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ममता को नहीं दिखता जलता हुआ बंगाल

12/06/2019

सियाराम पांडेय 'शांत' 
 रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था। कुछ वैसे ही हालात पश्चिम बंगाल के भी हैं। पश्चिम बंगाल में ताबड़तोड़ राजनीतिक हत्याएं हो रही हैं और राज्य के मुख्य सचिव मलय डे कह रहे हैं कि स्थिति नियंत्रण में है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बंगाल की संस्कृति की तो बात करती हैं लेकिन यह भूल जाती हैं कि इसी पश्चिम बंगाल की धरती ने देश को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दिए थे। उसमें बंगाल देश का अंग है। राष्ट्रगान में देश के सभी हिस्सों का नाम है लेकिन ममता बनर्जी के राजनीतिक आचरण से तो नहीं लगता कि वे पश्चिम बंगाल को देश का अंग मानती भी हैं। पश्चिम बंगाल अपनी सहजता और सरलता के लिए जाना जाता था लेकिन ममता ने तो उसकी परिभाषा ही बदल दी है। उनके सपनों में एक ऐसा पश्चिम बंगाल है जहां विरोध के लिए कोई जगह नहीं है। जहां केवल उनका एकछत्र वर्चस्व है। उनके खिलाफ जाना मतलब मौत को निमंत्रण देना है। ममता बनर्जी लोकतंत्र और संविधान बचाने की दुहाई देती हैं लेकिन खुद क्या करती हैं, इस पर विचार करना भी उचित नहीं समझतीं। 
बंगाल की संस्कृति राजनीतिक हत्या और हिंसा की हो चली है। जब वहां कांग्रेस सत्ता में थी तो वामपंथियों को पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक पैठ बनाने के लिए लोहे के चने चबाने पड़े। उसके कई कार्यकर्ताओं पर हमले हुए। कई मार डाले गए। तब जाकर वामपंथी लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में अपना राजनीतिक परचम लहरा पाए। ममता बनर्जी ने जब वामपंथियों के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती दी तो उनके साथ भी वही हुआ। ऐसे में भाजपा सुगमता से पश्चिम बंगाल में अपने पैर कैसे जमा सकती है? वहां राजनीति आग का दरिया है, रक्त की भयावह बैतरणी है जिसे डूब कर ही पार करना है। भाजपा को भी समझना होगा कि 'संग्राम जिंदगी है। जो लड़ नहीं सकेगा, आगे नहीं बढ़ेगा।' यह लड़ना एक तरह से सिर कटाना है।
यह राज्य देश के अन्य राज्यों से जरा भिन्न है। अब तक कई भाजपा और आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्याएं हो चुकी हैं। कुछ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता भी मारे गए हैं। यह स्थिति किसी भी लिहाज से संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। हत्या और हिंसा को सराहा नहीं जा सकता। जो मुख्यमंत्री आपराधिक तत्वों पर रोक नहीं लगा पा रही हों, उन्हें एक क्षण भी सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। बंगाल की संस्कृति कभी अलगाववाद की नहीं रही। ममता बनर्जी जिस तरह की राजनीति कर रही हैं, उससे उनकी पृथकतावादी सोच का पता चलता है। वे बंगाल को गुजरात नहीं बनने देना चाहतीं। बंगाल गुजरात बन भी नहीं सकता। जहां अलगाववादी ताकतें निरंकुश हो जाएं, वह गुजरात जैसा औद्योगिक शहर कैसे बन सकता है? गोधरा एक हादसा था। क्रिया की प्रतिक्रिया थी। विपक्ष ने प्रतिक्रिया को तो तूल दिया लेकिन क्रिया पर डकार तक नहीं ली। पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा पर गृह मंत्रालय की सलाह को ममता सरकार राजनीतिक हस्तक्षेप के चश्मे से देख रही है। वह अपनी कार्यशैली में सुधार करना नहीं चाहती। 
भाजपा जहां तृणमूल कांग्रेस को राज्य में हो रही राजनीतिक हिंसाओं के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है, वहीं ममता बनर्जी भाजपा पर राज्य के लोगों को भड़काने का आरोप लगा रही हैं। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी दिल्ली में थे। उन्होंने प्रधानमंत्री को राज्य की स्थिति को लेकर 48 पेज की रिपोर्ट सौंपी है। गृहमंत्री द्वारा आहूत समीक्षा बैठक में भी पश्चिम बंगाल की स्थिति पर गहन विमर्श हुआ है। इसका मतलब साफ है कि वहां धारा 356 का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। केंद्र सरकार को इस तरह के इनपुट मिल रहे हैं कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश में विलय जैसा कदम उठा सकती हैं। अगर जल्द ही वहां ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वहां कश्मीर जैसे हालात बन सकते हैं। मुख्यमंत्री यह कहकर अपने दायित्व बोध से नहीं बच सकतीं कि यह तो अमुक पार्टी का किया-धरा है। अपराध को रोकने की जिम्मेदारी अंतत: उन्हीं की है। लेकिन जिस राज्य की पुलिस सरकार के कार्यकर्ता की तरह काम करने लगे, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों को जबरन थाने में बैठाने लगे, उस राज्य में कानून व्यवस्था दयनीय ही हो सकती है। बेहतर होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 
 जिस राज्य की मुखिया 'जय श्रीराम' कहने पर भड़क उठे और ऐसा कहने वालों को जेल भिजवा दे, वहां सह अस्तित्व और सामाजिक, सांप्रदायिक सौहार्द की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी के दिल्ली गमन से बौखलाई ममता का ट्वीट दृष्टव्य है जिसमें कहा गया है कि 'मैं राज्यपाल का सम्मान करती हूं, लेकिन हर पद की अपनी संवैधानिक सीमा होती है।' ममता जब यह कहती हैं कि 'घायल शेर ज्यादा खतरनाक होता है' तो इससे उनके खतरनाक इरादों का पता चलता है। 
 पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में जिस तरह भाजपा ने अपनी पैठ बनाई है और मुख्यमंत्री को राजनीतिक शिकस्त दी है, उससे उन्हें भय सताने लगा है कि राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी अगर ऐसा ही प्रदर्शन रहा तो उनका क्या होगा? यही वजह है कि तृणमूल कार्यकर्ता गोलबंद होकर भाजपा के लिए काम करने वालों पर हमले कर रहे हैं। हालात यह है कि लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद से ही पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा चरम पर है।
 केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को सलाह भी दी कि वह विधि व्यवस्था बनाए रखे और राज्य में शांति स्थापित करे। अपनी ड्यूटी सही से न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। बजाय इस पर अमल करने के पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव ने गृह मंत्रालय को खत लिख दिया कि राज्य में स्थिति नियंत्रण में है। किसी भी तरह से यह न समझा जाए कि राज्य की कानून व्यवस्था लागू करने वाली मशीनरी ऐसा करने और लोगों में विश्वास जगाने में असफल रही है। राज्य में चुनाव के बाद कुछ घटनाओं को असामाजिक तत्वों ने अंजाम दिया है लेकिन कानून लागू करने वाली अथॉरिटीज ने इन मामलों में बिना किसी देरी के उचित और कड़ी कार्रवाई की है। ममता बनर्जी 'जय श्रीराम' का नारा लगाने वालों को उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात का बता चुकी हैं। वह कहती हैं कि 'वे यहां कमाते हैं और अराजकता फैलाते हैं।' जय श्रीराम उच्चारण पर ममता की नाराजगी से नाराज देश ने उनके पास इतने 'जय श्रीराम' लिखे पोस्टकार्ड भेजे कि उन्हें पढ़ पाना भी उनके लिए मुश्किल हो गया। ममता बनर्जी ने पिछले दिनों राजनीतिक झड़प में टूट गई ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा का अनावरण कर दिया है लेकिन इसी के साथ भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच मूर्ति पर सहानुभूति की राजनीति का भी खेल आरंभ हो गया है। यह प्रतिमा किसने तोड़ी, यह जांच का विषय है। भाजपा और तृणमूल दोनों ने ही इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया था। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि बंगाल में राजनीतिक हिंसा पर रोक न लगी तो वहां राष्ट्रपति शासन भी लग सकता है। उनके इस कथन के राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि अब ममता बनर्जी शासन के दिन लद चुके हैं। वामपंथी नेता सीताराम येचुरी के इस कथन को इसी क्रम में देखना मुनासिब होगा कि बंगाल में राजनीतिक हत्याओं की जितनी भी निंदा की जाए, कम है। लेकिन इन सबके बावजूद पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जाना चाहिए। 'मां, माटी और मानुष' की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी को  बम, गोली और बारूद की राजनीति से बाज आना चाहिए। ममता भले ही अपनी जंग को बंगाल बनाम गुजरात का रूप देने की कोशिश करें लेकिन उन्हें यह तो समझना ही होगा कि यह देश सबका है। देश संघीय ढांचे से चलता है। देश के ढांचे को तोड़ना अत्यंत घातक है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगे या न लगे लेकिन जनता उच्छृंखल राजनीति के दुर्ग पर अपना ताला जरूर जड़ देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।  
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


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