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योग समझना है तो एस व्यासा आइए

12/07/2019

योग समझना है तो एस व्यासा आइए

मात्र 30-40 साल पहले यह विशुद्ध रूप से जंगल था। इसी जंगल में थोड़ी सी जमीन खरीदकर डॉ.एचआर नागेंद्र (गुरुजी)की बुआ अपनी जीवन के शेष भाग को शांतिपूर्वक व्यतीत करने यहां आयीं थीं। आज बेंगलुरु तक हवाई,रेल, बस सुविधा उपलब्ध है। सुबह छह बजे बंगलुरू स्थित पते पर नामांकन कराने से संस्थान की बस उपलब्ध हो सकती है। नहीं तो 1200-1500 रुपये देकर निजी टैक्सी से 81 किलोमीटर की यात्रा कर आप यहां पहुंच सकते हैं। भव्य तोरण द्वार देखने के साथ ही शांति का अनुभव होता है। दाहिनी तरफ इस संस्थान का नाम ‘स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान’ लिखा है तो बाईं ओर लिखे मात्र दो शब्द ‘प्रशांति कुटीरम’ पूरे परिसर को प्रतिध्वनित करते हैं। तोरण द्वार के ऊपरी भाग में स्वामी विवेकानंद का मूर्ति संदेश देती है कि यहां अपने दिन किस तरह से व्यतीत करने होंगे। परिसर में प्रवेश करते ही स्वामी विवेकानंद की एक प्रशस्त मूर्ति और सामने खुला मंच है। गुरुजी भी इसी मंच से छात्र एवं अतिथियों को यदा-कदा संबोधित करते हैं।

एस व्यासा से तात्पर्य है स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान। यह कर्नाटक राज्य के बंगलुरु जिले के कल्लूबल्लू के नजदीक जिगनी के पास है। मूल पता तो जिगनी ही है लेकिन यह गांव गिडेन हल्ली में स्थित है।

बगल में मां शारदा, स्वामी रामकृष्ण परमहंस की साधनारत मूर्तियां भी हैं। नासा में वैज्ञानिक डॉ. नागेंद्र 1970 में भारत लौटे और यहीं बुआ के पास रहने लगे। एकनाथ रानाडे,शेषाद्री जी,स्वामी अमृतानंद तथा सत्यनारायण शास्त्री का इनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। परिसर से ही सटे एक गांव में निवास कर रहे सत्यनारायण शास्त्री ने डॉ. नागेंद्र को वेद-वेदांग और योग की उच्च कोटि की साधना से अवगत कराया। यह घर कब आश्रम में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। डॉ. नागेंद्र रामकृष्ण मिशन आश्रम से भी जुड़े थे। सपनों को मूर्त रूप देने की बात आई तो विवेकानंद के नाम पर ही ‘स्वामी विवेकानंद योग रिसर्च फाउंडेशन’ की स्थापना 1986 में की। इसके सचिव, फिर अध्यक्ष और विश्वविद्यालय के कुलपति के बाद अब कुलाधिपति हैं। 2002 से यह डीम्ड यूनिवर्सिटी जरूर है पर इसको यूजीसी की ओर से ‘ए प्लस प्लस’ ग्रेड प्राप्त है। यहां योग, आयुर्वेद, यूनानी, पंचकर्म, बिजनेस मैनेजमेंट, फिजियोथेरेपी, नेचुरोपैथ इत्यादि से संबंधित एक सप्ताह से लेकर साढ़े पांच साल तक के कोर्स चलाए जा रहे हैं। सबसे अधिक ख्याति प्राप्त कोर्स एक महीने का वायआईसी (योगा इंस्ट्रक्टर कोर्स) है। डेढ़ सौ छात्रों का चयन होता है, फीस 30 हजार है। कुछ लोग हर बार प्रतीक्षा सूची में रह जाते हैं। योग को जानने-समझने के लिए पहले इसमें नामांकन लेना चाहिए।

सुरक्षा भी, प्रशिक्षण भी

द्वार पर ही सुरक्षाकर्मी आपको रोकेंगे, टोकेंगे फिर आगे बढ़ने की इजाजत देंगे। सुरक्षाकर्मी एसआईएस के हैं। यह परिसर एसआईएस का भी अभ्यास केंद्र (ट्रेनिंग-सेंटर) भी है। आपको सुरक्षा व्यवस्था का अहसास हर कदम पर होगा। कार्यालय में सुरक्षा अधिकारी और ट्रेनर निर्मल लमसल बताते हैं कि हमारे नये व्यक्तियों को यहां कुछ महीनों का प्रशिक्षण देकर एक जिम्मेदार सुरक्षाकर्मी बनाया जाता है। कुल 36 सुरक्षाकर्मी इस परिसर की भी 24 घंटे 365 दिन देखभाल करते हैं। लमसल बताते हैं कि अगर सुरक्षाकर्मियों को भाषा संबंधी थोड़ा अभ्यास कराया जाय तो और अधिक सुविधा होगी।

कुलाधिपति नहीं, संन्यासी भी

एक संन्यासी की तरह संस्था के कुलाधिपति डॉ. नागेंद्र के पास 6 फिट लंबी और 3 फीट चौड़ी लकड़ी की चौकी, लकड़ी की ही एक कुर्सी और आलमारी है। कोई भी बगल की खिड़की से लगी चाबी से उनका कमरा खोलकर इस सम्पत्ति का मुआयना कर सकता है। यह आश्रमवासियों के लिए भी सादा जीवन और उच्च विचार का संदेश है।

बहन का मिला साथ

घर-घर योग पहुंचाने के ध्येय से डॉ. नागेंद्र प्रतिदिन 17-18 घंटे काम करते हैं। इस काम में इनकी बहन डॉ. नागरत्ना परछाई की तरह शामिल रहती हैं। डॉ. नागरत्ना ब्रिटेन में एक चिकित्सक थीं। डॉ. नागेंद्र के बाहर होते हैं तो सारी जिम्मेदारी डॉक्टर नागरत्ना पर आ जाती है। सामान्य तौर पर वह बेंगलुरु शहर में ही स्थापित संस्थान की एक अन्य शाखा पर यह अपना काम करती हैं।

जनमानस में हैं ‘गुरुजी’

डॉ. नागेंद्र को गुरुजी की संज्ञा जनमानस की दी हुई है। गुरुजी विश्वविद्यालय को एक यांत्रिक परिसर के बजाय भारतीय आश्रम व्यवस्था का अंग बनाने की चेष्टा में लगे रहते हैं। परिसर के विभागों का नामकरण ऋषि-महर्षियों एवं वैदिक पात्रों के नाम पर किए गए हैं। जैसे कि मंगल मंदिर, पुष्पा,गार्गी,नालंदा,चाणक्य,रामकृष्ण कुटीर इत्यादि। आपको यह परिसर एक दूसरे लोक में होने का एहसास कराता है। इलाज करवाने आए लोगों को भी रोगी नहीं,भागीदार कहा जाता है। उद्देश्य सर्वप्रथम रोगी को रोगी की भावना से मुक्त करना है।

रसोई में 1200 लोगों की चिंता

इस विश्वविद्यालय में अभी कुल 200 कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त एक हजार छात्र परिसर में रहते हैं। कुल मिलाकर 1200 लोग इस परिसर के अंदर रहते हैं। लगभग 500 लोगों का खाना प्रतिदिन बनता है।

अधिक से अधिक प्रकृति के नजदीक ले जाना एसव्यासा का मुख्य उद्देश्य है। वायआईसी (योगा इंस्ट्रक्टर कोर्स) के अलावा 19 अलग-अलग कोर्स में नामांकन संभव है। योग में डिप्लोमा से लेकर डिग्री तक यहां दी जाती है। बी एससी से लेकर पीएच डी तक के विषय यहां पढ़ाए जा रहे हैं। भविष्य में सरकार जो एक लाख योग केंद्र खोलने जा रही है, उसके लिए लाखों योग प्रशिक्षक की जरूरत होगी। तहसील से लेकर देश के स्तर पर तथा प्राथमिक चिकित्सालय से लेकर एम्स तक के लिए जो योग प्रशिक्षकों की नियुक्ति की जानी है, उसके लिए एसव्यासा दिन-रात काम कर रहा है। यहां के शिक्षक बताते हैं कि यहां से पढ़े छात्र चीन, थाईलैंड, मलेशिया, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों में आसानी से मिल जाएंगे। इसके अलावा बहुत से होटल,कंपनी,कारपोरेट हाउस,निजी विद्यालय एवं निजी चिकित्सा में चले जाते हैं। कई तो विदेश से कमाकर खुद ही योग केंद्र खोल लेने की स्थिति मेें हैं। योग को आधुनिक स्वरूप में लाना उद्देश्य है पर मूल जस का तस बना रहे, इसको भी ध्यान में रखा जाता है। गरीब छात्र भी पैसा कमाना शुरू करने के बाद फीस जमा कर सकते हैं। किसी भी धर्म-संप्रदाय-जाति के साधुसं न्यासी और बिना आर्थिक लाभ के काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का इलाज,रहना-खाना सभी मुμत उपलब्ध कराया जाता है।

एस. व्यासा की ख्याति फैलने का एक कारण मधुमेह रोग से लोगों को निजात दिलाना भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत 2030 तक मधुमेह रोगियों के मामले में चीन से आगे निकलकर पहले स्थान पर होगा। एस. व्यासा ऐसा होने नहीं देगा। देश के 30 राज्यों के 60 जिलों में (हर राज्य के दो जिले) दो लाख, 40 हजार मधुमेह रोगियों पर अध्ययन शुरू किया गया। योग से इलाज शुरू हुआ तो उनका शुगर लेवल कम हुआ, इंसुलिन का स्त्राव शुरू हुआ और लोगों का मधुमेह रोग समाप्त हो गया। मधुमेह उन्हें फिर से पीड़ित ना कर दे, इसीलिए सिखाए हुए योग करना जरूरी होगा। याद रखना होगा कि मधुमेह और भी कई तरह के रोग को बुलावा देता है। एसव्यासा रोग को दो भागों में बांटकर अध्ययन करता हैक म्युनिकेबल डिजीज के तहत महामारी, हैजा, कॉलरा आदि के इलाज में आधुनिक चिकित्सा पद्धति कामयाब रहा है। नॉन कम्युनिकेबल डिजीज को रोगी खुद ही बुलाते हैं। तनाव, अस्थमा, मोटापा, स्ट्रोक, मधुमेह, कैंसर आदि के इलाज में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अपने को असहाय पा रहा है।

                                                              साक्षात्कार

डॉ. अमित सिंह एस व्यासा में आरोग्यधाम के मुख्य चिकित्साधिकारी हैं। इस संस्थान को मधुमेह रोग के सटीक इलाज के मामले में ख्याति मिल चुकी है। डॉ. सिंह के शोध का क्षेत्र मधुमेह ही है। इस रोग के इलाज तथा एस व्यासा के विभिन्न मुद्दों पर उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश।

 

  • एस व्यासा को मधुमेह रोग की चिक्तिसा में सफलता मिली है? यह कैसे हुआ और आगे इस क्षेत्र में क्या योजना है ?

सच है कि हमने देश के 30 राज्यों के 60 जिलों में दो लाख,40 हजार मधुमेह रोगियों पर अध्ययन शुरू किया। योग के जरिए परिणाम आश्चर्यजनक निकले। वे योग के जीवन शैली को अपनाकर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं। पर मधुमेह उन्हें फिर से पीड़ित ना करे, इसीलिए सिखाए-बताए हुए योग को करना जरूरी है। हमारे संस्थान में मधुमेह रोगी सबसे ज्यादा आते हैं। मधुमेह के चार कारण बतलाए गए हैं-1.भोजन की अनियमितता 2.शारीरिक श्रम कम करना 3.मानसिक तनाव तथा 4.गलत आदतें। इनमें से किसी एक का असंतुलन भी मधुमेह का कारण बन सकता है। पहले हम रोगी के आई.डी.आर.एस(इंडियन डायबिटीज रिस्क स्कोर) के पैमाने पर अध्ययन करते हैं। जो रोगी हैं, जिन्हें मधुमेह रोग की आशंका है,जिनके माता-पिता में से किन्ही को ये रोग है-अब उन सबके लिए एक चार्ट तैयार किया जाता है। तीनों स्तर के लिए अलग-अलग योग हैं। जिनके माता िपता को मधुमेह है वह हाई रिस्क जोन में होते हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि भविष्य में उन्हें मधुमेह रोग हो ही। वे योग और आहार-विहार पर ध्यान देकर मधुमेह से मुक्त रह सकते हैं। जो प्री डायबिटीज के मरीज हैं, उन्हें भी योग सिखा कर खाने-पीने संबंधी चार्ट बना कर दिया जाता है। जिन्हें मधुमेह रोग है, उन्हें मेहनत थोड़ी अधिक करनी होगी। खान-पान और योग संबंधी निर्देशों के पालन से वे भी मधुमेह रोग से मुक्त हो सकते हैं।

  • मधुमेह रोगियों के बारे में आपकी विशेष चेतावनी क्या है?

ऐसे लोग दिनचर्या के प्रति असावधान न हों। जो लापरवाह होंगे, उन्हें मधुमेह विभाग के अलावा आठ अन्य चिकित्सा विभागों का भी खर्च उठाना पड़ सकता है। इनमें ब्रेन,हार्ट,किडनी इत्यादि शामिल हैं। हमारे संस्थान का शत-प्रतिशत दावा है कि मधुमेह रोग को पूर्णत: ठीक किया जा सकता है। मंडूकासन,वक्रासन ,अर्धमत्स्येंद्रासन,भुजंगासन इत्यादि करते रहें तो आप निसंदेह मधुमेह रोग से बचे रह सकते हैं।

  • संस्थान चिकित्सा के क्षेत्र में कौन सा विशेष ढंग अपनाता है?

प्राण और ऊर्जा के असंतुलन से ही रोग पैदा होते हैं। इस प्राण और ऊर्जा को कैसे उच्च स्तर पर बनाये रखा जा सके, इसके लिए हमारी प्रयोगशाला में दिन रात काम किया जा रहा है। प्राणवायु (आॅक्सीजन) के मामले में भी लगातार प्रयोग हो रहे हैं। मरीज का प्रीडाटा लेकर मूल्यांकन किया जाता है। तदुपरांत इलाज के द्वारा लगभग प्रत्येक दिन उनका डाटा अलग से लिया जाता है। डाटा से तात्पर्य रक्त का नमूना,रक्तचाप,नाड़ी गतिविधि,भावनात्मक स्तर पर किया गया व्यवहार इत्यादि से है। इलाज के बाद उसका पोस्ट डाटा मूल्यांकन किया जाता है। फिर सभी को मिलाकर एक निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है। तब पता चलता है कि इलाज से पहले मरीज का हाल कैसा था,इलाज के दौरान क्या सुधार हुआ,इलाज के बाद वह अब कैसा महसूस कर रहा है।

  • योग को चिकित्सा पद्धति से जोड़ने में एसव्यासा को कितनी सफलता मिली है?

तर्क की कसौटी पर कसे बिना लोग योग पहले भी करते थे। हमने बस इसे तार्किक बनाया तथा विज्ञान घोषित करने के लिए लगातार कोशिश की। योग से बहुत सारे नॉनकम्युनिकेबल डिजिज ठीक किए गए हैं। योग थकेहारे रोगियों का अब यह एकमात्र सहारा नजर आ रहा है।

  • आज की जीवन पद्धति के कारण पैदा हो रहे रोगों से निजात दिलाने में योग कितना कारगर है?

जीवन में तनाव,गलत आदतें,आहार-विहार का ख्याल न रखने से उत्पन्न रोगों के इलाज में योग अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मधुमेह का पूर्ण इलाज़ सम्भव है, इसका जीता जागता उदाहरण है।

  • हृदय रोग का उपचार भी योग क्रियाओ में ढूंढने की कोशिश आप लोग कर रहे हैं?

आंशिक सफलता मिली भी है। इसमें और कार्य किए जाने तथा शोध की आवश्यकता है। कोशिश लगातार जारी है।

  • किसी साधारण व्यक्ति के लिए यह समझना मुश्किल है कि उन्हें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और कौन सा योग करना चाहिए? उनके लिए आपकी क्या राय है?

एसव्यासा विभिन्न योग संस्थानों तथा प्रबुद्ध वर्गों के बीच यह बात ले गया है। सभी ने माना कि मूल की तो चिंता है ही। एक घंटे के योग में 45 मिनट मूल योग (जो सभी संस्थान कराएंगे) के बाद 15 मिनट खुद के शोध और अनुसंधान से जो प्राप्त किया है, उसे सिखाया कराया जाएगा।

  • योग से कैंसर जैसी भयावह बीमारियों को भी नियंत्रित अथवा समाप्त किया जा सकता है?

कुछ योग करके आप एक स्वस्थ दिनचर्या में आ सकते हैं। यह समाप्त हो ही जाएगा, ऐसा कोई हमारे पास वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। पर हम नि:सन्देह इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। सकारात्मक परिणाम जल्दी ही देखने को मिलेगा।

  • इसे विश्वविद्यालय का स्वरूप देने की क्या जरूरत आ पड़ी? क्या यह संस्थान सिर्फ योग के प्रचार- प्रसार के लिए है?

ज्यादा से ज्यादा लोग इस वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर अपना जीवन खुशहाल रख सकते हैं। और रखते भी हैं। स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार की नींव पर ही इस विश्वविद्यालय को खड़ा किया जा रहा है। सिर्फ योग के प्रचार-प्रसार के लिए ही नहीं बल्कि विलुप्त हो रहे आयुर्वेद, नेचुरोपैथी, फिजियोथेरेपी को फिर से समाज में कैसे लाया जाए, इसके लिए भी यह काम कर रहा है।

  • योग अब बाजारवाद की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है, इस दौड़ से खुद को कैसे अलग रखते हैं?

हमारा पैसा कमाना ध्येय नहीं है। पर रोजगारपरक हो, हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। हम सेवा कर दैनिक जरूरतों को पूरा करने भर आर्थिक सहायता जरूर प्राप्त करना चाहते हैं। जिन्हें योग की जरूरत है उसके लिए एसव्यासा का दरवाजा हमेशा खुला मिलेगा।

  • आप का एम्स से करार हुआ था। उसमें कितनी प्रगति हुई है? क्या उन्होंने आपकी इस चिकित्सा पद्धति को मान्यता प्रदान कर दी?

करार की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे हैं। हम वैज्ञानिक तरीकों से होने वाले फायदों को लिख पढ़ रहे हैं। एम्स ने भी माना कि योग चिकित्सा की एक अलग विधा बन सकता है। इस तरह हम दोनों ने मिलकर कई शोध पेपर विभिन्न जर्नलों में दिया है, जिसे पढ़ा भी गया है और सराहा भी जा रहा है।

ज्यादा से ज्यादा यह रोग के स्तर को कम करता है या नियंत्रित रखता है। योग और आयुर्वेद को अपनाकर विभिन्न रोगों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। अन्य रोगों को भी समाप्त किया जा सके, इसके लिए लगातार शोध किया जा रहा है। डाबर की फैलोशिप पर डॉ. सोनू मौर्या शोध कर रहे हैं। कैंसर मरीज मणिकांत सोनी उदाहरण हैं। बैंक मैनेजर सोनी को चौथे स्टेज में इसका पता चला। हताशा और निराशा के बीच एसव्यासा पहुंचे तो आयुर्वेदिक दवा तथा योग का सहारा मिला। जिसे आधुनिक चिकित्सक अलविदा कह चुके थे वह आज बिल्कुल स्वस्थ और सामान्य हैं। एसव्यासा मधुमेह की तरह इस रोग की समाप्ति के लिए भी शोध कर रहा है। कुल मिलाकर एसव्यासा की कथा अनंत है, पर केंद्र में सिर्फ एक कथा है और वह है प्रकृति के जरिए जीवन के प्रति आस्था की। न्यूरोलॉजी,आँकोलॉजिक,आॅडियोलॉजी इत्यादि 8 विभाग नॉनकम्युनिकेबल डिजीज के इलाज के लिए हैं। भव्य प्रयोगशाला में दिमाग के स्तर से लेकर व्यक्ति के व्यवहार तक का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया जाता है। कम सोकर ज्यादा कार्य कैसे किया जाए,इस पर भी काम किया जा रहा है। भावनात्मक स्तर पर एक व्यक्ति का अलग-अलग समय में व्यवहार भी अध्ययन का विषय है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का मानना है कि जिस अंग में आपका रक्त का संचार सही तरीके से नहीं होता है वहीं आगे चलकर रोग पैदा होते हैं और धीरे-धीरे वह अंग खराब होने लगता है। जबकि योग का मानना है कि प्राण और ऊर्जा की वजह से ऐसा होता है। इसे एसव्यासा ने सिद्ध भी करके दिखाया है। इस प्राण और ऊर्जा को कैसे उच्च स्तर पर बनाये रखा जा सके इसके लिए प्रयोगशाला में दिन रात काम किया जा रहा है। जिन्हें भी थोड़ी योग की जानकारी या समझ है वह जानते हैं कि योग के आठ सोपान हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि। लेकिन समाधि तक पहुंचेगा कौन? तपस्या के लिए कौन तैयार है? यम का एक भाग अहिंसा है इसको अपनाकर गांधी जी कहां से कहां पहुंच गए। खैर हम योग को स्वास्थ्य लाभ से ही जोड़ कर देखते हैं। जिनको इससे आगे जाना है वह अपने स्तर पर योग्य गुरु की तलाश करें। लेकिन यह संस्थान स्वास्थ्य और रोजगार की शर्त पर ही काम कर रहा है। यह एक सच्चाई भी है।



 
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