी आतंक व नफरत कम होगा तथा वहां की घटती-मिटती हुई हिन्दू आबादी में इस्लामी शासन के प्रति खोया हुआ विश्वास लौटेगा और सरकार की ओर से जो संरक्षण-प्रोत्साहन हिन्दुओं के धार्मिक हितों व मानवाधिकारों का हनन करने वालों को मिलते रहता था, सो अब कदाचित वहां के पीड़ित-प्रताड़ित हिन्दुओं को मिले, ऐसी एक सियासी तहजीब का आगाज होगा। इससे भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों को एक नई दिशा व दृष्टि मिलेगी। साथ ही, पाकिस्तान को अपना उस्ताद मानने वाले उन भारतीय मुसलमानों को भी सबक मिलेगा जो आए दिनों भारत में मन्दिरों व मूर्तियों पर हमला करते रहते हैं अथवा करने की फिराक में रहते हैं।
हालांकि पाकिस्तानी हुक्मरानों का वहां के हिन्दुओं के प्रति यह बदला हुआ रवैया उनके हृदय-परिवर्तन के कारण कतई नहीं है, बल्कि इसके पीछे उनकी अपनी मजबूरियां हैं, जिसकी वजह से वजीर-ए-आजम इमरान खान की इस पहल का उग्र व हिंसक विरोध नहीं हो पा रहा है। मजबूरी यह है कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी हिन्दुओं पर वहां के आम अवाम व शासनतंत्र के द्वारा लगातार जुल्म ढाये जाते रहने की वजह से 
अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी उसकी हालत एक अपराधी-सी बनती जा रही है। ऐसे में ईरान व सऊदी अरब जैसे पुराने व घोर इस्लामी देशों में नये-नये मन्दिर बनवाये जाने और भारत के प्रधानमंत्री से उनका अनावरण कराये जाने के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों को थोड़ी शर्मिन्दगी का सामना तो करना ही पड़ता होगा। तब जाहिर है विश्व समुदाय में अपनी छवि को सुधारने, कर्ज या भीख भी मिल सके, इस योग्य बनाने तथा भारत के धार्मिक पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर अर्थव्यवस्था सुधारने और पाकिस्तानी नौजवानों को मजहबी कट्टरता व दहशतगर्दी के धंधे से उबार उन्हें आर्थिक रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ने की गरजवश बहुत सोच-समझ कर तमाम मन्दिरों को मुक्त करने की योजना को इमरान सरकार अमली जामा पहनाने में लगी हुई है। अगर ऐसा नहीं होता तो पाकिस्तान में अब तक बवाल मच चुका होता। वहां से संचालित इस्लामी जिहादी संगठन बचे-खुचे एक दो और मन्दिरों को ध्वस्त कर चुके होते अथवा इमरान की इस दरियादिली का बदला भारत की किसी मन्दिर पर विस्फोट करके ले चुके होते। फिलहाल वे जिहादी संगठन अपने आका की मजबूरी समझ रहे हैं। बावजूद इसके पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम की यह पहल प्रशंसनीय है। वे वहां हिन्दुओं को मुस्लिमों के समान अधिकार व अवसर की समानता भी सुनिश्चित करें, ऐसी अपेक्षा अब की जा सकती है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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