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हां, मुर्गे की बांग भी है जरूरी!

09/09/2019

डॉ. प्रभात ओझा

मुर्गा प्रतीक बन गया है हमारी जीवन शैली का, हमारे स्वास्थ्य का और यह एक विदेश की धरती से हुआ है। फ्रांस में मुर्गे के बोलने को लेकर करीब दो साल से बहस जारी थी। जिस मुर्गे की बांग से लोगों को जागने की प्रेरणा मिला करती है, वही वहां एक दंपती के लिए परेशानी का सबब बन गया। इस पर मुकदमा हुआ और बहस को इस रोचक मुकदमे ने ही जन्म दिया। हुआ यूं कि लुइस बिरन और उनकी पत्नी छुट्टियां बिताने गांव आये। पड़ोस में क्रोनी फेस्सयू का घर है, जिन्होंने मौरिस नाम का मुर्गा पाल रखा था। मुर्गे ने जब भी अपने सुर में बोलना शुरू किया, लुइस बिरन और उनकी पत्नी की शांति में खलल पड़ता रहा। मामला कोर्ट तक पहुंच गया। शहर से गांव आने वालों ने ध्वनि प्रदूषण का मसला बनाया। मुर्गा फ्रांस का राष्ट्रीय प्रतीक है। बहस में शहर और गांवों के लोग दो हिस्से में बंट गये। मुर्गे की मालकिन का कहना था कि अभी तक मौरिस के बोलने पर किसी को आपत्ति नहीं थी। शहर से आये उनके पड़ोसियों को ही उससे दिक्कत है। बहरहाल, मुकदमे का फैसला आया। कोर्ट ने कहा कि इस पक्षी का बोलना इसका अधिकार है। यही नहीं, जिस दंपती को मुर्गे से परेशानी थी, उन्हीं को मुर्गे की मालकिन को मुकदमे का हर्जाना भी देना पड़ा।
सच पूछिए तो फ्रांस का यह मुर्गा पूरी दुनिया, खासकर हमारे देश में भी शहरी जीवन और प्रदूषण की ओर इशारा करता है। शहर के कतिपय कुलीन लोग शांति के लिए गांवों की ओर रुख करना चाहते हैं। वैसे गांव की कॉपी करते शहरों के फार्म हाउस तक ही उनकी पसंद है। इधर गांव हैं कि अपनी स्वाभाविकता खोते जा रहे हैं। शहरों की हालत यह है कि वहां की भौतिक क्षमता आबादी के हिसाब से कम पड़ती जा रही है। गांव के लोग रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर भाग रहे हैं। प्रायः कहा जाता है कि भारत गांवों का देश है। इसके उलट आबादी के हिसाब से देखें तो नजारा अजीब होता है। आज गांवों में प्रति वर्ग किलोमीटर 125 से 400 लोग निवास करते हैं, तो छोटे से बड़े शहरों में यह औसत 900 से 25 हजार तक पहुंच गया है। 
गांवों से शहरों की ओर पलायन के कारण भी स्पष्ट है। शहर की ओर रोजगार खींच ले जाता है। वहां बच्चों की बेहतर शिक्षा और उन्हें सुसंस्कृत बनाने की लालसा मन में पलती रहती है। सवाल है कि यह कितने लोगों को मिलता है? गांवों की बड़ी आबादी शहर आकर मजदूरी और दूसरे इसी तरह के काम में लगी होती है। दूसरी ओर, शहर पर आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है। राजधानी दिल्ली का ही उदाहरण लें तो बाहरी इलाकों के साथ अंदर के कुछ हिस्सों में भी झुग्गियों की कतार बढ़ती जा रही है। वहां शुद्ध पेयजल और स्वच्छता का माहौल चुनौती की तरह है। उधर, मायानगरी मुंबई तो इस तरह की मुसीबतों के साथ प्राकृतिक परेशानियों से भी दो-चार हो रही है। आबादी के दबाव ने शहर की भौतिकी को इस कदर बिगाड़ा है कि हर साल बाढ़ के हालात बन जा रहे हैं। दोनों शहरों में शीत, ग्रीष्म और वर्षा का बिगड़ता संतुलन सामान्य हो चला है।
गांव भी अलग तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। युवा पीढ़ी के निकलते जाने से खेतों को मानव श्रम कम पड़ने के खतरे बढ़ रहे हैं। हां, बचा है तो उन्मुक्त प्राकृतिक वातावरण। आखिर यही तो मनुष्य के लिए प्राणवायु है। शहरों की ओर रुख करने वालों को इसी का अभाव दिख रहा है। जरूरत है इस आवश्यकता को पहचानने की। विचारणीय है कि शहरों की ओर पलायन रुके। तभी तो गांव भी आकर्षण का केंद्र बनें। सरकार इस ओर ध्यान देने में लगी हैए पर रफ्तार अभी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात की सुविधाएं बढ़ें और गांव में कुटीर उद्योग को बढ़ावा मिले, तो बड़ी आबादी को रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़े। गांव में स्कूलों की स्थिति बेहतर हो, पेयजल शुद्ध हो तो वहां अभी हवा स्वास्थ्य के सर्वथा अनुकूल बची है। आप सोचिए कि गांव में सामुदायिक रूप से ऐसे कुछ स्थान हों, जहां बाहर के लोग भी आकर रहें। ऐसे में तो हर गांव में फार्म हाउस जैसा एक स्थान होगा। तब शायद हम विदेशियों को भी बता सकेंगे कि मुर्गे की बांग तो सुबह की ताजी हवा के लिए ही आकर्षित करती है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका 'यथावत' के समन्वय संपादक हैं।)      


 
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