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जमानत से हिरासत में

18/09/2019

जमानत से हिरासत में

जितेन्द्र चतुर्वेदी

ईएनएक्स मीडिया घोटाला पी.चिदंबरम के कार्यकाल में हुआ। वे इसके सूत्रधार हैं। यह खुला रहस्य है। फिर भी अगर इन्हें जमानत दी गई तो इसका गलत संदेश जाएगा। इसलिए अग्रिम जमानत याचिका खारिज की जाती है। 20अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट ने पी.चिदंबरम की अग्रिम जमानत पर सुनवाई करते हुए, यही कहा था। जाहिर है यह चिदंबरम के लिए बड़ा झटका था। वह तकरीबन साल भर से इसी के बल पर जांच एजेंसियों को छका रहे थे। लेकिन इस बार मामला उलटा पड़ गया था। हाईकोर्ट ने उन्हें संरक्षण देने से मना कर दिया। इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। वे गए भी। 20 अगस्त को चिदंबरम वकीलों के साथ वही पर थे। पर बात बनी नहीं। 21 अगस्त को उनके वकील एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई 23 अगस्त को होगी। यह चिदंबरम पर व्रजपात था। उनके सामने अब समर्पण के अलावा दूसरा नहीं बचा था।

पी.चिदंबरम कानून की गिरμत में हैं। आरोप संगीन हैं। हालांकि हर आरोपी की तरह वह खुद को पाक साफ बता रहे हैं। लेकिन जो दस्तावेज हैं, वे उनके दावों की पोल खोलते हैं।

लिहाजा चिदंबरम और उनके दल ने इसे राजनीतिक रंग देने की जुगत भिड़ाई। उसी के तहत 21 अगस्त की रात 8.15 मिनट पर कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस हुई। 20 अगस्त की शाम से लापता हुए चिदंबरम वहीं प्रकट हुए। तब तक किसी को पता नहीं था चिदंबरम की प्रेंस कांफ्रेंस है। जानबूझ कर यह छुपाया गया था। डर था कि अगर जाहिर किया गया तो एजेंसी चौंकनी हो जाएगी। इसी वजह से मीडिया को भी नहीं बताया गया था। वे काली मर्सडीज में 24 अकबर रोड पहुंचे और अपना बयान जारी किया। वे क्या कहना चाह रहे हैं, सबको पता था। पर एक बात जो उन्होंने कही, वह कांग्रेस और चिदंबरम के अहम को बताती हैं। वे कहते हैं…. मैं 12-13 महीनों से अग्रिम जमानत का मजा ले रहा था।…. उनका यह बयान बताता है कि वे कानूनी संरक्षण को अपना विशेषाधिकार मान रहे थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह उनका अधिकार है। लेकिन विशेषाधिकार तो कतई नहीं है। इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि वे पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं और सांसद हैं, इसलिए उन्हें नहीं छोड़ा जा सकता। उन पर आरोप बहुत गंभीर है। यह ठीक है कि उनके खिलाफ इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि मामला ‘हवाला’ से जुड़ा है। चूंकि ‘हवाला’ चिदंबरम के कार्यकाल में हुआ, इसलिए इन्हें जमानत देना सही नहीं होगा। लिहाजा सीबीआई ने चिदंबरम को हिरसात में ले लिया। उनसे आईएनएक्स मीडिया से जुड़े मामले की पूछताछ की जा रही है। इसमें उनके पुत्र कार्ति चिदंबरम आरोपी है।

आईएनएक्स मीडिया

मामला 2007 का है। उसके सालभर पहले आईएनएक्स मीडिया की नींव रखी गई थी। इसके मालिकान विदेश से कंपनी में निवेश कराना चाहते थे। इसके लिए एफआईपीबी से मंजूरी की जरूरत होती है। लिहाजा वे अनुमति लेने बोर्ड के पास गए। बार्ड ने नियम के मुताबिक 4.62 करोड़ रुपये तक की अनुमति दी। लेकिन आईएनएक्स इतने पर राजी नहीं था। वह तो बाहर से और निवेश करना चाहता था। इसके लिए बोर्ड ने उससे कहा कि वह दूसरा आवेदन दे। यह बात आईएनएक्स को नागवार गुजरी। इससे उनके रसूख को चोट पहुंची। उन्होंने बोर्ड की बात को अनसुना कर दिया और दूसरा आवेदन नहीं किया। इसके बजाए बोर्ड ने जो 4.62 करोड़ रुपए के विदेशी निवेश की अनुमति दी थी, उसे खुद ही बढ़ाकर 300 करोड़ कर दिया। इस तरह आईएनएक्स मीडिया ने बोर्ड की मंजूरी के बिना 300 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश कंपनी में करा लिया। यह गैरकानूनी था। यह मामला ज्यादा दिन छुपा नहीं।

किसी ने 2008 में इस हेराफेरी की जानकारी आयकर विभाग को दी। विभाग ने इस संबंध में एफआईपीबी से जवाब मांगा। उसने छानबीन करना शुरू कर दिया। आईएनएक्स मीडिया से विदेशी निवेश के संबंध में पूछताछ की गई। इससे वह घबरा गए। उन्हें लगा कि कानूनी पचड़े में फंसने से अच्छा है, कुछ खर्च करके मामले को निपटा दिया जाए। इसके लिए किसी लायक व्यक्ति की दरकार थी। इसी दरमियान उनकी मुलाकात कार्ति चिदंबरम से हुई। उन्होंने पूरी कहानी कार्ति को सुनाई। उसके लिए यह तो बहुत छोटी-मोटी बात थी। हो भी क्यों न? थानेदार तो उनके पिता ही थे। ऐसे में डकैतों को बचाना उनके लिए बड़ी बात नहीं थी। हुआ भी वही। आईएनएक्स मीडिया से कार्ति ने कहा कि आप बोर्ड के सवाल का जवाब दें, मैं वहां सब संभाल लूंगा। कंपनी ने गोलमोल जवाब भेज दिया। उसने अपने गैरकानूनी विदेशी निवेश को सही ठहराया। बोर्ड उससे संतुष्ट नहीं था। मगर वह कर भी क्या सकता था? कार्ति ही कंपनी की पैरवी करने में लगे थे।

अगर चिदंबरम मैक्सिस के प्रस्ताव को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति के पास भेजते तो गृह मंत्रालय और खुफिया ब्यूरो मैक्सिस के निवेश का विरोध करते क्योंकि उसका संबंध पाकिस्तान की दूरसंचार कंपनी से था। इससे मामला ठप हो जाता है। लिहाजा चिदंबरम ने ऐसा नहीं किया। लेकिन 3500 करोड़ रुपये लाना था। इसका उन्होंने तरीका खोज निकाला। सरकारी कागजों पर निवेश को 3500 करोड़ रुपये का दिखाया ही नहीं गया। अप्रूवल लेटर पर निवेश की रकम 180 करोड़ रुपये बताई गई।

उन्होंने बोर्ड के अधिकारियों को कथित तौर पर डराया-धमकाया और हिदायत दी कि आईएनएक्स पर कोई कार्रवाई न की जाए। इसके बाद तो बोर्ड में किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह कंपनी के खिलाफ कोई कदम उठाए। इसलिए आयकर विभाग को भी सही जानकारी नहीं दी गई। उसे बताया गया कि आपको गलत जानकारी मिली है। आईएनएक्स मीडिया ने कोई गलत काम नहीं किया है। इस तरह कार्ति चिदंबरम की मदद से पीटर मुखर्जी ने अपनी कंपनी की धोखाधड़ी को छुपा लिया। इसके लिए बाप- बेटे ने आईएनएक्स मीडिया यानि इन्द्राणी मुखर्जी से मोटी रकम वसूली। यह वही इन्द्राणी मुखर्जी हैं जो बाप-बेटे के कारनामों की गवाह हैं। इसीलिए चिदंबरम डरे हुए हैं। पीगुरुज का दावा है कि गवाह को जेल में मारने की साजिश रची जा गई थी। यह षड़यंत्र कोई और नहीं चिदंबरम रच रहे हैं। दो बार इन्द्राणी को मारने की कोशिश हो चुकी है। लेकिन दोनों बार वह बच गई। बेबसाइट के मुताबिक पूछताछ में इन्द्राणी ने कबूल किया कि उसने कार्ति चिदंबरम को रिश्वत दी थी। उसका एक वेबसाइट हिस्सा पी.चिदंबरम को भी गया।

एयरसेल-मैक्सिस

एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में भी चिदंबरम का नाम है। सीबीआई ने 8000 पेज की चार्जशीट दाखिल की है। वह तीन ट्रक के जरिए टूजी अदालत पहुंचाई गई। इस घोटाले में 18 आरोपी हैं जिनमें छह कंपनियां भी शामिल हैं। आरोप है कि इन लोगों ने मलेशियन कंपनी मैक्सिस को लाभ पहुंचाने के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड के नियमों का उल्लंघन किया है। इसमें चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति और भतीजे ए.पालनिअप्पन के अलावा पूर्व वित्त सचिव अशोक झा, अशोक चवाला, मैक्सिस के मालिक टी.आनंद कृष्णन, एयरसेल के सीईओ वी.श्रीनिवासन और चिदंबरम परिवार के एकाउंटेट एस.भास्कर का नाम है। चार्जशीट में कार्ति चिदंबरम की कंपनी एडवांटेज स्टेट्रजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लि. और चेस मैनेजमेंट पर भी आरोप है। सीबीआई ने चार्जशीट में कहा है कि चिदंबरम ने वित्त मंत्री रहते हुए, कार्ति चिदंबरम की कंपनी को लाभ पहुंचाया। इसके लिए उन्होंने आपराधिक षड़यंत्र रचा। सरकारी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की और तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा। यह सब महज इसलिए किया गया ताकि एयरसेल-मैक्सिस घोटाले पर पर्दा डाला जा सके और कार्ति की हेराफेरी को छुपाया जा सके। इस काम को इतनी सफाई से अंजाम दिया गया कि जांच एजेंसियों को सबूत हासिल करने में छह साल लग गए। पर सच सामने आ गया और चिदंबरम के हवाला का भंडा फूट गया। उन पर सीबीआई ने भ्रष्टाचार निरोधी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

चिदंबरम का एनडीटीवी कनेक्शन

एयरसेल मैक्सिस मामले में रिश्वत का एक हिस्सा एनडीटीवी के जरिए आया था। यह दावा पूर्व आयकर अधिकारी संजय श्रीवास्तव ने किया है। उन्होंने अप्रैल 2018 में सीबीआई में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उसमें लिखा है कि मैक्सिस कंपनी ने चिदंबरम को रिश्वत देने के लिए एनडीटीवी का सहारा लिया था। पत्र में दावा किया गया है कि एनडीटीवी लाइफ स्टाइल का 49 प्रतिशत शेयर मैक्सिस ने खरीदा था। उसके एवज में 200 करोड़ रुपये एनडीटीवी को मिले थे। इतनी रकम उस कंपनी के 49 प्रतिशत शेयर के लिए दी गई जिसका कुल बाजार मूल्य 40 लाख रुपये से ज्यादा नहीं था। यह तो एक बात हुई। दूसरा 200 करोड़ निवेश करके मैक्सिस उसे भूल गया। इसे महज इत्तफाक नहीं कहा जा सकता। वह इसलिए क्योंकि मैक्सिस कंपनी कर रही है। लाभ कमाना जिसका धंधा है, वह एक साथ दो गलती नहीं कर सकती। पहला, जो कंपनी महज 40 लाख रुपये की हो उसके लिए 49 फीसदी शेयर के लिए 200 करोड़ रु मैक्सिस खर्च नहीं करेगा। और दूसरा, इतना खर्च करने के बाद वह भूल जाएगा। जाहिर है यह निवेश नहीं कुछ और था। संजय श्रीवास्तव ने यही सीबीआई को बताया था। उन्होंने आयकर विभाग के उन अधिकारियों का भी जिक्र किया है जो इस पूरे घोटाले में शामिल थे। हालांकि सीबीआई ने एनडीटीवी को लेकर जो एफआईआर दर्ज की है, उसमें अधिकारियों का नाम तो नहीं लिखा है, पर अवैध रुप से हुई निवेश की चर्चा की है। वह एक अलग कहानी है जो पी. चिदंबरम और एनडीटीवी के साठगांठ से जुड़ी है।

चिदंबरम की हेराफेरी का यह किस्सा 2006 में शुरू हुआ। मलेशिया की मैक्सिस कंपनी मॉरिसस में मौजूद अपनी सब्सिडरी कंपनी के जरिए चेन्नई की एयरसेल मोबाइल आपरेटर को खरीदने के लिए विदेश निवेश संवर्धन बोर्ड के पास आवेदन करती है। आवेदन में 3500 रुपये के निवेश की बात की जाती है क्योंकि एयरसेल को खरीदने का मूल्य यही था। बतौर विदेश निवेश संवर्धन बोर्ड के चेयरमैन पी. चिदंबरम के पास 600 करोड़ रुपये तक की ही अनुमति देने का अधिकार था। उससे ज्यादा के लिए उसे आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति को भेजना था। पर एयरसेल मैक्सिस मामले में चिदंबरम ने इस नियम का पालन नहीं किया। इसकी वजह मैक्सिस में सऊदी टेलीकॉम का निवेश था। सऊदी टेलीकॉम की हिस्सेदारी मैक्सिस के साथ पाकिस्तान की दूरसंचार कंपनी पाकिस्तान टेलीकॉम कंपनी में भी थी। अगर चिदंबरम मैक्सिस के प्रस्ताव को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति के पास भेजते तो गृह मंत्रालय और खुफिया ब्यूरो मैक्सिस के निवेश का विरोध करते क्योंकि उसका संबंध पाकिस्तान की दूरसंचार कंपनी से था। इससे मामला ठप हो जाता है। लिहाजा चिदंबरम ने ऐसा नहीं किया।

लेकिन 3500 करोड़ रुपये लाना था। पर कागज पर उसे नहीं दिखाया था। इसलिए अप्रूवल लेटर पर निवेश की रकम 180 करोड़ रुपये बताई गई। दूसरा खेल दूरसंचार में विदेश निवेश को लेकर हुआ। उस समय दूरसंचार क्षेत्र में विदेश निवेश की सीमा 74 फीसदी थी। विदेश निवेश संवर्धन बोर्ड ने मैक्सिस को 74 फीसदी शेयर खरीदने की अनुमति दी। कागजों में यही लिखा गया। एयरसेल के शेष बचे 26 फीसदी शेयर को चेन्नई की सिंधया सेक्यूरिटीज एंड इनवेस्टमेंट प्राइवेट लि. ने खरीदा। यह कंपनी अपोलो अस्पताल समूह की है। इसी दरमियान मलेशिया के स्टॉक बाजार में खेल हो गया। वहां पर मैक्सिस ने सूचित किया कि एयरसेल के 99.3 प्रतिशत शेयर उसने खरीद लिए हैं। यह चौंकाने वाली खबर थी क्योंकि सरकारी कागजों में तो यही कहा गया था कि एयरसेल में महज 74 फीसदी हिस्सेदारी मैक्सिस की है और 26 फीसदी सिंधया सेक्यूरिटीज एंड इनवेस्टमेंट प्राइवेट लि. की। फिर मैक्सिस मलेशिया में कैसे कह रहा था कि एयरसेल में उसकी हिस्सेदारी 99.3 फीसदी है। उस समय एक सवाल यह भी पैदा हुआ था कि 74फीसदी शेयर मैक्सिस को 3500 करोड़ में दिया गया और 26 फीसदी शेयर सिंधया सेक्यूरिटीज को महज 34 करोड़ में कैसे दे दिया गया जबकि उसका बाजार मूल्य 1200 करोड़ रुपये था। इस खेल की भी कहानी।

मैक्सिस ने प्रत्यक्ष तौर पर एयरसेल का 65 फीसदी शेयर ही खरीदा था। बाकी का 35 फीसदी शेयर डेक्कन डिजिटेल नेटवर्क प्राइवेट लि. ने खरीदा था। इसका एक चौथाई शेयर मैक्सिस के पास था और दोत् िाहाई सिंधया सिक्यूरिटीज के पास। अब चूंकि डेक्कन डिजिटेल नेटवर्क प्राइवेट लि. की एक चौथाई हिस्सेदारी मैक्सिस की थी, इसलिए कंपनी के 35 फीसदी शेयर में से नौ फीसदी शेयर पर मैक्सिस का अधिकार हो गया। इस तरह मैक्सिस की एयरसेल में हिस्सेदारी 74 फीसदी हो गई। डेक्कन डिजिटेल नेटवर्क प्राइवेट लि. के पास एयरसेल का महज 26 फीसदी शेयर बचा। एयरसेल के इस शेयर पर मालिकाना हक सिंधया सिक्यूरिटीज का हुआ क्योंकि डेक्कन डिजिटेल नेटवर्क का दो-तिहाई शेयर सिंधया सिक्यूरिटीज के पास था। मैक्सिस ने सिंधया सिक्यूरिटीज से डेक्कन डिजिटेल नेटवर्क का शेयर 34 करोड़ रुपये में खरीद लिया। इस तरह डेक्कन डिजिटल नेटवर्क में मैक्सिस की हिस्सेदारी बढ़ गई। इससे हुआ यह कि एयरसेल का 99.3 फीसदी शेयर मैक्सिस की झोली में चला गया। जो दूरसंचार के नियमों का उल्लंघन है। नियमानुसार विदेशी कंपनी 74 फीसदी का ही निवेश दूरसंचार क्षेत्र में कर सकती है।

प्रत्यक्ष तौर पर मैक्सिस ने 74 फीसदी ही निवेश किया था। पर परोक्ष रूप से मैक्सिस ने एयरसेल का हथिया लिया। इसकी जानकारी चिदंबरम को थी। वे जानते थे कि मैक्सिस कैसा खेल, खेल रहा है। उन्होंने तो मैक्सिस की इस गैर-कानूनी काम में उसकी मदद की। इसके मेहनताने का एक हिस्सा कार्ति की कंपनी एडवांटेज स्टेट्रजिक और चेस मैनेजमेंट को मिला।


 
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