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रामजी का हो गया भक्तों का क्या होगा?

02/01/2020

रामजी का हो गया भक्तों का क्या होगा?

राकेश कायस्थ

अंतत: रामजी लंबी कानूनी लड़ाई जीत गये। भगवान की इस जीत के बाद भक्तों को यह भरोसा हुआ कि देश की अदालतों में इंसाफ भी होता है। अब तक देश के ज्यादातर लोग यही मानते आये थे कि अदालतें खुद भगवान भरोसे हैं, जहां सिर्फ तारीख पर तारीख पड़ती रहती है लेकिन निर्णय नहीं होता है। अगर निर्णय हो भी जाये तो न्याय हो,यह कोई जरूरी नहीं है। रामजी ने जितना वक्त वनवास में बिताया था, उससे दोगुने से ज्यादा वक्त वे अदालत के फैसले के इंतजार में बिता चुके थे। श्रद्धालु इस तरह मायूस थे कि इंसाफ की आस छोड़ चुके थे। ऐसे में एक दिन देश के उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया कि मर्यादा पुरुषोत्तम ने जीवन में पहले ही बहुत दुख उठाये हैं। पिता का वचन निभाने के लिए वन-वन भटके हैं। पत्नी का वियोग सहा है, मर्यादा की रक्षा के लिए युद्ध करने लंका तक गये हैं। उनका संपूर्ण जीवन धर्म,मर्यादा और नैतिकता के लिए है। क्या यह उचित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम से रियल एस्टेट के एक छोटे से केस में इतना इंतजार करवाया जाये? जजों ने संकल्प लिया कि एक समय- सीमा के भीतर निर्णय आ जाना चाहिए और निर्णय आ गया। इस संकल्प शक्ति को देख हृदय गदगद हो गया।

एक दिन देश के उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया कि मर्यादा पुरुषोत्तम ने जीवन में पहले ही बहुत दुख उठाये हैं।…उनका संपूर्ण जीवन धर्म,मर्यादा और नैतिकता के लिए है। क्या यह उचित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम से रियल एस्टेट के एक छोटे से केस में इतना इंतजार करवाया जाये?

गोसाई जी ने बजरंगबली के लिए कहा है,‘‘विद्यावान गुनी अति चातुर, रामकाज करिबे को आतुर।’’ मुझे यह बात माननीय न्यायधीशों के लिए उचित प्रतीत होती है। न्याय देना ही असली रामकाज है। ज्यादा अच्छी बात है कि न्याय किसी और को नहीं, सीधे-सीधे भगवान को दिया गया है। राम मंदिर पर अदालत का फैसला एक ताजा हवा के झोंके की तरह आया है। सिर्फ इसलिए नहीं कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनेगा। लोग इसलिए भी खुश हैं कि जब अराध्य को न्याय मिला तो भक्तों को भी जरूर मिलेगा। बिल्डर के झांसे में आकर अपनी पूरी जमा पूंजी गंवा बैठे मेरे एक दोस्त कह रहे हैं, ‘‘रामजी की तरह हमारा मामला भी रीयल एस्टेट से ही जुड़ा है। बिल्डर ने पूरे पैसे ले लिये हैं, इंतजार करते हुए बरसों हो गया लेकिन अब तक घर नहीं मिला है। पहले बिल्डर के दμतर के चक्कर काट रहे थे और अब लगातार कोर्ट की खाक छान रहे हैं। लेकिन अब उम्मीद है कि जज साहब उसी तरह समय सीमा के भीतर सुनवाई करके मुझे न्याय देंगे जैसे प्रभु श्रीराम को दिया।’’ दूसरे मित्र की अलग दलील है। उनका कहना है कि रामजी के मुकाबले हमारे मुकदमे पर ज्यादा सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। रामजी के पास रहने के लिए कई कोटि मन-मंदिर थे। हमें कोई मन-मंदिर में रखने को तैयार नहीं है। रख भी ले तो हमारा गुजारा नहीं होगा क्योंकि हम इंसान है। धूप, हवा और बरसात से बचने और परिवार को बचाने के लिए सिर पर छत चाहिए।

नोएडा एक्सटेंशन में मकान बुक कराकर फंसे एक और मित्र कह रहे हैं- अयोध्या प्रकरण कानूनी होने के साथ आस्था का भी प्रश्न था। अदालत ने सभी पक्षों की आस्था पर विचार किया और मुस्लिम पक्ष को भी अल्लाह का घर बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन दी। सिर्फ कानूनी नुक्ते से हमारी बात नहीं बनेगी। अगर हम बिल्डर के हाथों सताये सभी लोगों को लेकर जायें और यह कहें कि हमारा घर हमारे लिए आस्था का प्रश्न है तो हो सकता है अदालत जल्दी फैसला दे। नोएडा से लेकर गाजियाबाद तक पथराई आंखों से आशियाने का इंतजार कर रहे हर आदमी की अपनी दलील है। वे वनवास भुगत रहे हैं और पैसे ले चुके ज्यादातर बिल्डर या तो अज्ञातवास में हंै या फिर जेल में। सरकार ने पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए एक घोषणा की है। लेकिन इस पर अमल कब होगा, यह कोई नहीं जानता। ले-देकर न्यायालय का ही सहारा है। रामजी ने रास्ता खोला है तो वही आगे भक्तों का कल्याण करेंगे। जब उनका घर हो गया तो देर-सबेर भक्तों का भी हो ही जाएगा।



 
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