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सुषमा स्वराज का यूं चले जाना

07/08/2019

रमेश ठाकुर 
नेकी की दीवार के ढहने जैसा है सुषमा स्वराज का यूं चले जाना। आम इंसान के दर्द को समझना और उसे तत्काल दूर करना, सुषमा स्वराज की खूबी हुआ करती थी। आज के युग में ऐसी खूबी विरले राजनेताओं में ही देखी जाती है। उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी आम और खास में अंतर नहीं समझा। हमेशा इंसानियत को तवज्जो दी। यही कारण था कि समूचे भारत के लोगों का जुड़ाव उनसे दूसरे राजनेताओं से अलग होता था। वह मदद के तलबगारों और गरीबों से प्रत्यक्ष संवाद करने में विश्वास रखती थीं। उनके न रहने की खबर जैसे ही आई, लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनके परिवार का ही कोई अहम सदस्य रुखसत हो गया हो। 
सुषमा स्वराज मौजूदा वक्त की सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार थीं। मदद के तलबगार उनसे बिना हिचक अपनी समस्याओं को सामने रखते थे। विदेश मंत्री के कार्यकाल के दौरान उनके दरबार में ऐसे भी फरियादी देखे जाते थे जिनके पासपोर्ट बनने में मामूली दिक्कतें होती थी। वैसी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी वह क्लर्क स्तर के कर्मचारी को फोन करती थीं। थोड़ी देर के लिए भूल जाती थीं कि वह विदेश मंत्री हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में विदेश मंत्री के रूप में सुषमा सोशल मीडिया, खासकर ट्विटर पर बेहद सक्रिय रहा करती थीं। देश-विदेश में जो भी उनसे मदद की गुहार लगाता था, उसे तत्काल सहायता देने की कोशिश करती थीं। 
सुषमा सादगीपूर्ण जीवन जीने में विश्वास रखती थीं। घर की साफ-सफाई करने से लेकर किचन में आम महिलाओं की भांति काम करना उन्हें पसंद था। उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू से अंत तक पाक-साफ रही। कोई आरोप नहीं लगा। विरोधी दलों के नेता भी उनके काम करने के तरीकों को सीखा करते थे। सुषमा सियासी पटल पर अटल-आडवाणी युग के बाद दूसरी पीढ़ी के प्रखर नेताओं में शुमार होकर अपनी अलहदा चमक बिखेर रही थीं। मौत के मात्र तीन घंटे पहले तक पूरी तरह से सक्रिय रहीं। 90 के दशक में उनकी शैली को अलग माना गया। हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, पार्टी ने जहां से कहा वह मैदान में उतरीं और लोगों में दिलों में रच-बस गईं। 
विगत एकाध वर्षों से उनका स्वास्थ्य कुछ गिरा था। जिस कारण उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता लगातार जारी रही। विदेश मंत्री रहते जितनी लोकप्रियता उन्हें मिली, शायद आज तक किसी विदेश मंत्री को नहीं मिली। उनके कार्यकाल में उनका दरबार गरीब, असहायों और जरूरतमंदों के लिए हमेशा खुला रहता था। कोई भी निराश होकर नहीं लौटा। उनके सियासी सफर पर नजर डालें तो एक सुनहरा अध्याय पढ़ने और सुनने को मिलता है। 70 के दशक में उनका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ना हुआ और यहीं से उनकी सियासी यात्रा का आगाज भी हुआ। मात्र 25 वर्ष की आयु में सुषमा स्वराज मंत्री बनीं। सन् 1977 में हरियाणा विधानसभा की सदस्य बनीं और कैबिनेट मंत्री का पदभार संभाला। उनके नाम सबसे कम उम्र में जनता पार्टी हरियाणा की अध्यक्ष बनने का रिकॉर्ड भी है। 
सुषमा 1987 से 1990 के बीच भाजपा व लोकदल की गठबंधन सरकार में हरियाणा की शिक्षा मंत्री रहीं। उन्हें दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का भी गौरव प्राप्त हुआ। उनके निधन से एक स्वर्णिम युग का अंत हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद मुखर वक्ता के लिए सुषमा स्वराज को याद किया जाएगा। सुषमा स्वराज के निधन पर देश के ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम नेता भी दुख जता रहे हैं। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने सुषमा स्वराज के निधन पर अपनी श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने कहा कि दुनिया ने एक महान कद्दावर नेता खो दिया है। अमेरिका के कई नेताओं ने भी सुषमा के परिवार और भारत के प्रति सहानुभूति जताई। पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी भी सुषमा स्वराज के अचानक निधन से दुखी हैं। उन्होंने स्वराज को विशिष्ट और दृढ़निश्चयी बताया। 
सुषमा स्वराज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे वफादार साथियों में से एक थीं। प्रधानमंत्री को उनके निधन से बहुत बड़ा धक्का लगा है। सुबह जब अंतिम दर्शन करने उनके घर पहुंचे तो पीएम भावुक हो गए। उनके साथ बिताए पलों को याद करके उनकी आंखें नम हो गईं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ठीक ही कहा कि सुषमा राष्ट्र की बेटी थीं वह करीब तीन साल पहले तक एकदम स्वस्थ्य थीं। अचानक उन्हें पता चला कि उनकी किडनी खराब हो गई है। किडनी फेल होने पर उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया। डायलिसिस पर रखा गया। इलाज के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ। इसके बाद परिवारजनों के आग्रह पर राजनीति से कुछ दूरी बनाई। पति स्वराज कौशल के कहने पर चुनाव भी नहीं लड़ा, लेकिन देश के लिए हमेशा फिक्रमंद रहीं। मौत के कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर प्रधानमंत्री को बधाई भी दी। अपने ट्विट में उन्होंने लिखा, 'प्रधानमंत्री जी, हार्दिक अभिनंदन! मैं इसी दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।' दिसंबर 2016 में सुषमा की दोनों किडनियों का ट्रांसप्लांट किया गया था। इसके अलावा वह डायबिटीज की पुरानी बीमारी से भी जूझ रही थीं। बताते हैं कि सुषमा करीब बीस वर्षों से भी ज्यादा समय से डायबिटीज की पीड़ित थीं जिसके चलते ही उनकी किडनी खराब हुई थी। उनके निधन से देश को बड़ा नुकसान हुआ है जिनकी भरपाई मुश्किल है।
(लेखक पत्रकार हैं।) 


 
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