लेख

Blog single photo

अपाचे : भविष्य की लड़ाई का आधुनिक हथियार

05/09/2019

प्रमोद भार्गव

दुनिया में लड़ाई के तौर-तरीके बदल रहे हैं। युद्ध थल सेना की आमने-सामने की लड़ाई की बजाय, अब नए व उन्नत तकनीकी उपकरणों और युद्धक विमानों से ही सफलतापूर्वक लड़े जा सकते हैं। इस नाते भारत पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में लड़े जा रहे छद्म युद्ध का जवाब पीओके में मौजूद आतंकी शिविरों पर दो सर्जिकल स्ट्राइक करके दे चुका है। बालाकोट पर किए गए लक्षित हमलों के बाद ही पाकिस्तान के हौसले पस्त हुए हैं। साफ है, पारंपरिक तरीकों और पुराने हथियारों से अब कोई भी जंग जीतना असंभव है। इस लिहाज से युद्धक हेलीकॉप्टर अपाचे का भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनना सराहनीय कदम है। अपाचे एएस-64 ई अमेरिका की बोइंग कंपनी द्वारा निर्मित है। इसे हवाई हमले में दक्ष सबसे आधुनिक हथियार माना जाता है। अमेरिका ने ईराक और अफगानिस्तान में इसी से कामयाबी का परचम फहराया है। पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक कर ओसामा बिन लादेन को ठिकाने इसी हेलीकॉप्टर के बूते लगाया गया था। फिलहाल आठ अपाचे हेलीकॉप्टरों को वायुसेना प्रमुख वीएस धनोआ की मौजूदगी में पठानकोट वायुसेना के बेड़े में शामिल कर लिया गया है। कुल 22 अपाचे खरीदे जाएंगे, जो अगामी तीन सालों में तीन खेपों में वायुसेना का हिस्सा बनेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अमेरिका से इन अपाचे हेलीकॉप्टरों के बड़े रक्षा सौदे को 2015 में मंजूरी दी थी। सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति ने अमेरिका से 165 अरब रुपये के लड़ाकू हेलीकॉप्टर एवं अन्य रक्षा उपकरण खरीदने का बड़ा सौदा करने का प्रस्ताव पहले ही मंजूर कर दिया था। फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे के बाद भारत का यह दूसरा बड़ा रक्षा सौदा था। पिछले 20 साल से देश ने लड़ाकू विमानों का कोई सौदा नहीं किया था। इस वजह से वायुसेना में लड़ाकू विमानों की लगातार कमी होती गई है। नतीजतन देश की हवाई सुरक्षा खतरे में पड़ी अनुभव की जा रही थी। उपलब्ध विमानों के बेड़ों की संख्या लगातार घट रही थी। भारतीय सेना में रूस के बने पुराने एमआई 36 युद्धक विमानों की जगह लेने वाला अपाचे बहुउद्देशीय हमलावर हेलीकॉप्टर है। इस नाते अमेरिकी विमानन कंपनी बोइंग से 22 अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टर और 15 शिनूक भारी उद्वहन हेलीकॉप्टर खरीदने का सौदा देश की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी था। यह सौदा इसलिए अहम् है क्योंकि हमारे पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान में लड़ाकू विमान लगातार बढ़ रहे हैं। इन दोनों देशों की वायु शक्ति की तुलना में हमारे पास कम से कम 756 लड़ाकू विमान होने चाहिए। सेना में विमान, हथियार और रक्षा उपकरणों की कमी की चिंता अनेक बार संसद की रक्षा संबंधी स्थाई संसदीय समीति भी जता चुकी है। यह उपलब्धि नरेंद्र मोदी की सफल कूटनीति का परिणाम है, अन्यथा अमेरिका कई दशकों से भारत को हथियार बेचने में बहाने बना रहा था। इसलिए हमें लंबे समय तक केवल रूस और फिर इजराइल से हथियार खरीदने को मजबूर होना पड़ा। जबकि इस दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 बमवर्षक विमानों सहित कई घातक हथियार बेचे हैं। इस नाते मोदी की विदेश नीति की यह बड़ी सफलता है।
अपाचे का यह सौदा हाइब्रिड है। इसमें हेलीकॉप्टर के लिए एक करार पर बोइंग कंपनी के हस्ताक्षर हुए हैं, तो हेलीकॉप्टर से संबंधित हथियार, रडार और इलेक्ट्रोनिक युद्ध उपकरणों के लिए अमेरिकी सरकार के साथ अनुबंध हुआ था। अमेरिका इस सौदे का तीव्रता से आकांक्षी था, क्योंकि यह भारत के बढ़ते रक्षा बाजार में अमेरिकी मौजूदगी को और मूजबूत करेगा। वैसे भी पिछले एक दशक के दौरान अमेरिकी कंपनियों ने तकरीबन 10 अरब डॉलर मूल्य के रक्षा सौदे किए हैं। इनमें पी-81 नौवहन टोही विमान, सी-130, जे सुपर, हरक्यूलियस और सी-17 ग्लोबमास्टर-3 जैसे विमानों की खरीद शामिल है। अपाचे एएच-64 लॉन्गबो हेलीकॉप्टर आधुनिक होने के साथ बहुलक्षीय युद्धक विमान है। यह हर मौसम और रात में भी युद्ध अभियानों में सक्रिय रहने की क्षमता रखता है। इसकी सबसे प्रमुख खूबी यह है कि यह एक मिनट से कम समय में 128 लक्ष्यों को चिन्हित कर सकता है और 16 लक्ष्यों पर निशाना साधता हुआ बच निकल सकने की विलक्षणता रखता है। दुश्मन के रडार पर इसका अक्श दिखाई नहीं देता। इसके संवेदी यंत्र आधुनिक हैं और इसकी मिसाइलें जो दृश्य है, उससे भी आगे तक प्रहार करने की क्षमता रखते हैं। इसकी अधिकतम गति 315 किमी प्रतिघंटा है, जबकि समुद्र में यही गति 240 किमी प्रति घंटा रह जाती है। यह 55 सैनिक और 12,700 किलोग्राम वजन ढो सकता है। कारगिल जैसे ऊंचाई वाली चोटियों पर भी यह हेलीकॉप्टर आसानी से पहुंच सकता है। यह युद्धस्थल पर आक्रमण करते रहने के साथ-साथ उस स्थल की हुबहू तस्वीरें खींचकर हवाई ठिकानों तक पहुंचाने में भी सक्षम है। इस नाते सर्जिकल स्ट्राइक में इसकी उपयोगिता बेहद अहम् है। यह आपात स्थिति में सैनिकों को चिन्हित स्थल पर पहुंचाने व वहां से लाने में भी कुशल है। इस हेलीकॉप्टर में 16 एंटी टैंक एजीएम-114 हेलफायर और स्टिंगर मिसाइल लगी होती हैं। हेलफायर किसी भी सैन्य वाहन जैसे, टैंक, तोप एवं बीएमपी वाहनों को पलभर में उड़ा सकती है। इसकी स्ट्रिंगर मिसाइल हवा से आने वाले किसी भी खतरे का सामना करने में सक्षम है। इसके साथ ही इसमें हाईड्रा-70 अनगाइडेड मिसाइल भी लगी होती है, जो जमीन पर किसी भी लक्ष्य को तबाह करने की क्षमता रखती है। इसीलिए अपाचे और शिनूक हेलीकॉप्टरों का उपयोग अफगानिस्तान और ईराक जैसे सैन्य अभियानों में बेमिसाल रहा है।
हालांकि रक्षा उपकरणों की खरीदी से अनेक किंतु-परंतु जुड़े होते हैं, सो इस खरीद से भी जुड़े हैं। राफेल विमान की तरह अमेरिका भी अपाचे विमान की तकनीक भारत को नहीं दे रहा है। फ्रांस से जिन राफेल विमानों का सौदा हुआ है, उसके तहत फ्रांस के तकनीकी सहयोग से स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने की दृष्टि से 108 विमान भारत में ही बनाए जाने थे। स्वदेश में इन विमानों को बनाने का काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था। ये शर्तें फ्रांस से हुए अंतिम अनुबंध में हटा दी गई हैं। अपाचे सौदे में भी यही हुआ है। इससे मोदी के 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम को धक्का पहुंचा है। क्योंकि, इतने बड़े रक्षा सौदों के बावजूद देश युद्धक विमानों के निर्माण की तकनीक से वंचित ही रहेगा। जाहिर है, जब तक एचएएल को यूरोपीय देशों से तकनीक का हस्तांतरण नहीं होगा, तब तक न तो स्वदेशी विमान निर्माण कंपनियों का आधुनिकीकरण होगा और न ही हम स्वदेशी तकनीक निर्मित करने में आत्मनिर्भर हो पाएंगे हालांकि विमान प्रदायक फ्रांसीसी कंपनी दासौ ने भरोसा जताया है कि वह विमानों के निर्माण की संभावनाएं भारत में तलाशेगी। लेकिन निर्माण की यह शर्त समझौते में बाध्यकारी नहीं है। अमेरिका तो भारत में विमान निर्माण की संभावनाएं तलाशने को भी तैयार नहीं हुआ।
बहरहाल, लड़ाकू विमानों की आश्चर्यजनक कमी से जूझ रही वायुसेना को ये विमान मिलने के बाद ऑक्सीजन साबित होंगे। तमाम शंका-कुशंकाओं के बावजूद ये विमान खरीदना इसलिए जरूरी था, क्योंकि हमारे लड़ाकू बेड़े में शामिल ज्यादातर विमान पुराने होने के कारण जर्जर हालत में हैं। अनेक विमानों की उड़ान अवधि समाप्त होने को है और पिछले 20 साल से कोई नया विमान नहीं खरीदा गया है। कुछ ही महीनों में सोवियत रूस से 1960 और 70 के दशक में खरीदे गए मिग-21 और मिग-27 विमानों के तीन बेड़े उम्र पूरी हो जाने के कारण सेवा से बाहर कर दिए जाएंगे। ज्यादातर विमान उड़ान भरने की अवधि के करीब होने के कारण आए दिन दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन दुर्घटनाओं में वायु सैनिकों को बिना लड़े ही शहीद होना पड़ रहा है।
हकीकत तो यह है कि मोदी सरकार को अब लाचारियों से भरी ऐसी खरीदों के स्थायी समाधान तलाशने की जरूरत है, जो पारदर्शी नीतियों का पालन करने वाली हों। खरीद प्रक्रिया आधुनिक और तय सीमा में अंजाम तक पहुंचने वाली हो। साथ ही एचएएल एवं डीआरडीओ जैसी संस्थाओं का आधुनीकिकरण और स्वदेशीकरण किया जाना नितांत जरूरी है। फिलहाल हमारे यहां हल्के युद्धक विमान और आधुनिकतम हल्के किस्म के हेलीकॉप्टर बनाए जा रहे हैं। टाटा कंपनी सी-130 मॉडल के विमानों के पुर्जे भारत में बनाकर दूसरे देशों में निर्यात कर रही है। जब ऐसा संभव है तो हम अपने ही देश के लिए शक्तिशाली युद्धक विमानों का निर्माण क्यों नहीं कर सकते? एचएएल भारतीय कंपनियों को उपकरण व पुर्जे बनाने का लाइसेंस देकर इस दिशा में उल्लेखनीय पहल कर सकती है। यदि ऐसा भविष्य में होता है तो हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और प्रधानमंत्री मोदी का 'मेक इन इंडिया' के जरिए स्वदेशीकरण का जो स्वप्न है, उसके साकार होने की उम्मीद बढ़ जाएगी। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
Top