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न्याय में देरी, कहीं अन्याय तो नहीं!

06/08/2019

न्याय में देरी, कहीं अन्याय तो नहीं!


फैसले से लोग सदमे में हैं। आरोपी बरी हो गए हैं। जो लोग लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा में थे उनमें निराशा है। लोगों ने सोचा 2005 में हुए विधायक कृष्णानंद राय के राजनीतिक हत्याकांड में दोषियों को सजा मिलेगी। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। अभियोजन पक्ष की तरफ से मामले को देख रहे केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और पुलिस गंभीर प्रश्नों के घेरे में हैं। इस गंभीरता को राउज एवेन्यू स्थित विशेष न्यायाधीश अरुण भारद्धाज की इस टिप्पणी से समझा जा सकता है। जिसमें न्यायाधीश अरुण भारद्धाज ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘अगर गवाहों को, गवाह संरक्षण योजना 2018 का लाभ मिलता, तो इस मुकदमे के परिणाम अलग हो सकते थे। इस मामले के सभी चश्मदीद व महत्वपूर्ण गवाह अपने पूर्व के बयानों से पलट गए हैं। ऐसे में आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जा रहा है।’

तीन जुलाई 2019 को सीबीआई न्यायालय ने मामले पर अपना फैसला सुनाया। न्यायालय ने 14 साल पुराने इस हत्याकांड में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। बरी होने वाले आरोपियों में पूर्वांचल के बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी और उसके भाई अफजाल अंसारी समेत ऐसे नाम शामिल थे, जिनका लंबा आपराधिक रिकार्ड रहा है। सबसे खास बात यह है कि इन सभी को सबूतों के अभाव में बरी किया गया है। यानी सीबीआई की जांच में कुछ भी नहीं निकला है। सीबीआई न्यायालय के फैसले के बाद सरकार व सीबीआई की भी जमकर किरकिरी हो रही है। हांलाकि मुकदमे से जुड़े रहे अधिवक्ता पार्थ अवस्थी गवाहों की कमी के बात से सहमत नहीं दिखते। पार्थ की माने तो अभियोजन पक्ष के पास पर्याप्त गवाह हैं। आगे की अदालतो में हमें न्याय जरूर मिलेगा। वह कहते हैं ‘ये कहना बहुत हद तक ठीक नहीं है कि सभी गवाहो के मुकरने से मामला कमजोर हो गया। कई गवाहों ने इस मामले में गवाही दी भी है। यही वजह है कि मामला अभी भी जिंदा है। अगर 26 गवाह मुकर गये तो 25 ने सही गवाही भी दी है। इस गवाही में पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारी जैसे गवाह भी शामिल हैं।’

तीन जुलाई 2019 को सीबीआई न्यायालय ने मामले पर अपना फैसला सुनाया। न्यायालय ने 14 साल पुराने इस हत्याकांड में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। बरी होने वाले आरोपियों में पूर्वांचल के बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी और उसके भाई अफजाल अंसारी समेत ऐसे नाम शामिल थे, जिनका लंबा आपराधिक रिकार्ड रहा है। सबसे खास बात यह है कि इन सभी को सबूतों के अभाव में बरी किया गया है।

गाजीपुर क्षेत्र से भाजपा के पूर्व सांसद मनोज सिन्हा को अदालत से आशा है। उनका मानना है कि अदालत से कृष्णानंद राय हत्याकांड के दोषियों को सजा जरूर मिलेगी। वह मानते हैं कि न्यायालय पीड़ितों के साथ पूरा इंसाफ करेगा। साथी ही उन्होंने कृष्णानंद राय की हत्या एकलौती हत्या नहीं थी। उनकी हत्या के बाद भी समर्थकों की हत्याएं होती रही। सिन्हा कहते हैं ‘कृष्णानंद राय हत्याकांड के बाद भी हत्या का सिलसिला बंद नहीं हुआ। उसके बाद हत्याओं की बाढ़ आ गई। कृष्णानंद राय और भाजपा के उन 20 से 22 कार्यकतार्ओं की हत्याएं हुईं। ये वो लोग थे जिन्होने मुख्तार के साथ आने से मना कर दिया । इसमें से कई हमलावर पकड़े भी गये।’ एक आरोप है कि कृष्णानंद राय की हत्या के दो वर्ष पहले से आरोपी मुख्तार अंसारी ने इस दिशा में साजिश शुरू कर दी थी। 26 जनवरी 2004 को डीएसपी एसटीएफ शैलेंद्र कुमार सिंह ने राय की हत्या के उद्देश्य से लाई गयी एलएमजी पकड़ी थी। मुख्तार ने 36-राष्ट्रीय राइफल के जवान बाबू लाल यादव से 7.62 बोर लाइट मशीन गन मंगायी थी, जो मुख्तार का लम्बे समय तक गनर रहा है। ये राइफल उसके मामा मुन्नर यादव के घर वाराणसी से पकड़ी गयी थी।

बाबू लाल यादव, मुन्नर यादव व मुख्तार पर पोटा (आतंकवाद की रोकथाम अधिनियम) लगाया गया था। उस समय को याद करते हुए शैलेंद्र कुमार सिंह कहते हैं, ‘वो दूसरा दौर था।। तब और अब के शासन में बड़ा बदलाव आया है। पुलिस के ऊपर कई तरह के राजनीतिक दबाव हुआ करते थे। लेकिन अभी के हालात में बड़ा फर्क आया है। सूबे में अब योगी आदित्यनाथ की सरकार है। अगर सबकुछ ठीक रहा तो जितने सबूत पुलिस और सीबीआई के पास हैं, इन सबूतों के आधार पर ही आरोपियों को सजा भुगतनी पड़ेगी। मुझे लगता है पीड़ित परिवार को अवश्य न्याय मिलेगा।’ कृष्णानंद राय हत्याकांड मामले में न्यायालय का 484 पन्ने का निर्णय आया। इस मुकदमे की तμतीश में सीबीआई को लगभग दो साल का समय लगा। जिसमें 53 लोगों की गवाही गुजरी। जिसे अभियोजन पक्ष महत्वपूर्ण मानता है। जबकि कानून कहता है कि एक भी चश्मदीद गवाह अगर वो ईमानदार है तो उसकी गवाही महत्वपूर्ण होगी।

कृष्णानंद राय हत्याकांड पर सीएम योगी का गंभीर रुख

‘कृष्णानंद राय हत्याकांड मामले में हाई कोर्ट में अपील करेगी। प्रदेश सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सरकार फैसले को पढ़ेगी और हाई कोर्ट में अपील करेगी। प्रदेश सरकार ने दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले का संज्ञान लिया है।’

लेकिन कानून की नजर में गवाही के साथ सबूतों का भी महत्व होता है। जिस दिन कृष्णानंद राय की हत्या हुई। उस दिन वह एक क्रिकेट मैच के उद्घाटन समारोह से वापस आ रहे थे। उनके साथ दो गाड़ियां चल रही थीं। एक में खुद विधायक मौजूद थे। दूसरी ठीक उनके पीछे चल रही थी जिसमें उनके साथ के लोग मौजूद थे। इसी बीच एक सूमो गाड़ी आती है और उनपर हमला हो जाता है। चूंकि विधायक कृष्णानंद राय आगे की गाड़ी में बैठे थे इसी लिए उसी गाड़ी को निशाना बनाया गया। जिस वजह से आगे की गाड़ी में हमले के बाद कोई भी जिंदा नहीं बचा। यहां एक बात महत्वपूर्ण है। इस हमले में जिन लोगों को मुख्य अभियुक्त बनाया गया था उनमें रामू मल्लाह भी एक शख्श था। रामू मल्लाह पर लूट और अपहरण समेत कई जघन्य वारदातों में शामिल होने का मामला दर्ज है। विधायक पर हमले में जिस टाटा सूमो गाड़ी का इस्तेमाल हुआ वो भी जबरन लूटी गई थी। जिसमें रामू नामजद भी रहा है। अंजनी राय, रामकीरत सिंह और मनोज राय अपने बयान से पलट गये। जो कि घटना के समय पीछे की गाड़ी में मौजूद थे।

हमला होते ही सभी झाड़ियों के पीछे भागकर छिप गये। उन्होंने अपने दिये बयान में कहा कि रामनारायण राय और बृजेश राय घटना के वक्त गाड़ी में थे ही नहीं। गौरतलब है कि रामनारायण राय और बृजेश राय दोनो कृष्णानंद राय के भाई हैं। इन्होने अपने बयान में कहा कि हमले में एके 47 और एसएलआर जैसी अत्याधुनिक तकनीक की बंदूको का प्रयोग किया गया। चश्मदीदों की ये बातें सीबीआई की जांच रिपोर्ट में भी साफ हो गई। जांच में घटनास्थल से मिले कारतूस के खोखो से ये साबित हुआ कि इस घटना में एके सैंतालीस और एसएलआर का ही उपयोग किया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार के सेवानिवृत्त डीजीपी बृजलाल घटना को याद करते हुए कहते हैं, ‘अंसारी पर पोटा लगते ही मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के खास एडीजी लॉ एंड आॅर्डर बुआ सिंह डीएसपी एसटीएफ शैलेंद्र कुमार सिंह पर बरस पड़े। पोटा हटाने का दबाव बनाया जो संभव ही नहीं था। क्योंकि एफआईआर लिखी जा चुकी थी। जो बदली नहीं जा सकती थी । मुख्तार का पूरा षड्यंत्र रिकॉर्ड हो चुका था। पूरी रिकॉर्डिंग गृह विभाग की अनुमति से की गयी थी। वह एलएमजी इसलिए चाहता था कि 500 मीटर की रेंज से 550 गोली प्रति मिनट की दर से फायर करके राय को मारा जा सके।

मुन्नर यादव व बाबू लाल यादव को अदालत से सजा हो गयी। डीएसपी शैलेंद्र सरकार से प्रताड़ित होकर 11 फरवरी, 2004 को इस्तीफा दे दिए। पोटा में मुकदमा चलाने के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है, जो मुलायम सिंह की सरकार ने नहीं दी और माफिया मुख्तार अंसारी को बचा लिया। मुख्तार साजिश रचता रहा, गाजीपुर जेल में उसका दरबार लगता था और मंत्री-अधिकारी खुलेआम मिलते थे, पुलिस के एसपी भी। हत्या के पहले मुख्तार गाजीपुर से फर्रुखाबाद जेल में तबादला करवा लिया और 29 नवंबर 2004 को कृष्णानन्द राय मार दिए गये।’ अगर पोटा में अंसारी बंद हो गया होता और बाद में हत्या के लिए जुटे बदमाशों को पकड़ लिया गया होता तो कृष्णानन्द शायद आज भी जीवित होते। यह है राजनीतिकआ पराधिक गठजोड़ का घिनौना सच। 2004-2007 की मुलायम सिंह यादव की समाजवादी सरकार का। अगर तात्कालिक सरकार ने उसी स्तर पर काम किया होता तो आज शायद न्यायालय को ऐसी टिप्पणी भी न करनी पड़ती।



 
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