युगवार्ता

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नदियां ढलान पर राजनीति उफान पर

22/10/2019

नदियां ढलान पर राजनीति उफान पर

चंदा सिंह

बिहार के कुछ जिलों में जो भयंकर बाढ़ और जलजमाव हुआ उसके साइड इफेक्ट बीमारियों और महामारियों के रूप में दिखने लगे हैं। इन सबके बीच सियासी समीकरण भी बिगड़े-बिगड़े नजर आ रहे हैं।

बिहार में आयी बाढ़ के बाद अब राज्य की नदियां ढलान पर हैं, लेकिन राजनीति अपने उफान पर बनी हुई है। यह राजनीतिक उफान इस बार कुछ ज्यादा ही है। पटना में जल जमाव ने गठबंधन में तूफान ला दिया है। इस बीच गंगा-पुनपुन सहित सभी नदियों के जलस्तर में कमी आ गयी है। बिहार में बाढ़ और राजनीति के संबंध का पैटर्न बताता है कि बाढ़ का पानी उतरते ही सियासत भी सुस्त पड़ जाती है। प्रभावित और पीड़ित भी दुखदर्द भूल जाते हैं। राजनीति का रुख किसी और दिशा में बदल जाता है।
लेकिन इस बार की कहानी में रहस्य-रोमांच और राजनीति सब है। 2007 और 2008 में भयानक बाढ़ आयी थी। उस वक्त भी राजनीति हुई थी। 2007 में 22 जिलों में दो करोड़ 40 लाख लोग प्रभावित हुए थे और 1,287 लोगों की जान गयी थी। 2007 के बाढ़ को संयुक्त राष्ट्र ने बिहार के इतिहास की सबसे भीषण बाढ़ करार दिया था। 2008 की कुसहा त्रासदी ने तो एनडीए के दो घटक दलों जदयू और भाजपा के वर्षों पुराने संबंध को ही तबाह कर दिया था। लगभग ऐसी ही बड़ी बाढ़ 1987 में भी आयी थी। इस समय 30 जिलों में 1,399 लोगों की मौत हुई थी।
लालू प्रसाद ने 2017 की बाढ़ में भी सरकार पर हमले की कमान संभाल ली थी और बाढ़ की सियासत में बेचारे चूहें भी बदनाम हुए थे। तटबंध तोड़ने का इल्जाम उनके सिर मढ़ दिया गया था। होहल्ला के बाद सब कुछ वैसा का वैसा रह गया, लेकिन इस बार तेवर कुछ ज्यादा ही तल्ख है। दोनों गठबंधनों में विरोध-प्रतिरोध है। भाजपा और जदयू के बोल सीमाएं लांघ रही हैं। बयानबाजी का ऐसा दौर चल पड़ा है कि छह सीटों पर होने वाले उपचुनाव का शोर भी दब गया है। प्रभावित क्षेत्रों के दौरे में भी राजनीति ही हावी है। उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को छोड़कर किसी के उद्गार पर नियंत्रण नहीं है। हालांकि केंन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद एवं अश्वनी चौबे के तेवर जरूर संतुलित हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के शब्द तीर की तरह जदयू को चुभ रहे हैं।
वहीं उनके ट्वीट से गठबंधन असहज महसूस कर रही है। गिरिराज के बिगड़े बोल को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व को उन्हें शख्त हिदायत देनी पड़ी। गठबंधन धर्म का पालन करने का निर्देश उन्हें दिया गया। भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल के शब्द भी सियासी दोस्ती पर बड़े सवाल उठा रहे हैं। नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा, सांसद रामकृपाल यादव, विधायक नितिन नवीन के बोल भी गठबंधन के संबंधों को घायल कर रहे हैं। दूसरी ओर से भी रुकने—झुकने के संकेत नहीं मिल रहे हैं।
जदयू प्रवक्ता संजय सिंह, मंत्री श्याम रजक और अशोक चौधरी का मोर्चा भी सक्रिय रहा। भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जदयू को चेताया है कि बिहार में भाजपा बड़ा भाई है, वह छोटा भाई बनकर रहे। नीतीश कुमार को अगर 2020 का विधानसभा चुनाव जीतना है, तो उन्हें भाजपा के साथ छोटे भाई की भूमिका में रहना होगा। इस जुबानी जंग की झड़ी में गठबंधन के टकराव दिख ही रहे थे कि अलगाववाद के संकेत दशहरे पर रावण दहन के लिए आयोजित कार्यक्रम में भाजपा नेताओं की गैर हाजिरी ने राजनीतिक चर्चा को नया विषय दे दिया। गांधी मैदान में आयोजित रावण वध से अधिक भाजपा नेताओं की गैर हाजिरी की चर्चा हो रही है।
यह पहला मौका था जब सरकार में शामिल रहने के बावजूद भाजपा का कोई नेता समारोह के मंच पर नहीं आया। जबकि उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी समारोह के खास मेहमान थे। यह भी संयोग रहा है कि मंच पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बगल वाली कुर्सी पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बैठे थे। आमतौर पर ऐसे समारोह में नीतीश कुमार के बगल की कुर्सी सुशील मोदी के लिए ही आरक्षित रहती है।
कारण कुछ भी हो गठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। ऐसे में कार्यक्रम से बीजेपी की शत-प्रतिशत अनुपस्थिति के राजनीतिक अर्थ तलाशे जा रहे हैं। खैर देखना है कि बाढ़ से बढ़ी गठबंधन की राजनीति में दूरी पांच विधानसभा उपचुनाव और 2020 के विधानसभा चुनाव पर क्या असर होता है। 2008 की कुसहा त्रासदी की तरह 2019 की बाढ़ गठबंधन को तबाह करती है या फिर अपनी—अपनी कुर्सी बचाने के लिए यह बंधन जुड़ा रहेगा। भाजपा-जदयू की जोड़ी बिहार की जनता की पहली पसंद रही है।


 
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