यथावत

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‘यथावत’ पहले ग्राहक को नमन!

18/09/2019

‘यथावत’ पहले ग्राहक को नमन!

आर के सिन्हा

नसंघ-भाजपा के प्रारंभिक काल के प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक प्रमुख नाम महेश जी का है। वैसे भाजपा में तो कई महेश जी हैं। लेकिन, महेश दत्त शर्मा एक ही हैं, जिन्हें जनसंघ वाले महेश जी या इमरजेंसी वाले डॉ. दत्ता या खुर्जा वाले वैद्यराज महेश जी के नाम से जाना जाता है। 1950 में संघ के प्रचारक रहे, बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जनसंघ को खड़ा करने वाले डॉ. महेश दत्त शर्मा ही थे, जिन्हें पुराने कार्यकर्ता भाई साहब, ताऊ जी, बाबा जी, न जाने कितने ही नामों से जानते हैं। महेश जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय, नाना जी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी के दशकों तक सहयोगी रहे। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने जिस सच्चे स्वयंसेवक की कल्पना की थी, महेश जी वैसे ही स्वयंसेवक थे। नब्बे पार कर चुके महेश दत्त शर्मा मेरे आग्रह पर लगभग एक महीने पहले ही अपने परिवार के साथ खुर्जा रहने के लिए चले गये थे।

संबंधों का अंतर्मन से निर्वाह करने वाले महेश जी पार्टी और संगठन के लिए आजीवन समर्पित रहे। इसी तरह से उनका राष्ट्रीय भाव के प्रकाशनों के साथ भी लगाव बना रहा। जब वे नहीं रहे, उनका ‘यथावत’ का आजीवन सदस्य बनना भी याद आता है।

18 अगस्त को लगभग 9 बजे सुबह उनके ड्राइवर अनिल का फोन आया कि साहब अब नहीं रहे। महेश जी के बड़े भाई के सुपुत्र आयुर्वेदाचार्य गोपाल जी सुबह महेशजी की दिमचर्या के मुताबिक उनके लिए कॉफी लेकर पहुंचे। कमरे में आवाज लगाई, पर महेश जी तो परलोक सिधार चुके थे। यह सुनकर मैंने तुरंत शिव कुमार जी को फोन किया। अस्वस्थता के बावजूद वे भी साथ चल दिए। खुर्जा में घर से शव यात्रा निकलने की खबर पर हम लोग सीधे मुक्ति धाम पहुंच गये। वहां पहले से ही लोग थे। थोड़ी देर में लगा कि महेश जी की शवयात्रा में सारा खुर्जा शहर ही उमड़ आया है। फफक कर रोते हुए शिवकुमार जी ने कहा कि इतना दुख तो उन्हें अटली जी के जाने के बाद भी नहीं हुआ था। उन्होंने बताया कि मैं अटल जी के साथ पचास वर्षों तक रहा। लेकिन मेरे घर की चिंता, बच्चों की पढ़ाई और उनके शादी-विवाह तक की पूरी व्यवस्था महेश जी ही करते थे। महेश जी स्वयं तो संघ के प्रचारक होने के कारण जीवनभर अविवाहित रहे, किन्तु न जाने कितने हजारों परिवारों के संरक्षक और अभिभावक थे। इमरजेंसी में महेश जी ने पूरे समय नाना जी देशमुख के साथ भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन किया।

पुरानी दिल्ली के अंडर हिल रोड से निकलने वाली एक गली अत्ताउर रहमान लेन की 7 नम्बर की कोठी जनसंघ के एक पुराने समर्थक केडिया जी का आवास होता था। उस मकान के बगल से एक पतली गली अंदर जाती थी जो कोठी के पीछे खुलती थी, जहां एक कमरा हुआ करता था। उसी एक कमरे से नाना जी देशमुख, डॉ. महेशदत्त शर्मा, डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी, वरिष्ठ पत्रकार भानु प्रताप शुक्ला आदि लोग भूमिगत आन्दोलन का संचालन करते थे। उनके लिए कमरे में कोठी के अंदर से खाने की थाली सरका दी जाती थी। भानु जी दैनिक पत्रक लिखते, बालेश्वर अग्रवाल जी के यहां भगत सिंह मार्केट में उसकी स्टेंसिल काटी जाती और साइक्लोस्टाइल कापियों को देश भर में पहुंचाने का काम इन्द्रेश कुमार का था। केडिया जी की पत्नी प्रतिभा जी महेश भाई साहब को चाचा जी कहती थीं। उनका बेटा विनीत उन्हें बाबा जी कहता था। लगभग पन्द्रह साल पहले अमरनाथ यात्रा का कार्यक्रम बना। महेश जी के कहने के बावजूद मैं नहीं जा सका।

विनीत और उसकी पत्नी रितिका अन्य दो मित्रों के साथ पहले हेलीकॉप्टर से चले गये। हेलीकॉप्टर के बिजली के तारों से टकरा जाने से विनीत और उनकी पत्नी रितिका की ही मृत्यु हो गई। महेश जी ने फोन पर कहा कि इस दु:ख की घड़ी में प्रतिभा जी को कैसे सूचना दी जाये? दूसरे दिन हम दोनों शवों को लेकर अत्ताउर रहमान लेन पहुंचे। महेश जी ने यह तय कर लिया कि दोनों छोटे बच्चों की देखभाल के लिए वे अब अपनी ग्रीन पार्क की कोठी को छोड़कर उन्हीं लोगों के पास रहेंगे। कुछ ही वर्षों बाद प्रतिभा जी भी नहीं रही। अब दोनों बच्चे बाबा (महेश जी) के सहारे ही रह गये। दोनों बच्चे इंग्लैंड में उच्च शिक्षा के बाद अपने-अपने काम में व्यस्त हैं। महेश जी जीवन भर पार्टी के कार्यों के अतिरिक्त अपने छोटे भाइयों रमेश और ब्रजेश के परिवार की भी देखभाल करते रहे। रमेश की मृत्यु अमेरिका प्रवास के दौरान हो गई थी। अटल जी और उनके परम सहयोगी शिव कुमार जी की तात्कालिक मदद से 24 घंटे के अंदर महेश जी बीजा बनना संभव हुआ। लौटने के बाद महेश जी अपने भाई रमेश के परिवार एवं बच्चों के साथ ग्रीन पार्क में ही रहने लगे। कुछ वर्षो बाद छोटे भाई डॉ. ब्रजेश की मृत्यु भी अचानक हो गई।

महेश जी ने डॉ. ब्रजेश के बच्चों को भी पालपोस कर बड़ा किया। इसके बाद वे ग्रीन पार्क की हजार वर्गफीट की कोठी छोड़कर विनीत केडिया के बच्चों को पालने अत्ताउर रहमान लेन चले गये। उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ होते थे। एक बार हम लोग उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से मिलने मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचे। स्वामी जी ने बाहर आकर उन्हें गले लगा लिया। महेश जी ने कहा घर ले चलो, वहां आलू के पकौड़े खिलाओ। हम स्वामी जी के घर पर पकौड़े खाते हुए देर तक गप्पें लगाते रहे। इसी तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता सपत्नीक उनके ग्रीन पार्क के आवास पर आये। महेश भाई साहब ने मुझे भी बुला लिया। रामप्रकाश जी ने याद दिलाया कि आपने मेरे मुख्यमंत्री होने की भविष्वाणी की थी। इसलिए मैं और मेरी पत्नी दोनों आपके पास आये हैं कि आप ज्योतिषी भी हैं, हमें पता न था। कल्याण सिंह जी को कैसे हटाया गया और मुझे कैसे मुख्यमंत्री बनाया गया। हम स्वयं चकित हैं। महेश जी जब अखिल भारतीय ब्राह्मण सभा के अध्यक्ष बने तो मैंने मजाक किया कि अब तो आप पंडित मदन मोहन मालवीय जी के पद पर बैठ गये। उन्होंने कहा कि तुम चित्रगुप्त के वंशज हो और चित्रगुप्त ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए हैं। अत: तुम भी ब्राह्मण ही हो।

शिव कुमार जी बताते हैं कि अटल जी ने एक बार महेश जी को बुलाकर पूछा कि तुम राज्यसभा जाना चाहते हो? भंडारी जी से मिल लो। तब महेश जी ने कहा कि आपने बुलवाया है, तो मैं आ गया। मेरी तो राज्यसभा जाने की कोई इच्छा नहीं है। 1977 में जब चौधरी चरण सिंह जी की सरकार बनी थी तो उन्हें नोएडा प्राधिकरण का सदस्य बनाया गया। बाद में उत्तर प्रदेश के आवास विकास बोर्ड के अध्यक्ष भी बनाये गये। उनके दोनों ही कार्यकाल में पूरे उत्तर प्रदेश में दो सौ से ज्यादा कालोनियां बनीं। लेकिन, उनपर कोई उंगली नहीं उठी। जब मैंने सन् 2000 में इंडियन पब्लिक स्कूल, देहरादून में बनाया तो महेश जी और भानु जी (भानु प्रताप शुक्ल) को संस्थापक न्यासियों में रखा। मैंने महेश जी के पास अशोक प्रसाद के जरिए कुछ कागज भेजे। बाद में महेश जी ने फोन कर कहा कि मैंने सभी कागजों पर दस्तखत कर दिये हैं। लेकिन, यह तो बताओ कि किस संबंध में कागज थे। मैंने कहा कि आप इंडियन पब्लिक स्कूल के सचिव बनाये गये हैं। तब उन्होंने कहा कि मैं किसी को कुछ भी गलत करने नहीं दूंगा और अठारह वर्षों तक उन्होंने और जिस प्रकार से मृत्युपर्यन्त भानु जी ने विद्यालय का मार्गदर्शन किया, मैं उसे बता नहीं सकता। वे अपने सभी सहयोगियों और मित्रों की पूरी खबर रखते थे।

एक बार मेरे यहां 11 पंडितों के माध्यम से भव्य महारुद्राभिषेक हुआ। दूसरे दिन सुबह ही महेश जी का फोन आ गया कि आपने मुझे बताया नहीं। मैंने कहा कि मुझसे गलती हो गयी। एक बार हमलोग काठमांडू, नेपाल भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन के लिए गये। होटल में बिना लहसुन प्याज का भोजन नहीं मिलने की मेरी चिंता पर उन्होंने कहा कि आप इसकी चिंता मत करिए। हमलोग 3-4 दिन रहे। खास बात यह थी कि हर दिन अलग-अलग घरों से भोजन आता था। देश से बाहर भी इस प्रकार का संबंध महेश जी ने बना रखे थे। एक रोचक वाकया और। दीनदयाल जी के आगमन पर महेश जी लखनऊ चारबाग स्टेशन पर उनको लेने पहुंचे। दीनदयाल जी स्टेशन से बाहर आ चुके थे। महेश जी खोज ही रहे थे कि पंडित जी ने पुकारा-‘महेश मैं इधर खड़ा हूं।’ पंडित जी की स्टेशन पर खड़े होने की आदत नहीं थी। ट्रेन 10 मिनट पहले आ गयी थी। बाल कटाने की इच्छा पर महेश जी ने कहा, यह सैलून बढ़िया है। आप बाल कटाएं, तबतक मैं सब्जी लेकर आता हूं। महेश जी लौटे तो फिर पंडित जी ने सड़क के पार से आवाज दी, ‘‘महेश मैं यहां हूं।’’

महेश जी ने ब्रजभाषा में कहा ‘‘आपने तो बिलैया सूं बाल कटवाय लियौ हैं।’’ पंडित जी ने सड़क के किनारे ईंट पर बैठे नाई की ओर इशारा करते हुए कहा कि, यह इटालियन सैलून है। मैंने दो रुपये की जगह आठ आने में ही बाल कटवा लिए। इस तरह डेढ़ रुपया बचा लिया न पार्टी का मैंने। पिछले महीने एक बार मेरा और शिव कुमार जी का उनके यहां दोपहर के भोजन के लिए जाने का कार्यक्रम बना। लेकिन संसद में पार्टी का व्हिप जारी होने के कारण मैं नहीं जा सका। उसके कुछ दिन बाद ही वे बीमार पड़ गये और इस लोक से चल बसे।



 
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