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ट्रंप जान लें, भारत को पंच नहीं चाहिए

30/07/2019

ट्रंप जान लें, भारत को पंच नहीं चाहिए

अवधेश कुमार

कश्मीर पर मध्यस्थता का राग छेड़कर ट्रंप ने भारत से ज्यादा अपनी खुद की किरकिरी करा ली। हालांकि अमेरिका में जिस तरह इमरान को अपमानित किया गया इस बयान ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की लाज बचा ली।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप के मुंहफट चरित्र और गैर जिम्मेवार बयानों से अब पूरी दुनिया वाकिफ है। उनका अपना देश और वहां की मीडिया तो इसकी अभ्यस्त हो चुकी है। बावजूद दुनिया की महाशक्ति का नेता होने के कारण उनके बयान को महत्व मिलता है और उसका असर भी होता है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ बैठक में उन्होंने जो कुछ कहा उससे पूरे भारत में कुछ समय के लिए खलबली मच गई। संसद का सत्र है इसलिए वहां इसकी प्रतिगूंज स्वाभाविक थी। भारत की घोषित नीति है- जम्मू कश्मीर में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं हो सकती। यही नहीं पाकिस्तान के साथ सारे विवाद को हम द्विपक्षीय मामला मानते हैं जिसमें तीसरे पक्ष की कोई आवश्यकता नहीं। इसके विपरीत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से ट्रंप ने कहा कि दो महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता करने का आग्रह किया था।

यह असाधारण बयान है। यह भारत की घोषित नीति के विपरीत है। जम्मू कश्मीर हमारे लिए अखंड भारत का भूभाग है। इसमें विवाद है तो इतना कि पाकिस्तान ने इसका कुछ हिस्सा जबरन हथियाया हुआ है जिसे वापस लेना है। भारत में विपक्षी दलों ने एक स्वर से जिस तरह हंगामा किया उसमें गुस्सा और राजनीति दोनों है। गुस्सा वाजिब है लेकिन राजनीति नावाजिब। यह एक ऐसा मामला है जिस पर पूरे देश को एक स्वर में बोलना चाहिए किंतु भारत के विपक्ष ने अपने ही प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करने की गैर जिम्मेवार रणनीति अपना ली। इससे पाकिस्तान में गलत संदेश गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद के दोनों सदन में एक संक्षिप्त बयान दिया। उन्होंने कहा कि मैं सदन को स्पष्ट तौर पर विश्वास दिलाना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से कश्मीर पर मध्यस्थता की कोई अपील नहीं की गई। हम अपने पूर्व के स्टैंड पर कायम हैं।
कश्मीर का मुद्दा द्विपक्षीय मुद्दा है और इससे जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान भारत-पाकिस्तान मिलकर ही करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीमापार से होनेवाले आतंकवाद को खत्म किए बिना पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता संभव नहीं है। विदेश मंत्री का बयान बिल्कुल साफ है। वैसे ट्रंप का बयान आने के कुछ ही समय बाद देर रात विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कमार ने भी ट्वीट कर ट्रंप के बयानों का दो टूक शब्दों में खंडन किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से ऐसा कोई आग्रह अमेरिकी राष्ट्रपति से नहीं किया गया। बहरहाल, एक बार पूरे घटनाक्रम और डोनाल्ड ट्रंप के वक्तव्य को देखना जरूरी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए वाइट हाउस में आयोजित लंच समारोह के दौरान पत्रकारों से बातचीत के बीच इमरान के एक अनुरोध पर ट्रंप ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो हμते पहले मिला था और हमने इस मुद्दे (कश्मीर) पर बात की थी। उन्होंने ( मोदी) वाकई मुझसे कहा था कि क्या आप मध्यस्थता करेंगे? मैंने पूछा कहां? उन्होंने कहा कश्मीर के लिए क्योंकि यह समस्या सालों से लगातार चली आ रही है। मैं वाकई आश्चर्यचकित हूं कि यह कितना लंबा खिंच गया।
ट्रंप ने कश्मीर समाधान की जरूरत पर बल देते हुए यह भी कहा कि इस मसले को जल्द से जल्द सुलझा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसे सुलझाया जाना चाहिए क्योंकि यह बहुत लंबे समय से समस्या है और वह (पीएम मोदी) इसे इसी रूप में देख रहे हैं। हो सकता है कि मैं उनसे वार्ता करूं और हम देखें कि इस पर क्या हो सकता है। कश्मीर दुनिया के सबसे खूबसूरत इलाकों में से एक है, लेकिन हिंसा से जूझ रहा है। ट्रंप ने इमरान से कहा कि मुझे लगता है कि वे (भारतीय) इसे हल होते हुए देखना चाहेंगे। मुझे लगता है कि आप भी इसका हल होते हुए देखना च् ा ा ह े ं ग् ा े । अमेरिकी राष्ट्रपति ने इमरान से कहा कि भारत के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं। पूरा दृश्य ध्यान से देखने से साफ पता चल रहा था कि पाकिस्तानी पत्रकार पूर्व नियोजित प्रश्न पूछ रहे थे जिसकी पूरी जानकारी इमरान को थी। तीसरा प्रश्न कश्मीर से संबंधित था। पत्रकार ने कश्मीर वाला अपना प्रश्न पूरा किया भी नहीं था कि इमरान बीच में बोलने लगे। इमरान खान ने कहा कि मैं राष्ट्रपति ट्रंप से कहना चाहता हूं कि अमेरिका कश्मीर मुद्दे का समाधान दे सकता है। जब ट्रंप ने मध्यस्थता करने की बात की तो इमरान खान ने कहा कि यदि आप मध्यस्थता कर सकते हैं तो एक अरब से अधिक लोगों की प्रार्थना आपके साथ है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की यह रणनीति उनके अपने देश के हिसाब से सही हो सकती है। ट्रंप के बयान पर कुछ समय के लिए वे खुश हो जाएं। पाकिस्तान की मीडिया में इमरान को वाहवाही भी मिली। पाकिस्तान तो लंबे समय से ऐसा चाह रहा था। वैसे भी अमेरिकी यात्रा में इमरान खान की ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह अनदेखी की उससे पाकिस्तान में ही उनकी तीखी आलोचना हो रही थी। पाकिस्तानी अपने प्रधानमंत्री का अपमान मान रहे थे। अमेरिका ने इमरान खान के साथ पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) प्रमुख लेμिटनेंट जनरल फैज हमीद को भी साथ आने के लिए कहा था। अमेरिका मानता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कोई अथॉरिटी तभी है जब सेना और आईएसआई उनके साथ है।
इसलिए अमेरिका ने तीनों के साथ बातचीत की। अपनी अपमानजनक यात्रा में ट्रंप का यह वक्तव्य उनके काम आ गया। हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद पर चर्चा करते हुए ट्रंप से कहा हो कि आप पाकिस्तान पर दबाव डालिए ताकि वह हमारे कश्मीर में आतंकवाद फैलाना बंद करे। इसका उन्होंने अर्थ अपने अनुसार यह लगाया हो कि हमें मध्यस्थता के लिए कह रहे हैं। या फिर उनकी कुछ और रणनीति हो। ट्रंप अफगानिस्तान से भागना चाहते हैं। उनको रास्ता नहीं मिल रहा है। वे यहां तक तैयार हैं कि अफगानिस्तान का शासन भले तालिबान के हाथों चला जाए लेकिन अमेरिका ज्यादा दिन वहां नहीं रह सकता। इसमें उनको लगता है कि बगैर पाकिस्तान के सहयोग के यह नहीं हो सकता इसलिए पाकिस्तानियों को खुश करने के लिए उन्होंने बयान दे दिया है। जो भी हो ट्रंप की यह मूर्खता मानी जाएगी। वैसे उनके बयानों से अमेरिकी विदेश मंत्रालय को बार-बार परेशानी होती है। विश्व समस्याओं को लेकर ट्रंप की अनभिज्ञता अनेक बार सामने आ चुकी है।
साफ है कि जम्मू कश्मीर समस्या, उसके अतीत, वर्तमान और स्वयं अमेरिकी नीति के बारे में उनको जानकारी नहीं है। अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति का इस तरह का गैर जिम्मेवार बयान शर्मनाक है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्टीकरण दे दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है। अमेरिका दोनों ही देशों के साथ बैठकर इस मुद्दे के समाधान के लिए वार्ता की कोशिशों का स्वागत करेगा। उनकी पंक्तियां देखिए-‘हम दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और बातचीत का माहौल बनाने की कोशिशों का समर्थन करते हैं। इसके लिए सबसे जरूरी बात है आतंकवाद का खात्मा और जैसा की राष्ट्रपति ने कहा- हम इसमें मदद के लिए तैयार हैं।’ यानी साफ है कि पाक अपने क्षेत्र में आतंक को संरक्षण देना बंद करे। पाकिस्तान की तरफ से अपने भूभाग में होनेवाली आतंकवादी गतिविधियों पर सख्त और प्रभावी कार्रवाई के बिना सार्थक वार्ता नहीं हो सकती। अमेरिकी प्रशासन के इन दोनों बयानों के बाद भारत की ओर से नाराजगी भरे वक्तव्य या किसी तरह के निंदा प्रस्ताव की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका के साथ वर्तमान एवं भविष्य के रणनीतिक संबंधों का ध्यान रखते हुए एक सीमा से आगे जाकर निंदा करना अपरिपक्वता का परिचायक हो जाएगा।


 
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