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प्रदूषण पर सियासत, हद है!

03/11/2019

जगमोहन सिंह राजपूत

भारत की राजधानी में बड़ी चहल-पहल है। स्कूलों में सरकार बच्चों को मास्क बांट रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री प्रसन्न हैं कि इस वर्ष प्रदूषण पिछले साल से कम है। चिंता न करें। ऑड-ईवन भी आ रहा है। भारत सरकार सर्वोच्च न्यायालय को बता रही है कि पराली जलाने को 43 फीसदी कम कर दिया गया है। यह सब जानकारियां नेताओं के अनुसार प्रगति और विकास दर्शाती हैं। दिल्ली में रहनेवालों को इससे प्रसन्न होना चाहिए। उधर, इलेक्ट्रोनिक मीडिया लगातार बता रहा है कि प्रदूषण खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है। वे एयर क्वालिटी इंडेक्स तथा पीएम 2.5 के भयावह उछाल के आंकड़े भी लगातार दे रहे हैं। लोगों को इन्हें समझने में यदि कोई कठिनाई हो रही हो तो चिंता न करें। वे स्वयं जो देख रहे हैं, सांस लेने में जो तकलीफ महसूस कर रहे हैं, वह उनकी आंखें खोल रहा है। जिनमें जलन अब लगातार ही पड़ रही है। आसमान में घटाटोप है। न आकाश का पता है, न सूरज का। यह दिल्ली है। भारत की राजधानी। ऐतिहासिक शहर जिस पर हर भारतवासी को गर्व है। जहां 'अतिथि देवो भव:' की परंपरा शास्वत चली आ रही है। जहां बांग्लादेश से आये क्रिकेट खिलाड़ी मास्क पहन कर मैच खेल रहे हैं। उनकी शालीनता देखिये, वे कह रहे हैं कि कुछ-कुछ ऐसा ही तो उन्हें ढाका में भी मिलता है। आप चिंता न करें। हम खेलेंगे। यह दिल्ली है जहां खेल होंगे, स्टेडियम खाली नहीं होंगे। यह दिल्ली है। उजड़ती रही है, बसती रही है। गोते खाकर उभरती रही है। उम्मीद रखिये, यहां सब कुछ बर्दाश्त करनेवाले ही बसते हैं। स्थिति को सुधारने के उपाय तो किये जा रहे हैं। नेता लगातार बयान दे रहे हैं। एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। इसे समझिये और सरकारों की तारीफ करिये।
दिल्ली में स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया है। एक आपातकाल 1975 में घोषित हुआ था। हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था। इस नए आपातकाल की घोषणा पूरे दिल्ली शहर के दो करोड़ से अधिक लोगों की जेल बन जाने पर की गई है। इस जेल से कोई नहीं छूट सका है। यह स्थिति भ्रष्ट, खुदपरस्त तथा मूल्यविहीन राजनीति करनेवालों तथा अकर्मण्य नौकरशाही के कारण ही निर्मित हुई है। सजग जनता इसे जानती और पहचानती है। जो कुछ हुआ है, एकाएक नहीं हुआ है। वर्षों से ऐसी खतरनाक स्थिति बनने की जानकारी ही नहीं, अनुभव भी सभी के पास था। एक मुहावरा तो मैंने अनेक जगहों और शहरों के बारे में पहले कई बार सुना था- वहां की हवा ही खराब है। अब कुछ वर्षों से दिल्ली में इसे देख रहा हूं। एक अक्षम, स्वार्थमुग्ध व्यवस्था में स्थिति का साल-दर-साल गिरते जाना अपेक्षित ही माना जाना चाहिए। यदि ऐसा न होता तो क्या दिल्ली और एनसीआर के हर नागरिक को, लाखों बच्चों को, जहरीली हवा में सांस लेनी पड़ती? सभी को पिछले कई वर्षों से ज्ञात था कि पराली जलने से प्रदूषण बढेगा। अनेक बार सरकारी तंत्र से यह भी कहा गया कि किसानों को मशीनें उपलब्ध कराई जा रही हैं। जिसके बाद न केवल पराली का जलाना बंद हो जाएगा बल्कि किसानों को वैकल्पिक आमदनी भी होगी। वह सब कहां गया?
प्रजातंत्र में जब एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना और सत्ता प्राप्ति का ही रह जाय तो सरकारी खजाने के उपयोग में जनहित और सेवा जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं। दिल्ली में चुनाव होने हैं। बिजली फ्री, पानी फ्री, महिलाओं के लिए बस यात्रा फ्री, रोज पूरे पृष्ठ के विज्ञापन फ्री, क्या यही विकास के मापदंड हैं? क्या  स्वच्छ पानी और हवा पाना लोगों का नैसर्गिक अधिकार नहीं है? 'देश का भविष्य हैं बच्चे'। इसे सभी माननीय हर अवसर पर दोहराते रहते हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह देश के प्रति अन्याय नहीं है कि उसकी भावी पीढ़ी को जहरीले हवा और प्रदूषित जल से बचने का कोई विकल्प उपलब्ध ही न हो? यह कैसा प्रजातंत्र है जिसमें इस भयावह स्थिति में करोड़ों लोगों को झोंक देने वालों का उत्तरदायित्व निर्धारित करने की कोई व्यवस्था या प्रावधान है ही नहीं? वर्तमान राजनीति का स्वरुप और प्रशासनिक व्यवस्था का भविष्य मोहनदास गांधी ने अपनी दूर दृष्टि से 1909 में देख लिया था और उसे 'हिन्द स्वराज' में व्यक्त भी कर दिया था, ताकि सनद रहे। उसके शब्दों को याद दिलाना आवश्यक है ताकि वर्तमान सन्दर्भ में सामान्य जन (गांधी के लोग) अपने अंतर्मन में झांक कर देखें कि वे स्वयं क्या कर रहे हैं और उनके आस-पास क्या हो रहा है? यह सभ्यता ऐसी है कि हम धीरज धरकर बैठे रहेंगे तो सभ्यता की चपेट में आये हुए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे। देश में गांधी के लोग आज भी बड़ी संख्या में हैं। खेतों, खलिहानों, जंगलों, पहाड़ों, गांवों में गांधी को याद किया जाता है। लोग उनके बताये रास्ते का अनुसरण करते हैं। आधुनिक  सभ्यता ने इन्हें भ्रमित तो किया है लेकिन अभी जकड़ नहीं पाई है। इनका विवेक जब जागृत होगा तो उसकी धसक संसद और विधानसभाओं के गलियारों में तथा सचिवालयों के उच्चतम स्तर तक पहुंचेगी। कुर्सियां तभी हिलेंगी। गांधी जी हमें ऐसी ही स्थितियों से निबटने का इशारा कर रहे थे जब उन्होंने लिखा- 'मैं आपके सामने इस सभ्यता का हुबहू चित्र नहीं खींच सकता। यह मेरी शक्ति के बाहर है। लेकिन आप समझ सकेंगे कि इस सभ्यता के कारण अंग्रेज प्रजा में सड़न ने घर कर लिया है। यह सभ्यता दूसरों का नाश करनेवाली और खुद नाशवान है। इससे दूर रहना चाहिए। इसीलिए ब्रिटिश और दूसरी पर्लियामेंटें बेकार हो गई हैं। ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेज प्रजा की गुलामी की निशानी है। यह पक्की बात है।' इसके आगे उन्होंने यह आशा व्यक्त की थी कि चूंकि अंग्रेज एक काबिल प्रजा है। अतः वे इस 'जाल' से निकल आएंगे। आज भारत के प्रजातंत्र में ऐसी स्थिति आई है जब 'काबिल' नागरिक असंवेदनशील सत्तासीनों के लिए केवल एक मोहरा बनकर रह गया है। उसे ही आगे बढ़कर स्थिति को बदलना होगा। व्यवस्था को सजग, सतर्क तथा उत्तरदायी बनाना होगा। दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।
(लेखक जाने-माने शिक्षाशास्त्री हैं।)


 
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