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रक्तबीज की तरह है मप्र में कांग्रेस का झगड़ा

17/02/2020

डॉ. अजय खेमरिया

मप्र के उत्तरी औऱ मालवा इलाके में सोशल मीडिया पर एक नारा ट्रेंड कर रहा है- माफ करो कमलनाथ, हमारे नेता तो महाराज। कमलनाथ के दिल्ली आवास पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ समन्वय बैठक में हुए कथित टकराव के बाद मप्र में सिंधिया समर्थक आगबबूला हैं। खुलेआम मुख्यमंत्री कमलनाथ के विरुद्ध मुखर होकर बयानबाजी हो रही है। दावा किया जा रहा है कि अभी तो सिंधिया समन्वय बैठक से बाहर निकलकर आए हैं, अगर पार्टी से बाहर चले गए तो मप्र में दिल्ली जैसे हालात पैदा हो जाएंगे।

असल में मप्र काँग्रेस की अंदरुनी लड़ाई अब सड़कों पर आ गयी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी खुलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया की चुनौती को स्वीकार कर उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए कह दिया है। 15 वर्षो तक सत्ता से बाहर रही कांग्रेस के लिए मप्र में मुसीबत बीजेपी से कहीं ज्यादा खुद कांग्रेसियों से खड़ी होती रही है। सीएम पद की रेस में रहे सिंधिया लोकसभा का चुनाव हारने के बाद खुद को मप्र में अलग-थलग महसूस करते हैं। सरकार के स्तर पर मामला चाहे राजनीतिक नियुक्तियों का हो या प्रशासन में जो महत्व दिग्विजय सिंह को मिलता है वह सिंधिया को नहीं। इसलिये समानान्तर सत्ता केन्द्र के लिए समर्थकों द्वारा पिछले एक वर्ष से उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाये जाने के लिये आलाकमान पर दबाव बनाया जा रहा है।

सिंधिया खुद अक्सर सरकार के विरुद्ध बयान देते रहे हैं, जिससे मुख्यमंत्री के लिये असहज स्थिति पैदा हो जाती है। अतिथि शिक्षकों की मांगों को लेकर सिंधिया ने एकबार फिर कमलनाथ के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने इस मुद्दे पर सड़कों पर उतरकर सरकार के विरुद्ध संघर्ष का एलान कर दिया। किसानों की कर्जमाफी को लेकर भी उन्होंने जिस अतिशय विपक्षी सुर में अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उसने शांत प्रवृत्ति के कमलनाथ को जवाबी हमले के लिये मजबूर कर दिया। बताया जाता है कि दिल्ली में कमलनाथ के बंगले पर हुई बैठक में दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर भिड़ंत हो गई और सिंधिया बैठक से निकलकर चले गए। मुख्यमंत्री जो प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष भी हैं, अब खुलकर कह रहे हैं कि अगर सिंधिया को सड़कों पर उतरना है तो बेशक उतर जाएं। आमतौर पर कमलनाथ इस तरह के सीधे टकराव से अभीतक बचते रहे हैं। यह पहला अवसर है जब कमलनाथ ने सीधे सिंधिया को उनकी हद बताने का प्रयास किया है।

वस्तुतः मप्र की सबसे बड़ी सियासी ताकत इस समय दिग्विजय सिंह के पास है। कमलनाथ ने उनके साथ आरम्भ से ही बेहतरीन युग्म बना रखा है। अक्सर सरकार के ऊपर होने वाले सभी नीतिगत हमलों को दिग्विजय सिंह ही फेस करते हैं। उनके समर्थक विधायक और मंत्री संख्या में सबसे अधिक हैं और कभी भी उनके द्वारा कमलनाथ की सम्प्रभुता को चैलेंज नहीं किया जाता है। दूसरी तरफ सिंधिया समर्थक मंत्री अक्सर अफसरशाही, वचनपत्र से लेकर प्रदेश अध्यक्ष जैसे विषयों पर कमलनाथ के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं। मप्र के सियासी समीकरण में सबसे अहम फैक्टर दिग्विजय सिंह हैं। सर्वविदित है कि कमलनाथ को सीएम की कुर्सी दिग्विजय के वीटो से ही मिल सकी है। सिंधिया और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक अदावत दो पीढ़ी पुरानी है। ग्वालियर अंचल में सिंधिया परिवार के दो राजघरानों की सभ्य और संसदीय अदावत में दिग्विजय सिंह सदैव बीस साबित हुए हैं। मप्र की मौजूदा लड़ाई असल में कांग्रेस की जन्मजात गुटीय लड़ाई का ही एक पड़ाव है। कमलनाथ कभी मप्र की राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं रहे हैं, जैसे दिग्विजय या सिंधिया। न ही उनका वैसा कोई जमीनी और कैडर आधारित जनाधार है। राजनीतिक परिस्थितियों के चलते दिग्विजय सिंह कमलनाथ के साथ हैं और इसकी एक वजह सिंधिया को रोकना भी है।

असल में सिंधिया जिस शाही आवरण के साथ सियासत करते हैं वह मप्र के दूसरे सियासी क्षत्रपों को रास नहीं आती है। अपने पिता के उलट उनके राजनीतिक विरोधी प्रतिक्रियात्मक धरातल पर उनसे मुकाबले के लिये खड़े हो जाते हैं। गुना लोकसभा सीट पर उनकी अप्रत्याशित पराजय ने उन्हें मप्र में सत्ता विमर्श के केंद्र से बाहर-सा कर दिया है। इसीलिए उनके समर्थक जिन्हें उनकी भी सहमति होती है पार्टी लाइन से परे जाकर प्रदेश अध्यक्ष के लिये लाबिंग करते रहे हैं। मप्र में इसबार कांग्रेस की वापसी में ग्वालियर चंबल की उन 34 सीटों का निर्णायक योगदान है, जिनमें से 26 पर पार्टी को जीत मिली है। सिंधिया इसी इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं और विधानसभा चुनाव की पूरी कैम्पेन 'अबकी बार सिंधिया सरकार' के साथ हुई थी। ऐसे में सिंधिया और उनके समर्थकों को लगता है कि आलाकमान ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर गलत किया है। इस बीच लोकसभा चुनाव में हुई हार ने माहौल को और खराब कर दिया। पिछले 7 महीने से सिंधिया अक्सर सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। किसान कर्जमाफी को लेकर उनके बयान विपक्षियों की भाषा और लहजे की प्रतिध्वनि करते हैं।

ताजा विवाद अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण पर है, जिसे लेकर सिंधिया ने सरकार के विरूद्ध सड़कों पर उतरने की धमकी दी है। उन्होंने पार्टी के वचनपत्र को लेकर भी कमलनाथ को कटघरे में खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री ने जिस तल्खी के साथ पहली बार सिंधिया को जवाब दिया है वह बताता है कि पार्टी में अब गुटबाजी नियंत्रण से बाहर हो चली है। प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोविन्द सिंह ने तत्काल सिंधिया को सरकार के खाली खजाने का अवलोकन करने की सलाह दे डाली। इस बयान को दिग्विजय कैम्प का जवाब भी कहा जा रहा है। वहीं, सिंधिया समर्थक मंत्री गोविंद राजपूत ने सागर में एकदिन पहले कर्जमाफी न कर पाने पर सिंधिया की मौजूदगी में अफसोस जताया था। यानी मप्र में सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के साथ भी नहीं चल रही है। दूसरी तरफ दिग्विजय और कमलनाथ की कैमिस्ट्री अभी भी बेहतरीन है। मार्च में प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर भी मतदान होना है। एक सीट पर दिग्विजय सिंह का जाना तय है तो दूसरी पर सिंधिया की दावेदारी रोकने के लिये अब आदिवासी या ओबीसी कार्ड भी चला जा सकता है। मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सत्ता का समानान्तर केंद्र विकसित किया जाए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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