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राशन वाले अच्छे दिन

10/07/2019

राशन वाले अच्छे दिन


हानी उन दिनों की है, जब मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था। तब सरकारी राशन Þकी दुकान पर बिग बाजार के किसी सेल से भी ज्यादा भीड़ हुआ करती थी। जन वितरण प्रणाली गरीबों के लिए थी और उस समय लगभग पूरा भारत गरीब था। सरकारी राशन लेना वोट डालने से भी बड़ा नागरिक कर्तव्य माना जाता था। मेरी मां कहती थी कि राशन का गेहूं ऐसा होता है कि जानवर भी ना खायें। लेकिन सस्ती दर पर मिलने वाली साढ़े चार किलो चीनी का उतना ही महत्व था, जितना आजकल फ्री डेटा पैक का है। बचत से ज्यादा उसमें एक तरह का अधिकार भाव था। राशन हमारा है, तो आसानी से क्यों छोड़ दें। राशन की दुकान कब खुलेगी, यह पता लगाना एक कौशल था। जासूस की तरह रात-दिन निगरानी रखनी पड़ती थी। राशन की दुकान पर सर्जिकल स्ट्राइक की रणनीति सिर्फ हम नहीं बल्कि मुहल्ले के बाकी लोग भी बनाते थे। कार्ड और झोला पकड़कर लाइन में घंटों खड़े होने का एहसास वैसा था, जैसा सीमा पर तैनात किसी जवान को होता होगा। राशन की दुकान चलाने वाले साहब पेशे से हाई स्कूल में मास्टर थे। राशन दुकान का परमिट उन्होंने जुगाड़ से किसी और रिश्तेदार के नाम से ले रखा था।

तब सरकारी राशन की दुकान पर बिग बाजार के किसी सेल से भी ज्यादा भीड़ हुआ करती थी। जन वितरण प्रणाली गरीबों के लिए थी और उस समय लगभग पूरा भारत गरीब था।

मास्टर साहब को राशन की दुकान से जो वक्त मिलता था, उसमें वे ठेकेदारी और मोहल्ला स्तर की नेतागीरी जैसे उत्पादक काम किया करते थे। स्कूल की नौकरी में उन्होंने अपनी पोंिस्टग ऐसी जगह करवा रखी थी, जहां बिना गये भी उनका काम चल जाता था। दुकानदार मास्टर साहब के यहां से राशन खरीदने का हमारा अनुभव खासा विचित्र था। उनके पास लौटाने के लिए छुट्टा एक रुपया कभी नहीं होता था। अगली बार मांगो को उन्हे याद नहीं रहता था। मेरे पिताजी ने समझाया- उनसे लिखवा लिया करो। मैने वही किया। जवाब में उन्हे समाज में बढ़ते अविश्वास पर छोटा सा लेक्चर देकर राशन कार्ड के अंदर वाले आखिरी पन्ने पर गंदी लिखावट में लिख दिया- एक रुपया देना है। अगले महीने मैं एक रुपया मांगने गया तो मास्टर साहब के सुर बदले हुए थे। उन्होने कहा- इसमें लिखा है, एक रुपया देना है, मतलब तुम्हे देना है। तो मुझ जैसे अबोध बालक को डराकर उन्होने एक रुपल्ली वसूल ली जो असल में मेरी ही थी।

मैं रोता-पीटता घर लौटा। शाम को मेरे पिताजी ने स्थिति की गंभीरता पर विचार करते हुए मुझे परचेजिंग कमेटी की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। उन्होंने नई व्यवस्था यह बनाई कि राशन लाने का काम मेरे भइया करेंगे और मैं सहायक के तौर पर उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करूंगा। अगले महीने दोनों भाई दुकान पर पहुंचे। मास्टर साहब ने आदतन एक रुपया ना होने की बात कही। मेरे भइया ने खुलेआम उनकी नीयत पर सवाल उठाया और उनसे इस बार ‘एक रुपया देना है’ के बदले ‘एक रुपया लेना है’, लिखवाया, ताकि कोई भ्रम ना हो। अगले महीने दोनो भाई फिर दुकान पर पहुंचे। मास्टर साहब नहीं थे, उनका नौजवान बेटा मुस्तैदी से दुकान संभाल रहा था। भइया ने जब एक रुपया मांगा तो उसने कहा- इस पर तो लिखा है, एक रुपया लेना है। मतलब एक रुपया हमें आपसे लेना है। मेरे भइया बिगड़ गये। उन्होने इस बेईमानी को भरपूर लानत भेजी। लाइन में खड़े बाकी लोगों ने भी समर्थन किया।

दुकानदार मास्टर साहब के बेटे ने बात संभालते हुए कहा- यह हिसाब तो आपके और मेरे पिताजी के बीच का है। मैं बीच में कहां आ गया। अगली बार आइयेगा तो उन्ही से ले लीजियेगा। पिताजी ने इस ‘राशन घोटाले’ का मामला खुद संभालने का निश्चय किया। उन्होने एक दिन मास्टर साहब को भरे बाजार में पकड़ा और पूछा कि आप ऐसी बेईमानी क्यों करते हैं। मास्टर साहब ने जवाब दिया कि वे एक बहुत सम्मानित व्यक्ति हैं लेकिन मुहल्ले के लोग उनके बारे में दुष्प्रचार कर रहे हैं, जिससे उनकी आत्मा बहुत दुखी है। उन्होने कहा कि अगर मुझपर इतना ही शक है तो मुझसे सामान मत खरीदिए या छुट्टे 19 रुपये देकर बच्चों को दुकान पर भेजा कीजिये, ताकि एक रुपये का चक्कर ना रहे। राशन की दुकान बदलने का विकल्प भला कहां होता था, कार्ड पर जिस दुकान का नाम लिखा होता था, वहीं जाना पड़ता था। घोटाला रोकने के लिए हम हर बार छुट्टे पैसे लेकर जाने लगे। मोबाइल या प्राइवेट बिजली कंपनियों की चोरी देखता हूं, तो राशन वाले वे ‘अच्छे दिन’ याद आ जाते हैं।


 
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