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उन्नाव मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्वागतयोग्य कदम

02/08/2019

 सियाराम पांडेय 'शांत'

र्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को उन्नाव के माखी बलात्कार मामले से जुड़े सभी पांच मामलों को उत्तर प्रदेश से दिल्ली स्थानांतरित करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने तीसहजारी अदालत के जिला न्यायाधीश धर्मेश शर्मा को उन्नाव रेप कांड और सड़क हादसे से जुड़े सभी पांचों मामलों की नियमित सुनवाई की जिम्मेदारी दी है। उन्हें 45 दिन में सुनवाई पूरी करनी है। अभी तक ये मामले सीबीआई की लखनऊ स्थित विशेष अदालत के पास थे। अदालत ने पीड़ित महिला को 25 लाख रुपये तत्काल मुआवजा देने और सीबीआई को रविवार को हुई दुर्घटना की जांच सात दिनों में पूरी करने का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ने पर सीबीआई जांच की अवधि सात दिन और बढ़ाई जा सकती है। अदालत के आदेश के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने पीड़ित युवती की मां को 25 लाख रुपये का चेक सौंप दिया है।
विपक्ष इस मामले में सरकार पर उन्नाव के माखी दुष्कर्म कांड के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बचाने का आरोप लगाता रहा है। उधर, मीडिया के दबाव में फजीहत होता देख भारतीय जनता पार्टी ने कल गुरुवार को ही कुलदीप सिंह सेंगर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। जाहिर है, ऐसा कदम उठाकर भाजपा ने अपनी गलती सुधार ली है। यूथ कांग्रेस से बसपा के हाथी और सपा की साइकिल की सवारी करते हुए कुलदीप सेंगर ने भाजपा का कमल अपने हाथ में लिया था। मतलब वे भाजपा और संघ के संस्कारों में दीक्षित नहीं थे। रायबरेली में दुष्कर्म पीड़ित युवती और उसके वकील के सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने और उसकी मौसी और चाची की मौत होने के बाद से ही विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक हमलावर है। स्वयंसेवी संगठनों और जनता के लगभग हर खेमे में भी आक्रोश का भाव है। सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती से नहीं लगता कि कुलदीप सिंह सेंगर का कोई बचाव हो पाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि यदि आरोपी चाहें तो वह उन्हें भी सुनने को तैयार है। इससे इस मामले से रहस्य के घटाटोप छंटेंगे। वैसे सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह सीबीआई के जिम्मेदार अधिकारी को तलब किया और यहां तक कहा कि अगर दुष्कर्म और सड़क हादसा कांड की रिपोर्ट सार्वजनिक तौर पर देने में कोई परेशानी हो तो कोर्ट इस मामले की सुनवाई बंद कमरे में भी कर सकता है। दिल्ली के जज को सुनवाई का दायित्व सौंपने का निर्णय तो बंद कमरे में ही हुआ। मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार से भी नाराज हैं कि पीड़िता की मां द्वारा भेजी गई चिट्ठी उन्हें दिखाई क्यों नहीं गई। मतलब साफ है कि व्यवस्था में लापरवाही के अनेक छिद्र हैं जिन्हें तत्काल भरे जाने की आवश्यकता है।
   भाजपा ने विधायक कुलदीप सेंगर की बर्खास्तगी की जो कार्रवाई फजीहत के बाद किया,उसे पहले भी कर सकती थी। सर्वोच्च न्यायालय भी इस मामले का स्वत: संज्ञान ले सकता था लेकिन 'जब जागे तभी सबेरा।' गलतियां जिस क्षण सुधार ली जाए, वही क्षण कीमती होता है। उन्नाव रेप पीड़िता के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर कुलदीप सिंह सेंगर से जान के खतरे की आशंका जताई थी। सर्वोच्च अदालत ने आश्वस्त किया है कि वह 'इस विध्वंसक माहौल में कुछ रचनात्मक करेगा। उसने जिस तरह मामले को गंभीरता से लिया है, उसके संदेश तो यही हैं कि वह सकारात्मक करने की दिशा में अपने पैर आगे बढ़ा चुका है। योगी सरकार ने रायबरेली सड़क हादसे की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं। 11 अप्रैल 2018 को भी उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पुलिस को यह केस सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था। इस आधार पर उस पर सेंगर को बचाने का आरोप उचित नहीं है लेकिन मामले में विलंब सवाल तो पैदा करता ही है। देखा जाए तो 4 जून 2017 से ही यह मामला पुलिस प्रशासन और सीबीआई के लिए बेहद पेचीदा रहा है। अगर अभी तक इस मामले में रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है तो इससे सरकार की नीति और नीयत पर अंगुली का उठना लाजिमी है। सड़क हादसे की जांच भी सीबीआई के हवाले कर दी गई है लेकिन कब? जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा। जब पीड़ित युवती का परिवार तबाह हो गया। पीड़ित परिवार की शिकायतों पर अगर ध्यान दिया गया होता तो शायद इस तरह के हालात न बनते। कुलदीप सेंगर बलात्कार के दोषी हैं या नहीं, यह जांच का विषय है लेकिन पीड़िता के पिता की विधायक के भाई द्वारा पीटे जाने से मौत और गवाह की हत्या संदेह का दायरा तो बढ़ाती ही है। अगर पीड़िता ने मुख्यमंत्री के आवास पर आत्मदाह का प्रयास न किया होता तो प्राथमिकी ही दर्ज नहीं होती,कार्रवाई तो बहुत दूर की बात है। ऐसे  में अगर विपक्ष सरकार को घेर रहा है तो इसे गलत कैसे ठहराया जा सकता है? 
  सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील वी गिरि ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, दीपक गुप्ता व अनिरुद्ध बोस की पीठ के समक्ष उन्नाव कांड का जिक्र करते हुए सुनवाई का आग्रह कर रखा है। उनका तर्क है कि उत्तर प्रदेश में बाल यौन उत्पीड़न रोक कानून (पॉक्सो) के प्रावधान ठीक से लागू नहीं हो रहे हैं। कोर्ट ने गिरि को बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले में न्यायमित्र बनाया है। ऐसे में उनका नैतिक दायित्व भी है कि वे इस मामले को कोर्ट के संज्ञान  में लाएं। सर्वोच्च न्यायालय ने अगर उन्नाव दुष्कर्म से जुड़े मामले दिल्ली स्थानांतरित करने के संकेत दिए हैं तो इसके मूल में पीड़िता की मां की स्थानांतरण याचिका भी है जो पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कोर्ट ने गत 16 अप्रैल को याचिका पर सीबीआई, कुलदीप सिंह सेंगर सहित 15 प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया था। कोर्ट को भेजे गए पीड़ित परिवार के पत्र में दो दिन लगातार 7 और 8 जुलाई को अभियुक्तों की ओर से उनके घर आकर धमकी दिये जाने और समझौते के लिए दबाव डालने की बात कही गई है। दोनों दिन का घटनाक्रम बताते हुए कहा गया है कि अभियुक्तों की ओर से धमकी दी गई कि सुलह कर लो, नहीं तो पूरे परिवार को फर्जी मुकदमे लगा कर जेल में सड़ा कर मार डालेंगे। 
 पीड़िता का परिवार ही भयभीत रहा हो, ऐसा नहीं था। पीड़िता के वकील महेंद्र सिंह चौहान ने भी खतरे का अंदेशा जताया था। सड़क हादसे से पहले वकील महेंद्र सिंह ने उन्नाव के जिला अधिकारी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने सुरक्षा के लिए हथियार का लाइसेंस मांगा था। उन्होंने आशंका जताई थी कि भविष्य में उनकी हत्या हो सकती है। गत दिनों रायबरेली में हुआ सड़क हादसा षड्यंत्र था या स्वाभाविक एक्सीडेंट, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन जिस तरह नंबर प्लेट पर ग्रीस पोतकर नंबर मिटाया गया था, उससे तो संदेह होता ही है। रायबरेली सड़क हादसे के बाद सीबीआई ने विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, उनके भाई मनोज सिंह सेंगर और नौ अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है, जिसमें उत्तर प्रदेश के एक अन्य मंत्री का रिश्तेदार भी शामिल है। एफआईआर में आरोपी विनोद मिश्रा, हरि पाल सिंह, नवीन सिंह, कोमल सिंह, अरुण सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, रिंकू सिंह और वकील अवधेश सिंह के नाम शामिल हैं। ये सभी उन्नाव के रहने वाले हैं। आरोपी अरुण सिंह उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री रणवेंद्र प्रताप सिंह का दामाद है। 
 सवाल यह है कि अगर पहले ही पुलिस प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया होता तो हालात इतने खराब नहीं होते। दुष्कर्म के आरोपी विधायक के खिलाफ भाजपा जो कार्रवाई आज कर रही है, अगर ऐसा उसने पहले किया होता तो भाजपा की 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' योजना पर कटाक्ष न होता। अब भी समय है जब सरकार को इस मामले की जांच पूरी निष्पक्षता से कराना और दोषी जनों का दंडित करना चाहिए, यही वक्त का तकाजा भी है। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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