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अब नहीं सुनाई देगी वह जोरदार आवाज

11/08/2019

अब नहीं सुनाई देगी वह जोरदार आवाज

संजय वर्मा

चार बार विधायक, पांच बार लोकसभा व दो बार राज्यसभा सदस्य रहे जयपाल रेड्डी को हमेशा ही एक प्रखर सांसद और सरल स्वभाव के नेता के तौर पर याद किया जाएगा।

शी ला दीक्षित के बाद अब कांग्रेस ने अविभाजित आंध्र प्रदेश और फिर तेलंगाना के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी एक अलग पहचान रखने वाले जयपाल रेड्डी को खो दिया। तेलुगू राजनीति के दिग्गज नेता रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री जयपाल रेड्डी का 28 जुलाई को 77 वर्ष की आयु में हैदराबाद में निधन हो गया। एक बेटी व दो बेटों के पिता रेड्डी का जन्म 16 जनवरी 1942 को हैदराबाद के मदगुल में हुआ था। अब यह तेलंगाना राज्य के अंतर्गत आता है। अविभाजित आंध्र प्रदेश में वे 4 बार विधायक व 5 बार लोकसभा सांसद चुने गए। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे। अपनी शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद, एक प्रखर वक्ता होने के कारण उन्हें कई बार पार्टी प्रवक्ता का दायित्व संभालने का भी मौका मिला। उनकी गिनती अपने समय के सबसे अधिक लोकप्रिय पार्टी प्रवक्ताओं में होती रही है। दमदार आवाज वाले जयपाल रेड्डी की अंग्रेजी बहुत अच्छी थी लेकिन लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहने के कारण दक्षिण के अधिकतर नेताओं के विपरीत उनकी हिंदी की समझ भी बहुत अच्छी थी। कई बार संवाददाता सम्मेलनों में उनकी भारी-भरकम अंग्रेजी, हिंदी के पत्रकारों के सिर के ऊपर से निकल जाती थी तो फिर वे उनसे हिंदी में भी अपनी बात कहते थे। अपनी सहजता के कारण संवाददाताओं के बीच बेहद लोकप्रिय रहे और केंद्रीय मंत्री का पद संभालने के बाद भी उनकी यह सहजता कायम रही। जयपाल रेड्डी की राजनीतिक यात्रा एक छात्र नेता के तौर पर आरंभ हुई थी। वे 1965 से 1971 तक आंध्र प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। फिर प्रदेश कांग्रेस समिति के महासचिव बनाए गए। 1969 से 1984 तक उन्होंने एक विधायक के तौर पर चार बार कल्वाकुर्थी विधान सभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, वे लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे लेकिन जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की तब उन्होंने अपना विरोध जताते हुए कांग्रेस छोड़ दिया और 1977 में जनता पार्टी से जुड़ गए। 1985 से 1988 तक वे जनता पार्टी के महासचिव रहे। 1984 में वे महबूबनगर लोकसभा क्षेत्र से पहली बार सांसद निर्वाचित हुए और फिर कुल मिलाकर पांच बार लोकसभा के लिए चुने गए। जून 1991 से जून 1992 के बीच वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता भी रहे। 1997- 1998 में वे इंद्रकुमार गुजराल की सरकार में पहली बार केंद्रीय मंत्री बने, जब उन्हें सूचना एवं संचार मंत्री बनाया गया। 1999 में उनकी कांग्रेस में वापसी हुई और फिर 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी तो उन्हें शहरी विकास मंत्रालय का दायित्व सौंपा गया। यूपीए-2 में उनके पास शहरी विकास मंत्रालय और पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रालय की जिम्मेवारी रही। उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी व पृथ्वी विज्ञान के मंत्रालयों का दायित्व भी संभाला। जयपाल रेड्डी को हमेशा ही एक प्रखर सांसद और सरल स्वभाव के नेता के तौर पर याद किया जाएगा। 1998 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान दिया गया। वे इस सम्मान को पाने वाले दक्षिण भारत के पहले और देश के सबसे कम उम्र के सांसद थे। जयपाल रेड्डी को ऐसे नेता के तौर पर याद किया जाएगा जो अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा के दौरान हमेशा ही विवादों से दूर रहे। 28 अक्टूबर 2012 को जब मनमोहन सिंह सरकार का आखिरी मंत्रिमंडलीय फेरबदल हुआ तो उनसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ले लिया गया। तत्कालीन विपक्षी दलों ने यह आरोप लगाया कि इस बदलाव का कारण रिलायंस को गैस आवंटन पर उनकी अलग सोच और उनका रिलायंस की मांगों को अस्वीकार करना था। पेट्रोलियम मंत्रालय ने गैस के उत्पादन में तेजी से गिरावट और कैग की 2011 की रिपोर्ट में उल्लेख किए गए उल्लंघनों की वजह से मुकेश अंबानी की कंपनी पर सात हजार करोड़ का जुर्माना किया था। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि रिलायंस उद्योग समूह के दबाव में जयपाल रेड़डी से पेट्रोलियम मंत्रालय का दायित्व ले लिया गया लेकिन उन्होंने ऐसी किसी बात से इंकार किया और कांग्रेस पार्टी एवं सरकार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जारी रही।


 
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