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दहशत में दुुनिया

04/05/2020

दहशत में दुुनिया


डॉ. नीलम सिंह

माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने एक हालिया सुनवाई के दौरान कोरोना पर अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि दुनिया में कोरोना से अधिक खतरा कोराना की दहशत से है। यह टिप्पणी एक ऐसे समय में आई है, जब हममें से हर एक कोरोना का विशेषज्ञ बना बैठा है। बचपन में एक कहावत सुनी थी‘जादा जोगी मठ उजाड़’ उसका मतलब अब समझ में आया है। आज कोरोना पर जितनी मुंह उतनी बातें। कोई कम नहीं। कोई गरम पानी के गरारा करने से इसे ठीक करने की विधि बता रहा है, तो कोई गोमूत्र के सेवन को सभी व्याधियों का अंतिम उपाय बता रहा है। कई लोगों को लगता है कि अल्लाह का घर मस्जिद में है एवं मस्जिद में रहना संभवत: सबसे बेहतर है। कुछ लोगों ने तो सारे विधानों को धता बताते हुए पुलिस एवं डाक्टरों को ही अपना दुश्मन मान लिया है एवं उन पर थूकने एवं पत्थर फेंकने जैसे कुकृत्य में संलग्न हो गए। ऐसी मानसिक दशा में एक दृढ़ प्रतिज्ञ राष्ट्र की अग्नि परीक्षा का वक्त कहा गया है। दिक्कत यह है कि यहां सब कुछ चश्मे से देखा जाता है। आप तबलीगी और जमात पर कुछ बोलें तो मुसीबत को न्यौता देते हैं। लोगों को लगता है या कुछ लोगों को लगता है कि इससे हमारे देश के अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जा रहा है। तुरंत दुहाई दी जाने लगती है कि क्यों मंत्रिमंडल का गठन नहीं टाला गया था कि ऐसे अन्य समारोह रद्द नहीं कर दिए गए जो ‘मेजोरिटी’ समुदाय से जुड़े थे।

ऐसा लगता है कि मुख्य मुद्दा पीछे चला जाता है एवं हम एक ऐसे संकट के समय में जबकि पूरे राष्ट्र को एक आवाज में बात करनी चाहिए, पुन: आपसी विवादों में उलझने लगते हैं। सवाल यह है क्या राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में हम इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य मान सकते हैं।

ऐसा लगता है कि मुख्य मुद्दा पीछे चला जाता है एवं हम एक ऐसे संकट के समय में जबकि पूरे राष्ट्र को एक आवाज में बात करनी चाहिए, पुन: आपसी विवादों में उलझने लगते हैं। सवाल यह है क्या राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में हम इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य मान सकते हैं। हमारे धर्म-ग्रंथों में आपद धर्म की चर्चा है। जब हमारे सामाजिक नियम अत्यंत कड़े थे एवं व्यवस्था का बंधन अत्यंत कड़ा था, तब भी संकट काल में एक अलग व्यावहारिक धर्म की बात हमारे ग्रंथों में है, जिसे आपद धर्म की संज्ञा दी गई है। सामान्यत: शस्त्र उठाना क्षत्रियों का धर्म माना जाता था, परन्तु आपद धर्म यह था कि यदि राष्ट्र पर आक्रमण हुआ है तो बिना जाति भेद के सभी समुदाय शस्त्र उठा सकते हैं एवं राष्ट्र रक्षा में अपना योगदान दे सकते हैं। नि:संदेह तब के राष्ट्र की कल्पना को आधुनिक राष्ट्र की संकल्पना से जोड़कर देखना उचित न लगे परन्तु इस बात का मर्म यह है कि जब हमारे समाज पर विपत्ति आए तो धर्म-जाति समुदाय के बंधनों से मुक्त होकर मिलकर सामना करना चाहिए। यही राष्ट्र धर्म है। दुर्भाग्यवश हम भूल जाते हैं कि प्राकृतिक आपदाएं एवं कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का सामना इसी ‘आपद धर्म’ से किया जा सकता है।

शस्त्र उठाना क्षत्रियों का धर्म माना जाता था, परन्तु आपद धर्म यह था कि यदि राष्ट्र पर आक्रमण हुआ है तो बिना जाति भेद के सभी समुदाय शस्त्र उठा सकते हैं एवं राष्ट्र रक्षा में अपना योगदान दे सकते हैं। नि:संदेह तब के राष्ट्र की कल्पना को आधुनिक राष्ट्र की संकल्पना से जोड़कर देखना उचित न लगे परन्तु इस बात का मर्म यह है कि जब हमारे समाज पर विपत्ति आए तो धर्म-जाति समुदाय के बंधनों से मुक्त होकर मिलकर सामना करना चाहिए। यही राष्ट्र धर्म है।

आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वह एक दूसरे से इस प्रकार संयुक्त है, इस तरह जुड़ा है कि इसे न तो स्थान के दायरे में बांधा जा सकता है- न जाति-धर्म-समुदाय के दायरे में। यहां तक कि राष्ट्र के दायरे में भी नहीं। संपूर्ण विश्व में इस महामारी का तेजी से फैलाव इस बात का सबूत है कि यह संकट मानवता पर संकट है। इसे हिन्दू मुसलमान के चश्मे से मत देखें। इससे न तो वे हिन्दू बच पाएंगे जो ‘लॉकडाउन’ के नियमों का उल्लंघन कर एवं प्रधानमंत्री के निदेर्शों की गलत व्याख्या कर झुंड बनाकर सड़कों पर ताली बजाने निकल पड़े और न ही वे तबलीगी जमात वाले बच पाएंगे जो एक जगह जमा होकर इस संक्रमण का टाइम बम बने हुए थे। कई बार ऐसा लगता है कि जाहिल चाहे वे जिस धर्म से भी जुड़े हों, उनके साथ सख्ती रखना ही एकमात्र विकल्प है। ‘सठ सुधरहिं सत्संग पाई’ की व्याख्या यही है कि सठे साठ्यम समाचरेत। जो लोग डॉक्टरों पर पत्थर फेंक रहे हैं अथवा थूक रहे हैं वे किसी भी प्रकार से समुदाय के हितैषी नहीं हैं एवं सार्वजनिक निंदा के पात्र हैं। चाहे वे किसी भी धर्म अथवा समुदाय से जुड़े हों,यदि वे ‘लॉकडाउन’ के सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का तर्क नहीं मानते तो वे पूरे समुदाय का नुकसान कर रहे हैं। आज संकट मानवता के ऊपर है। यदि इसे बचाना है तो हमें इस दहशत भरे माहौल को बढ़ाने की बजाय व्हाट्सएप ग्रुप में वाहियात मैसेज फैलाने की जगह एक सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा।

ताली बजाने और दीप जलाने के प्रधानमंत्री के प्रस्तावों को सतही विश्लेषण में उड़ाने की बजाए उसके निहितार्थ को समझने की आवश्यकता है। दहशत फैलाने के लिए हमारे पास तथ्यों की कमी नहीं है और अफवाह फैलाने के लिए माध्यमों की। मंदिरों में भजन एवं मस्जिदों में अजान की आवश्यकता से किसी को भी इनकार नहीं परन्तु आपद धर्म यही है कि हम धर्म को व्यक्तिगत स्तर पर लाएं एवं अल्लाह/परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करें -अपने घरों में बैठकर कि इस संकट का सामना करने के लिए हमें आत्मबल प्रदान करे। चाहे वे डॉक्टर हों या पुलिस एवं पैरामिलिटरी फोर्सेज के अधिकारी अथवा अन्य आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति में लगे लोग, हमें उनका उत्साहवर्धन करना चाहिए। घर पर बैठकर भी हम आभासी माध्यमों से जगह जगह फंसे मजदूरों एवं बेसहारा लोगों की टोह ले सकते हैं एवं अपने अपने स्तर पर उनकी मदद कर सकते हैं। हम जानते हैं कि प्रबुद्ध वर्ग ने सदैव ऐसे समय में समाज को सही दिशा दिखाने में अपना योगदान किया है। हम भूख एवं गरीबी की मार सह रहे लोगों के प्रति अपने सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार एवं कार्य से उनकी पीड़ा भले ही समाप्त न कर सकें, कुछ तो कर ही सकते हैं। एक शायर से उधार लेकर

‘माना कि इस जमीं को न गुलजार कर सकें कुछ खार कम तो कर गए गुजरे जिधर से हम।’


 
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