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विवादों के साये में केएसएलएफ

30/10/2019

विवादों के साये में केएसएलएफ

सुनील शुक्ला

हाल ही में तीन दिवसीय खुशवंत सिंह लिटफेस्ट का आयोजन कसौली में संपन्न हुआ। इस फेस्ट में कुछ लेखकों का केंद्र सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने के कारण फेस्टिवल हिंदूवादी संगठनों के निशाने पर आ गया।

जाने माने लेखक खुशवंत सिंह की याद में राज्य के कसौली में हर साल लिट फेस्ट मनाया जाता है। इस बार यह कुछ चुनिंदा साहित्यकारों के आमंत्रण और लेखकों के पाकिस्तान प्रेम के कारण विवादों के घेरे में आ गया है। कुछ जाने माने लेखकों की देश विरोधी टिप्पणियों को उनका पाकिस्तानी प्रेम कहा जा रहा है, वहीं कुछ इसे उनकी गिरती टीआरपी सुधारने या फिर घटिया लोकप्रियता बटोरने की चाल बता रहे हैं।
लिटफेस्ट के आयोजकों पर पाकिस्तान की रहनुमाई करने का आरोप लगने के बाद विरोध प्रदर्शन इतना जबरदस्त हो गया कि अगले साल से इसके आयोजन पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठने लगी है। 11 से 13 अक्टूबर तक तीन दिन तक चले इस आयोजन में कई जाने माने चहेरे शामिल हुए थे। गौरतलब है कि खुशवंत सिंह के बेटे हर साल इस फेस्ट का आयोजन कसौली में करवाते हैं।
कसौली में खुशवंत सिंह अमूमन आया करते थे और इस जगह से उनका लगाव इतना अधिक हो गया कि उन्होंने यहां अपना घर भी बना लिया। खुशवंत सिंह कसौली को दूसरा घर मानते थे। इसी स्थान पर रहते हुए उन्होंने कई प्रसिद्ध किताबें भी लिखीं जिसमें चर्चित किताब ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ भी शामिल है। इस साल लिट फेस्टिवल का आयोजन महात्मा गांधी की 150वीं जयंती, जलियांवाला बाग हत्याकांड, गुरु नानक के 550वें प्रकाशोत्सव, कैफी आजमी की शताब्दी और करगिल युद्ध की 20वीं बरसी को समर्पित किया गया था। इन सभी मुद्दों से जुड़े हुए जाने-माने लेखकों और विचारकों को फेस्ट में बुलाया गया था।
फिल्म जगत की सदाबहार अभिनेत्री शबाना आजमी, मनीषा कोईराला सहित कई जानी मानी हस्तियों ने इसमें भाग लिया। लेकिन तीन दिन तक कई मसलों पर हुए मंथन में सबसे ज्यादा चर्चा अनुच्छेद-370 पर रही। जिसमें सुर्खियां बटोरने के लिए कुछ साहित्याकार पाकिस्तान की रहनुमाई करते नजर आए, जो हिंदूवादी संगठनों के निशाने पर आ गए। मानवाधिकार मंच के हिमाचल प्रदेशाध्यक्ष सेवानिवृत एडीजीपी के.सी. सडियाल लिटफेस्ट को एजेंडा साहित्यकारों का जमावड़ा बताते हुए कहा कि इन तथाकथित साहित्यकारों को साहित्य से कोई सरोकार नहीं रह गया है।
इस मंच में जिस तरह मॉब लिंचिग को एक सम्प्रदाय विशेष के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है वह प्रख्यात लेखक खुशवंत सिंह की धर्मनिरपेक्ष सोच का मजाक बन गया है। उन्होंने इस कार्यक्रम में लेखिका तवलीन सिंह के बयान को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल में मुस्लिम सम्प्रदाय द्वारा हिन्दू परिवार की मॉब लिंचिग को एक सामान्य घटना बताया जबकि मुस्लिमों के साथ हुई ऐसी घटनाओं को ही मॉब लिंचिग माना है।
इसके साथ ही तवलीन ने कहा था कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35ए को गलत तरीके से हटाया गया है। जबकि इन धाराओं को हटाने से पूर्व पूरी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि कसौली में चल रहे 8वें लिटफेस्ट में आये अधिकतर साहित्यकार एक विचारधारा विशेष के ही पोषक हैं। ये साहित्यकार पहले भी एक विशेष एंजेडा को आगे बढ़ाने को लेकर प्रदेश में एकत्र होते रहे हैं।
मानवाधिकार मंच का मानना है कि प्रदेश में ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से देश विरोधी सोच को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने सरकार से अपील की है कि ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित करने की अनुमति देने से पूर्व प्रशासन को आयोजकों की मंशा को भी समझ लेना चाहिए। वहीं हिंदू जागरण मंच ने इसका विरोध किया। भाजपा के पूर्व सांसद प्रो. वीरेंद्र कश्यप ने भी इसे गलत करार दिया। उन्होंने ऐसे कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका मानना है कि कश्मीर से जब पंडितों को निकाला गया तब लिटफेस्ट में भाग लेने वाले साहित्यकार कहां थे? तब उन्होंने आवाज क्यों नहीं उठाई? लिटफेस्ट में जो लोग आज अनुच्छेद 370 का विरोध कर रहे हैं, वह सभी एक ही देशद्रोही गैंग के प्रोडक्ट हैं। भविष्य में इस तरह के कार्यक्रम का काले झंडे दिखाकर विरोध करेंगे।



 
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