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जीरो बजट आंदोलन के प्रणेता ए.के.राय

01/08/2019

जीरो बजट आंदोलन के प्रणेता ए.के.राय

 रामबहादुर राय

जीरो बजट के प्रणेता व आम जन के नेता ए. के. राय अब लोगों की यादों में जिंदा रहेंगे। सादगी व ईमानदारी के साक्षात उदाहरण ए. के. राय जैसा व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में मिलना दुर्लभ है।

संसदीय राजनीति में ईमानदारी के चलते-फिरते साक्षात उदाहरण थे, अरुण कुमार राय (ए.के. राय) । वे कुछ सालों से बीमार चल रहे थे। अक्सर अस्पताल में आते-जाते थे। एक दिन मित्र गोपाल कृष्ण से मालूम हुआ कि ए.के. राय के अंग काम नहीं कर रहे हैं। इसके कुछ दिनों बाद उनका निधन हो गया। वे अब लोगों की यादों में जिंदा रहेंगे। सबसे पहले 1974 में उनसे मेरी भेंट हुई, जब 9 अप्रैल को मीसाबंदी के रूप में मुझे बांकीपुर जेल भेजा गया। वहां पांच कमरों वाले सेल में से पहले वाले कमरे में मुझे रखा गया।
इसी सेल के आखिरी कमरे में पहले से ए.के. राय थे। इसके अलावा बाकी के कमरों में विनोद बिहारी महतो, आनंदमूर्ति और मुजμफरपुर के तत्कालीन कमिश्नर रहे नीलमणि थे, जो अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में बंद थे। जेल के दिनों में मैंने यह पाया कि ए.के. राय सादगी की प्रतिमूर्ति थे। जेल में राजनीतिक बंदी के रूप में हम लोगों को कुछ सुविधाएं प्राप्त थीं। मीसाबंदी के रूप में मुझे अलग सुविधाएं थीं। विधायक होने के नाते उन्हें अलग सुविधाएं मिलती थी। उसके मुताबिक उन्हें छह महीने में चार जोड़ी कुर्ता-धोती मिलता था। जाड़े के दिनों में इन्हें सदरी, कोट आदि मिलता था। उनमें से एक धोती को वे वहीं फाड़कर दो लुंगी बना लेते थे।
ए.के. राय ने यादवपुर विश्वविद्यालय से 1969 में इंजीनियरिंग पास की थी। वहीं वे नक्सल आंदोलन के प्रभाव में माओवादियों के संपर्क में आए और धनबाद को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। धनबाद के कोयला क्षेत्र में उन्होंने मजदूरों के हित में काम करना शुरू किया। ए.के. राय और विनोद बिहारी महतो ने मिलकर छोटानागपुर इलाके में आदिवासी आंदोलन शुरू किया था। सीपीआई और सीपीएम से अलग होकर इन दोनों ने मिलकर मार्क्सिस्ट कोआॅर्डिनेशन कमेटी बनाई थी। वे एक अच्छे संगठक और विचारक थे। वे मार्क्सिस्ट कोआॅर्डिनेशन कमिटि के मास्टर माइंड भी थे। उन्होंने ही विनोद बिहारी महतो जैसे लोगों को आदिवासी आंदोलन से जोड़ा और गाइड किया। आंदोलन करने की बहुत ही अनोखी पद्धति उन्होंने निकाली थी। वे मार्क्सवादियों की तरह कोई पर्चा वगैरह नहीं प्रकाशित करते थे। उन्होंने अपनी मीटिंग के लिए एक अलग तरीका विकसित किया था।
वे आम या किसी पेड़ की टहनी काट लेते थे और एक आदिवासी उसे गांव-गांव घुमाता था। उस टहनी से पता चलता था कि आज मीटिंग कहां होगी। इस तरह वे बिना किसी खर्च के अपनी मीटिंग करते थे। अगर कोई आंदोलन का इतिहास लिखेगा तो जीरो बजट आंदोलन के प्रणेता रहे ए.के. राय का जिक्र अवश्य करेगा। उनके प्रयासों से कई बार आदिवासी आंदोलन बहुत तेज हुए। कई बार तत्कालीन सरकारों ने आपराधिक धाराओं में उन्हें जेल में बंद भी किया था। खास बात यह कि वे अपना मुकदमा भी खुद लड़ते थे।
वे आज के सांसदों और विधायकों के लिए प्रेरणा के स्रोत हो सकते हैं। पूरे हिन्दुस्तान में ए.के. राय अकेले व्यक्ति होंगे जिन्होंने कभी कोई झूठा भत्ता क्लेम नहीं किया। अगर वे धनबाद से पटना विधानसभा के लिए आ रहे हैं तो जो उनका वास्तविक खर्च होता था वे वही क्लेम करते थे। उनके जमाने और आज के जमाने के विधायक और सांसद किस तरह का झूठा भत्ता क्लेम करते हैं आप कल्पना नहीं कर सकते। रेल से आएंगे और टैक्सी का भत्ता क्लेम करेंगे। ट्रेन से आते हैं तो जहाज का क्लेम करेंगे। इस तरह का घपला विधायक और सांसद करते रहे हैं। जेल से छूटने के बाद मैंने इस बाबत कई लोगों से पूछताछ की। सबने कहा कि ए.के. राय कोई झूठा क्लेम नहीं करते। उनके साथियों और सचिवालय ने भी इसकी पुष्टि की। इतना ही नहीं विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मिलकर कई कमेटियों में सदस्य हो जाते हैं। उसका भत्ता अलग से लेते हैं।
ए.के. राय किसी अतिरिक्त आय के लिए इस तरह के किसी धंधे में नहीं पड़े। जिस कमेटी में विधानसभा अध्यक्ष ने रख दिया उसी में रहे। इसके लिए वे किसी तरह की लॉबिंग भी नहीं करते थे। ए. के. राय जिस विचारधारा के साथ राजनीति में आए थे, उस विचारधारा के साथ हमेशा रहे। वे अपनी विचारधारा के प्रति पूरी ईमानदारी और निष्ठा रखते थे। वे खुले हुए थे, लेकिन कठमुल्ले मार्क्सिस्ट नहीं थे। इसकी मिसाल यह है कि जब जेपी आंदोलन बढ़ा तब ए.के. राय उस आंदोलन में शामिल हुए। लेकिन सीपीआई और सीपीएम उस आंदोलन में शामिल नहीं हुई। नक्सली उस आंदोलन में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने उस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसकी वजह से इमरजेंसी के दौरान वे जेल भी गए। इमरजेंसी हटने के बाद जेपी ने चंद्रशेखर जी से कहकर बिहार के 54 लोकसभा सीटों में से एक सीट धनबाद की ए.के. राय को देने को कहा। हालांकि उन दिनों धनबाद की सीट पर बहुत मारामारी थी। लेकिन जेपी के कहने के बाद जनता पार्टी ने ए.के. राय के लिए वह सीट छोड़ दी।


ए.के. राय जैसा कोई सांसद नहीं 
है। वे निहायत ही सिद्धांतवादी और ईमानदार हैं। साथ ही लोकसभा के प्रति पूरा कमिटमेंट रखते हैं।
– स्व. अटल विहारी बाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री

अपनी ईमानदारी, व्यक्तिगत धाक व मजदूर नेता के तौर पर 1977 से लेकर 1989 तक लगातार तीन बार वे धनबाद सीट से सांसद रहे। 1989 में वे भाजपा की रीता वर्मा से चुनाव हार गए। अयोध्या आंदोलन ने ए.के. राय को परास्त कर दिया। जब वे लोकसभा में थे तो मैंने वाजपेयी जी से पूछा कि ए.के. राय के बारे में आपका क्या ख्याल है? आमतौर पर वाजपेयी जी लोगों के बारे में खुलकर बातें नहीं करते थे, लेकिन ए.के. राय की उन्होंने खुलकर तारीफ की। वाजपेयी जी ने कहा कि ए.के. राय जैसा कोई सांसद नहीं है। वे निहायत ही सिद्धांतवादी और ईमानदार हैं। साथ ही लोकसभा के प्रति पूरा कमिटमेंट रखते हैं। उनकी यह खासियत रही कि वे जो विधानसभा में किया करते थे, वही उन्होंने लोकसभा में भी किया। इसलिए अकेले सांसद होते हुए भी सत्ताधारी दल और विपक्ष पर उनकी नैतिक शक्ति भारी पड़ती थी। सांसदों के खरीद-फरोख्त की खबरें खूब आती हैं लेकिन ए.के. राय ऐसे सांसद थे जिन्हें लोकसभा में कोई भी नहीं खरीद सकता था। दिल्ली में वे विट्ठल भाई पटेल हाउस में रहते थे।

ए. के. राय जिस विचारधारा के साथ राजनीति में आए थे, उस विचारधारा के साथ हमेशा रहे। वे अपनी विचारधारा के प्रति पूरी ईमानदारी और निष्ठा रखते थे। वे खुले हुए थे, लेकिन कठमुल्ले मार्क्सिस्ट नहीं थे। इसकी मिसाल यह है कि जब जेपी आंदोलन बढ़ा तब ए.के. राय उस आंदोलन में शामिल हुए। लेकिन सीपीआई और सीपीएम उस आंदोलन में शामिल नहीं हुई।

मैं जब दिल्ली आता था तो उनसे मिलने जाया करता था। वे बंगाली थे और अविवाहित थे। लेकिन खाना खाने की उनकी अलग आदत थी। आप उन्हें खाने के लिए जो भी चावल-दाल-सब्जी अलगअलग देते, लेकिन उसे वे एक जगह मिलाकर खिचड़ी बना देते थे। उसके बाद ही वे खाते थे। जिसने भी उन्हें खाते देखा होगा उसे यह याद होगा। उन्होंने सांसद रहते हुए संसद में काम करने का एक नियम बना रखा था। वह नियम यह था कि वे किसी व्यक्ति का निजी काम नहीं करते थे। इसलिए उनके पास कोई अपना निजी काम लेकर नहीं आता था। लेकिन क्षेत्र की समस्या, जिसका संबंध सामूहिक हित से है तो उसके लिए वे सदैव सक्रिय और तत्पर रहते थे। अंत में इतना कहना आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन में उनके जैसा व्यक्ति मिलना दुर्लभ है।


 
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