युगवार्ता

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कब खुलेंगे शिवसेना के द्वार

30/09/2019

कब खुलेंगे शिवसेना के द्वार

सुधीर जोशी

प्रदेश के प्रमुख कद्दावर नेता और शिवसेना का कभी हिस्सा रहे नारायण राणे, छगन भुजबल तथा संजय निरूपम अपनी अपनी पार्टियों की डांवाडोल स्थिति के कारण शिवसेना के बुलावे का इंतजार करते हुए नजर आ रहे हैं, पर शिवसेना की भी अपनी मजबूरी है।

राज्य के मुख्य राजनीतिक दलों में शुमार शिवसेना वर्तमान में भाजपा के बाद दूसरा मुख्य पसंदीदा राजनीतिक दल बन गया है। दूसरे दलों के जो नेता भाजपा में शामिल नहीं हो सके, वे शिवसेना का रुख कर रहे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक कुनबे की जगह शिवसेना का दामन थामकर खुद को सुरक्षित कर लिया है। कांग्रेस तथा राकांपा इन दोनों राजनीतिक दलों का भविष्य गर्त में है, इसलिए इन पार्टियों को जो नेता असंतुष्ट हैं, वे भाजपा या शिवसेना में जाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। लेकिन शिवसेना में आने वाले नेताओं में से भास्कर जाधव को छोड़कर अन्य नेताओं को अभी-भी शिवसेना में वापसी का निमंत्रण नहीं दिया गया है।
ऐसे नेता हैं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा वर्तमान में अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना चुके नारायण राणे, पूर्व उपमुख्यमंत्री तथा वरिष्ठ राकांपा नेता छगन भुजबल तथा पूर्व मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम। ये तीनों नेता किसी वक्त शिवसेना के कद्दावर नेताओं में शुमार थे। लेकिन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से हुए वैचारिक मतभेद के कारण शिवसेना छोड़कर दूसरे राजनीतिक दल में गए और बड़े पदों पर काम किया। सबसे पहले शिवसेना छोड़कर राकांपा में गए छगन भुजबल की तेजतर्रार छवि को देखकर शरद पवार ने हमेशा छगन भुजबल को अच्छे पद पर आसीन किया। हालांकि मनसे प्रमुख राज ठाकरे का नाम भी शिवसेना छोड़ने वाले नेताओं में शुमार है, लेकिन फिलहाल राज ठाकरे के शिवसेना में जाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
विजय सिंह मोहिते पाटिल, छगन भुजबल, आर. आर. पाटिल, अजित पवार जैसे राकांपा नेताओं को उप मुख्यमंत्री की कुर्सी जरूर मिली, लेकिन दो दशक से ज्यादा समय से राज्य की राजनीति में सक्रिय राकांपा को अभी तक मुख्यमंत्री का पद प्राप्त नहीं हो सका है। राज्य में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली भाजपा के मुख्यमंत्रित्व काल की पहली सरकार का कार्यकाल शुरू होते ही छगन भुजबल के बुरे दिन शुरू हुए। आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में उन्हें जेल की सजा भी भोगनी पड़ी। शिवसेना छोड़कर जाने वाले नेताओं में एक बड़ा नाम नारायण राणे का भी है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से हुई अनबन के बाद नाराण राणे ने शिवसेना के सर्वथा विपरीत विचारधारा वाली कांग्रेस का दामन थामा और राजस्व मंत्री जैसे पद पर काम किया।
नारायण राणे को जब यह लगा कि अब कांग्रेस में रहने से कोई फायदा नहीं है तब राणे ने भाजपा में जाने की भरसक कोशिश की। यहां उन्हें सीधे सीधे भाजपा में न लाकर पिछले दरवाजे से आगे लाने की कोशिश की गई। एनडीए के जरिए मुख्यमंत्री तथा अन्य भाजपा नेताओं के साथ काम करते हुए नारायण राणे खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। लेकिन नारायण राणे की अति महत्वाकांक्षा उनके लिए बाधक साबित हो रही है। शिवसेना युवा सेना के अध्यक्ष तथा शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के सुपुत्र आदित्य ठाकरे को शिवसेना भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रही है, ऐसे में नारायण राणे तथा छगन भुजबल इन दोनों को शिवसेना में वापसी पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है। शिवसेना को राम राम कहने वाले नेताओं में एक नाम संजय निरुपम का भी है।
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष गुरुदास कामत, निवर्तमान मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवरा समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं से संजय निरुपम के टकराव से जहां एक ओर कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचा, वहीं दूसरी ओर संजय निरुपम को भी मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की गद्दी छोड़नी पड़ी। आज संजय निरुपम के पास कोई पद नहीं है। ऐसे में क्या संजय निरुपम भी शिवसेना का दामन थामेंगे, ऐसा सवाल भी उठने लगा है। वैसे राजनीतिक पंडितों का कहना है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, मनसे प्रमुख राज ठाकरे तथा आदित्य ठाकरे ये तीनों नहीं चाहते कि संजय निरुपम शिवेसना में वापस आएं। भास्कर जाधव को शिवसेना विधानसभा चुनाव में उतारेगी।
राकांपा मुंबई अध्यक्ष पद छोड़ कर शिवसेना में शामिल हुए सचिन अहिर को भी भायखला या किसी अन्य क्षेत्र से विधानसभा चुनावी जंग में उतारा जाएगा। दूसरी ओर छगन भुजबल, नारायण राणे तथा संजय निरुपम आज यह देखकर बेहद दुखी हैं कि शिवसेना दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं के हाथ पर शिवबंधन बांध रही हैं, लेकिन हम जो कभी शिवसेना का हिस्सा थे, उनसे एक बार भी नहीं पूछा।


 
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