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अब सवाल पीओके को मुक्त कराने का है

02/09/2019

जयकृष्ण गौड़

जी 7 देशों के सम्मेलन में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया तो दोनों के बीच दोस्ती की केमेस्ट्री का सभी को पता चला। नरेन्द्र मोदी ने ट्रम्प से कहा कि '1947 के पूर्व भारत और पाकिस्तान एक ही थे। हम आपस में समस्याएं सुलझा लेंगे। तीसरे देश को कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है।' मोदी की बात का डोनाल्ड ट्रम्प ने भी समर्थन किया। अब विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि 1947 के पूर्व दोनों देश एक ही थे, इस बात को क्यों कहा गया? क्या इस कथन में किसी संकल्प की केमिस्ट्री है या भारत के भविष्य का आंकलन है। 
भारत जी-7 का सदस्य नहीं है। लेकिन फ्रांस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गेस्ट के नाते बुलाया था। उधर, पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का दुनियाभर में शोर मचा रहा था। वह समझने को राजी नहीं था कि कश्मीर भारत का अंदरुनी मामला है।  इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प और अन्य देशों के प्रतिनिधियों के सामने नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के दावे पर पानी फेर दिया। दुनिया को एक बार फिर बता दिया कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। हम किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेंगे। यह पाकिस्तान पर कूटनीतिक बम का प्रहार था। इससे पाकिस्तान न केवल बौखलाया, बल्कि अनर्गल प्रलाप करने लगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि विकसित देशों को कमजोर की सहायता करनी चाहिए, लेकिन बड़े देश भी अपने लाभ के बारे में ही विचार करते हैं। उन्होंने गीदड़ भभकी देते हुए कहा कि 'यदि मामला परमाणु हमले तक पहुंचा तो अन्य देश भी इसके प्रभाव से बच नहीं सकते। इसके बाद अपनी दयनीयता रोते हुए कहा कि हम कश्मीर के बारे में सबको बताएंगे।' इमरान बता तो रहे हैं। वह चुप कब रहे? यह अलग बात है कि दुनिया पाकिस्तान की हकीकत जान चुकी है। वह संयुक्तराष्ट्र तक गए। हर जगह हारे। संयुक्तराष्ट्र में झूठ को सत्यापित करने के लिए राहुल गांधी के बयानों का संदर्भ देते हुए कहा कि विपक्ष के नेता भी इसी तरह का आरोप लगाते हैं। पाकिस्तान के साथ राहुल का नाम जुड़ने से कांग्रेस की धड़कन बढ़ गई। सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी को कांग्रेस के बड़े नेताओं ने सलाह दी कि राहुल की बातों को लेकर पाकिस्तान ढिंढोरा पीटेगा। इससे जनता का आक्रोश कांग्रेस के खिलाफ बढ़ता जा रहा है। इसलिए डेमेज कंट्रोल होना चाहिए। इसके बाद राहुल ने ट्वीट कर कहा कि 'कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। इसमें दूसरे देश का दखल नहीं होना चाहिए। कश्मीर में हिंसा पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित है।' 
दरअसल, इतिहास साक्षी है कि कश्मीर समस्या कांग्रेस की ही देन है। शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के अंधसमर्थन ने धरती के जन्नत को दोराहे पर खड़ा कर रखा है। दुर्भाग्य यह कि कांग्रेस अपनी गलतियों से सबक सीखना भी नहीं चाहती। यही कारण है अनुच्छेद 370 एवं 35(ए) हटाने का कांग्रेस ने संसद में विरोध किया। उसके नेता अधीर रंजन ने तो संसद में हाथ नचाते हुए कहा कि कश्मीर आंतरिक मामला कैसे हो सकता है?  यूएनओ में इस पर विचार हो रहा है। पीओके पाकिस्तान के पास है। इस पर क्रोधित होकर गृहमंत्री ने कहा कि जब मैं कश्मीर कहता हूं तो इसका मतलब है पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके), अक्साईचिन सहित। इसके लिए हम जान भी दे देंगे। अमित शाह ने अधीर रंजन को बुरी तरह फटकारा भी था। अंतत: दोनों सदनों में अनुच्छेद 370, 35(ए) को हटाने एवं राज्य पुनर्गठन विधेयक पारित हो गए। राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक भुवनेश्वर कलिता ने तो सांसद पद से इस्तीफा भी दे दिया। सदन के बाहर कांग्रेस के भी करीब एक दर्जन सदस्यों ने इस विधेयक समर्थन किया। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जनार्दन द्विवेदी, भूपेन्द्र हुड्डा, शशि थरूर आदि ने अनुच्छेद 370 खत्म करने को देशहित में बताया। इसके बाद भी कांग्रेस सीखने को तैयार नहीं है। कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि 'कश्मीर की स्थिति नियंत्रण में नहीं है। सरकार अत्याचार कर रही है। इसलिए 370 को पुन: जारी रखना चाहिए। जो कांग्रेस नेता 370 को खत्म करने का समर्थन कर रहे हैं, उन्होंने कांग्रेस का इतिहास नहीं पढ़ा है।' गुलाम नबी ने ठीक ही कहा है। अगर किसी ने कांग्रेस का इतिहास पढ़ा होता तो कब का कांग्रेस छोड़ चुका होता। भारत की आजादी के बाद देश के विभाजन की स्वीकृति देने वाली पं. नेहरू की कांग्रेस ही थी। विभाजन में करीब दस लाख हिन्दू-सिखों का खून बहा, करोड़ों को अपना घर छोड़ पलायन करना पड़ा। इसकी जिम्मेदार भी कांग्रेस ही है। शेख अब्दुल्ला के मायाजाल में फंसकर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अस्थाई अनुच्छेद 370 का प्रावधान संविधान में कांग्रेस ने ही रखा। इस बारे में गृहमंत्री सरदार पटेल से भी नहीं पूछा गया। 35(ए) का प्रावधान तो राष्ट्रपति के आदेश से बाद में जोड़ा गया। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर भी कश्मीर को विशेष दर्जा देने के विरोध में थे। कश्मीर पर काबिज होने के लिए पाकिस्तान ने कबाइली हमला कराया। जब भारतीय सेना कबाइलियों को खदेड़ते हुए आगे बढ़ रही थी तो पं. नेहरू ने मामले को यूएनओ में ले जाकर सेना के कदम रोक दिए। इसलिए कश्मीर का बड़ा भाग पाकिस्तान के कब्जे में है। अनुच्छेद 370 के कारण ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पनपा, हजारों लोगों का खून बहा। चालीस हजार से अधिक लोगों की हत्या हुई इसकी जिम्मेदारी से भी कांग्रेस बच नहीं सकती। इसी तरह राहुल गांधी ने भी कश्मीर को लहुलूहान करने की झूठी खबर परोसकर नेहरू की नीति का ही अनुसरण किया है। यही कारण है कांग्रेस अब रसातल में जा रही है।
पहली बार राष्ट्रवादी मोदी सरकार ने भारत के खंडित स्वरूप को अखंड करने के साहसिक कदम उठाए हैं। अनुच्छेद 370 एवं 35(ए) को समाप्त कर अन्य राज्यों के समान ही जम्मू-कश्मीर के लिए विकास के दरवाजे खोल दिए हैं। भले ही  पाकिस्तान के हुक्मरान अपने मुंह से परमाणु बम की धमकी देते रहें, लेकिन पाकिस्तान भारत के कूटनीतिक चक्रव्यूह में फंस चुका है। अब पाक के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) को मुक्त कराने का संकल्प मोदी सरकार का है। गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री, राजनाथ सिंह और अन्य नेता कह चुके हैं कि अब बात होगी तो पीओके पर होगी। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। पीओके भी भारत का ही अंग है। इस बारे में संसद का भी संकल्प है। इससे स्पष्ट है कि भारत की कूटनीति और रणनीति पीओके को मुक्त कराने पर केन्द्रित होगी। मोदी सरकार की सफल कूटनीति का ही परिणाम है कि आज दुनिया की महाशक्ति भारत के साथ खड़ी है। 
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि युवकों को रोजगार देने एवं शिक्षा के लिए पचास हजार कर्मियों की शीघ्र भर्ती होगी। हर जिले के विकास के लिए अतिरिक्त राशि आवंटित की गई है। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के समग्र विकास का निर्णय सरकार ले रही है। वहां विकास का अरुणोदय होगा। नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति से भारत अपने अखंड स्वरूप में दुनिया की महाशक्तियों की श्रेणी में खड़ा हो गया है। अब कोई उसकी एकता-अखंडता को छिन्न भिन्न नहीं कर सकता। अब नए युग का नया भारत अतीत के गौरव के साथ किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम है। 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


 
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