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तीन तलाक पर आखिरी प्रहार!

30/07/2019

तीन तलाक पर आखिरी प्रहार!

 युगवार्ता डेस्क

त लाक…तलाक…तलाक कहकर बीवी को बेसहारा छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए घंटों की चर्चा के बाद एक बार फिर लोकसभा से तीन तलाक बिल पास हो गया है। यह बिल निचले सदन में लगातार तीसरी बार पेश किया गया था। बिल का विरोध करते हुए अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ एनडीए की सहयोगी जदयू ने भी सदन से वॉकआउट कर दिया। इसके विपरीत बीजू जनता दल ने सरकार का साथ दिया। तीसरी बार निचले सदन से बिल पास हो जाने के बाद मोदी सरकार के समक्ष अब इसे राज्यसभा में पास कराना बड़ी चुनौती होगी। हालांकि अगर बीजू जनता दल, वाईएसआरसी, टीआरएस, व नगा पीपुल्स फ्रंट ने साथ दिया तो बिल आसानी से पास हो जाएगा। इन दलों के पास 14 सदस्य हैं। फिलहाल 245 सदस्यीय राज्यसभा में एनडीए के पास 115 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 123 सदस्यों की जरूरत होगी। सरकार की मंशा है कि बिल को इसी सत्र में पास करा लिया जाय। वैसे भी सत्र की अवधि बढ़ाकर 7 अगस्त तक कर दी गई है। बहरहाल, निकाह को मजाक बना देने वाली तीन तलाक की प्रथा को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 2017 में निरस्त किया था। दो जजों ने इसे असंवैधानिक कहा था और एक जज ने पाप बताया था। इसके बाद दो जजों ने इस पर संसद को कानून बनाने को कहा था। संसद में यह बिल लोकसभा से तो दो बार पास हुआ। लेकिन दोनों ही बार राज्यसभा में अटक गया। अब तीसरी बार एक बार फिर यह बिल लोकसभा से पास हो गया है। अब सारा दारोमदार राज्यसभा पर टिका हुआ है। वैसे राजनीति से हटकर अगर निरपेक्ष भाव से देखें तो यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि तलाक, तलाक, तलाक कहा और सबकुछ एकबारगी खत्म। एक बेबस औरत बच्चों के साथ घर के बाहर। जिस देश में जाति, धर्म, लिंग से परे संविधान हरेक नागरिक को समान अधिकार देता है वहां ऐसी औरतों को सरकार क्या सड़क पर छोड़ दे। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का यह कथन कत्तई गैरवाजिब नहीं है। कानून मंत्री के मुताबिक यह विधेयक नारी सम्मान और लैंगिक समानता से जुड़ा है। इस संबंध में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला दीवार पर टांगने के लिए नहीं है। 1986 में शाहबानो प्रकरण का जिक्र करते हुए उन्होंने कांग्रेस को आईना दिखाने की कोशिश की और कहा कि मैं नरेंद्र मोदी सरकार का मंत्री हूं, राजीव गांधी सरकार का नहीं। यहां गौर करने वाली बात है कि सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह पर रोक जैसी कुप्रथाओं को खत्म करने वाले देश में आज महज वोट की खातिर तीन तलाक जैसी कुरीति को बरकरार रखने की वकालत की जा रही है। बावजूद इसके कि इस कुरीति का संबंध न मजहब से है और न ही कुरान से। यही वजह है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिस्र और ईरान समेत दुनिया के 20 प्रमुख मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध है। ऐसे में सवाल है कि अगर इस्लामी देश कानून बनाकर तीन तलाक को बंद कर सकते हैं, तो यह भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में कैसे गलत हो सकता है। जाहिर है इसे सियासी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह इंसाफ से जुड़ा मामला है। इसका धर्म, मजहब या समुदाय से कोई लेना देना नहीं है। तीन तलाक के पैरोकार कुतर्क दे रहे हैं कि अगर पति जेल चला जाएगा तो घर कौन चलाएगा? इसका सीधा-सा जवाब तो यही हो सकता है कि ऐसा काम ही क्यों करें कि जेल जाना पड़े। यह तो ऐसी बात हुई कि हत्यारे को अगर सजा हो गई तो उसके परिवार की देखभाल कौन करेगा? सवाल है कि मामूली बातों को आधार बनाकर जिंदगी से बेदखल कर दी जाने वाली महिलाओं के खिलाफ अन्याय क्यों जारी रहना चाहिए?


 
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