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अदालतों में न्यायाधीशों की कमी

04/07/2019

प्रमोद भार्गव
र्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जजों की संख्या बढ़ाने और उनकी उम्र 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 साल करने का अनुरोध किया है। इसके पहले विधि मंत्रालय ने भी न्यायाधीशों की कमी और लंबित प्रकरणों की संख्या बढ़ते जाने पर चिंता जताई थी। प्रत्येक उच्च न्यायालय में करीब 4500 मामले लंबित हैं, जबकि इनके अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रत्येक न्यायाधीश को लगभग 1300 मामलों का निपटारा करना है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड के अनुसार 2018 के अंत में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में 2.91 करोड़ मामले लंबित थे। उच्च न्यायालयों में विचाराधीन मामलों की यह संख्या 47.68 लाख है। तेलंगाना का अपना उच्च न्यायालय बनने के बाद 1 जनवरी 2018 से देश में उच्च न्यायालयों की संख्या 25 हो गई है। इस हिसाब से इनमें 1079 न्यायाधीश होने चाहिए। फिलहाल इनकी संख्या 695 है। उच्चतम न्यायालय में अब तक केवल 6 महिला न्यायाधीश रही हैं। इनमें पहली महिला न्यायाधीश की नियुक्ति 1989 में हुई थी। इसके विपरीत संसद की एक समिति ने सिफारिश की है कि इनकी संख्या 50 प्रतिशत होनी चाहिए। इसी तरह उच्च न्यायालयों में 73 महिला न्यायाधीश हैं। जिनका प्रतिशत 10.89 बैठता है। हालांकि उच्चतम और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत की जाती है, जिसमें किसी जाति या व्यक्तियों के वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है।    
हमारे यहां संख्या के आदर्श अनुपात में कर्मचारियों की कमी का रोना अक्सर रोया जाता है। ऐसा केवल अदालतों में हो, ऐसा नहीं है। पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों में भी गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध न कराने का यही बहाना किया जाता है। जजों की कमी कोई नई बात नहीं है। 1987 में विधि आयोग ने हर 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी। फिलहाल ये संख्या 17 कर दी गई है। जबकि विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक ये आंकड़ा आस्ट्रेलिया में 58, कनाडा में 75, फ्रांस में 80 और ब्रिटेन में 100 है। 
अदालतों का संस्थागत ढांचा भी बढ़ाया गया है। उपभोक्ता, परिवार और किशोर न्यायालय अलग से अस्तित्व में आ गए हैं। फिर भी काम संतोषजनक नहीं हैं। उपभोक्ता अदालतें अपनी कार्य संस्कृति के चलते अब बोझ साबित होने लगी हैं। बावजूद औद्योगिक घरानों के मुकदमों के लिए पृथक से वाणिज्य न्यायालय बनाने की पैरवी की जा रही है।
न्यायिक सिद्धांत का तकाजा तो यही है कि सजा मिलने से पहले किसी को अपराधी न माना जाए। दूसरे, आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति का फैसला एक तय समय-सीमा में हो जाए। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। इसकी एक वजह न्यायालय और न्यायाधीशों की कमी जरूर है, लेकिन यह आंशिक सत्य है। पूर्ण सत्य नहीं है। मुकदमों को लंबा खिंचने की एक वजह अदालतों की कार्य-संस्कृति भी है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजेंद्रमल लोढ़ा ने कहा भी था कि 'न्यायाधीश भले ही निर्धारित दिन ही काम करें, लेकिन यदि वे कभी छुट्टी पर जाएं तो पूर्व सूचना अवश्य दें, ताकि उनकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।' इस तथ्य से यह बात सिद्ध होती है कि सभी अदालतों के न्यायाधीश बिना किसी पूर्व सूचना के आकस्मिक अवकाश पर चले जाते हैं। इसलिए मामले की तारीख आगे बढ़ानी पड़ती है। इन्हीं न्यायमूर्ति ने कहा था कि 'जब अस्पताल 365 दिन चल सकते हैं तो अदालतें क्यों नहीं?' यह बेहद सटीक सवाल था। हमारे यहां अस्पताल ही नहीं, राजस्व और पुलिस विभाग के लोग भी लगभग 365 दिन ही काम करते हैं। किसी आपदा के समय इनका काम और बढ़ जाता है। इनके कामों में विधायिका और मीडिया के साथ समाज का दबाव भी रहता है। बावजूद ये लोग दिन-रात कानून के पालन के प्रति सजग रहते हैं। जबकि अदालतों पर कोई अप्रत्यक्ष दबाव नहीं होता है।   
अदालतों में मुकादमों की संख्या बढ़ाने में राज्य सरकारों का रवैया भी जिम्मेवार है। वेतन विसंगतियों को लेकर एक ही प्रकृति के कई मामले ऊपर की अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें से अनेक तो ऐसे प्रकरण हैं, जिनमें सरकारें आदर्श व पारदर्शी नियोक्ता की शर्तें पूरी नहीं करती हैं। नतीजतन, जो वास्तविक हकदार हैं, उन्हें अदालत की शरण में जाना पड़ता है। कई कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद भी बकाए के भुगतान के लिए अदालतों में जाते हैं। जबकि, इन मामलों को कार्यपालिका अपने स्तर पर निपटा सकती है। हालांकि कर्मचारियों से जुड़े मामलों का सीधा संबंध विचाराधीन कैदियों की तदाद बढ़ाने से नहीं है। लेकिन अदालतों में प्रकरणों की संख्या और बोझ बढ़ाने का काम तो ये मामले करते ही हैं। इसी तरह पंचायत पदाधिकारियों और राजस्व मामलों का निराकरण राजस्व न्यायालयों में न होने के कारण न्यायालयों में प्रकरणों की संख्या बढ़ रही है। जीवन बीमा, दुर्घटना बीमा और बिजली बिलों का विभाग स्तर पर नहीं निपटना भी अदालतों पर बोझ बढ़ा रहे हैं। कई प्रांतों के भू-राजस्व कानून विसंगतिपूर्ण हैं। इनमें नाजायज कब्जे को वैध ठहराने के उपाय हैं। जबकि जिस व्यक्ति के पास दस्तावेजी साक्ष्य हैं, वह भटकता रहता है। इन विसंगतिपूर्ण धाराओं का विलोपीकरण करके अवैध कब्जों से संबंधित मामलों से निजात पाई जा सकती है। लेकिन नौकरशाही ऐसे कानूनों का वजूद बनाये रहना चाहती है, क्योंकि इनके बने रहने पर ही इनके रौब-रुतबा और पौ-बारह हैं। 
कारागारों में विचाराधीन कैदियों की बड़ी तादाद होने का एक बड़ा कारण न्यायायिक और राजस्व अदालतों में लेटलतीफी और आपराधिक न्याय प्रक्रिया की असफलता को माना जाता है। लेकिन अदालतें इस हकीकत को न्यायालयों और न्यायाधीशों की कमी का आधार मानकर अक्सर नकारती हैं। इसलिए अच्छा है जजों की कमी से इतर कारणों की पड़ताल करके उन्हें हल करने के उपाय तलाशे जाएं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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