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आह शराब, वाह शराब

15/05/2020

आह शराब, वाह शराब

बद्रीनाथ वर्मा

किसी भी सरकार के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए राजस्व प्राणवायु है, यह सत्य है। लेकिन क्या अपने ही किये कराये पर पानी फेर देना बुद्धिमतापूर्ण फैसला कहा जा सकता है।

बद्रीनाथ वर्मा

गये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। यह एक मुहावरा है लेकिन लॉकडाउन 3 के दौरान देश भर में शराब दुकानों को खोलने के अविवेकपूर्ण फैसले पर बिल्कुल फिट बैठता है। क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि सामाजिक दूरी बनाये रखने के लिए पूरे देश में अभूतपूर्व लॉकडाउन घोषित किया गया और इससे हासिल लाभ को शराब दुकानों पर लंबी लंबी लाइनें लगवाकर एक झटके में गंवा देने जैसा मूर्खतापूर्ण फैसला ले लिया गया। आखिर ऐसी भी क्या मजबूरी आन पड़ी कि सरकारों को इस तरह के फैसले लेने को मजबूर होना पड़ा।

उल्लेखनीय है कि चीन के वुहान से निकलकर पुरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुके वैश्विक महामारी कोरोना की चपेट में आये भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा हर रोज बढ़ता जा रहा है। अभी तक कोरोना को कोई वैक्सीन नहीं बन पायी है। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग ही फिलहाल कोरोना से बचने का एकमात्र उपाय है। यही कारण है कि देश में जैसे ही कोरोना ने दस्तक देनी शुरू की और संक्रमण का खतरा बढ़ने की आशंका बलवती हुई तुरंत लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। पहले 21 दिन और उसके बाद 19 दिनों का लॉकडाउन।

लगातार दो लॉकडाउन यानी कुल 40 दिनों की बंदी का सुखद परिणाम भी निकला। कोरोना वायरस उस तेजी के साथ अपना पांव नहीं पसार सका। संक्रमण के मामले कुछ खास इलाकों तक ही सिमट कर रह गये। हालांकि संक्रमितों की संख्या में लगातार इजाफा होता रहा। फलस्वरूप दो सप्ताह के लिए लॉकडाउन-3 की घोषणा करनी पड़ी। हां, पहले वाले दो लॉकडाउन की तुलना में इस बार आर्थिक गतिविधियां शुरू करने की कुछ छूट मिली है। लगातार लॉकडाउन का राजस्व कलेक्शन पर बुरा असर पड़ा है, इसमें कोई संदेह नहीं। किसी भी सरकार के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए राजस्व प्राणवायु है, यह भी सत्य है। लेकिन क्या अपने ही किये कराये पर पानी फेर देना बुद्धिमतापूर्ण फैसला कहा जा सकता है।

लॉकडाउन 3 की शुरुआत के साथ केंद्रीय गृहमंत्रालय के गाइडलाइन में दी गई रियायतों के आधार पर राज्य सरकारों द्वारा राजस्व प्राप्ति के लिए शराब दुकानों को खोलने का निर्णय लेना कहीं से भी गलत नहीं है। हां, लेकिन शराब दुकानों के सामने लगने वाली दो-दो तीन-तीन किलोमीटर लंबी लाइनें और इसमें सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ती धज्जियां बेहद भयावह तस्वीर पेश कर रही है। डर तो इस बात का है कि अगर इनमें से कोई एक भी कोरोना संक्रमित हुआ तो फिर सारे किये कराये पर पानी फिर जायेगा और देश में कोरोना का ऐसा विस्फोट हो सकता है जिसे संभाल पाना असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर हो जाएगा।

बहरहाल, गुजरात और बिहार में शराबबंदी को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सरकारी खजाने में शराब की कमाई का काफी योगदान है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले हफ्ते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखकर राज्य में शराब के ठेके खोलने की अनुमति मांगी थी। कैप्टन ने इसके पीछे खराब हो रही वित्तीय स्थिति का हवाला भी दिया था। उन्होंने पत्र में लिखा था कि राज्य सरकार को साल भर में 62 सौ करोड़ रुपये की आमदनी शराब के ठेके नीलाम करने से होती है, जो प्रति महीना 521 करोड़ रुपये बनता है, लेकिन पिछले 43 दिनों से शराब के ठेके बंद होने के कारण राज्य सरकार को इस बड़ी आमदनी से हाथ धोना पड़ रहा है।

आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने शराब से 1,75,501.42 करोड़ रुपये का उत्पाद शुल्क जुटाने का लक्ष्य रखा था। यह 2018-19 के दौरान एकत्र किए शुल्क 1,50,657.95 करोड़ रुपये से 16 फीसदी अधिक है। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि ज्यादातर राज्यों के कुल राजस्व का 15 से 30 फीसदी हिस्सा शराब से आता है। उत्तर प्रदेश में शराब से मिलने वाला आबकारी शुल्क कुल राजस्व का लगभग 20 फीसदी तथा तकरीबन इतना ही राजस्व  उत्तराखंड में भी आता है। दिल्ली सरकार को लॉकडाउन से पहले शराब की बिक्री से हर महीने करीब 500 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता था।

लॉकडाउन के चलते पिछले 43 दिन से शराब की बिक्री बंद होने से राज्यों की कमाई बंद हो गई थी। पिछले वित्त वर्ष में सभी राज्यों  ने कुल मिलाकर करीब 2.48 लाख करोड़ रुपये, 2018 में 2.17 लाख करोड़ रुपये और 2017 में 1.99 लाख करोड़ रुपये की कमाई की थी। यानी 2019 के आंकड़ों के अनुसार, लॉकडाउन के पहले और दूसरे चरण में 40 दिनों के दौरान राज्यों को शराब की बिक्री न होने से औसतन करीब 27 हजार करोड़ रुपये यानी एक दिन में औसतन करीब 679 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। संभवत: इसी वजह से शराब की बिक्री पर रोक लगाने को लेकर अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए राज्यों से कहा है कि वे लॉकडाउन के दौरान शराब की ऑन लाइन बिक्री और होम डिलीवरी करने की संभावना पर विचार करें।

इससे इतर राज्यों का आबकारी विभाग एक तरफ नशे को बढ़ावा देने में लगा रहता है तो साथ ही मद्य-निषेध विभाग इसे रोकने में। यह कैसा अंतर्विरोध है, यह कैसा विरोधाभास है? क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि सरकार का ही एक अंग नशा बिकवाने में मशगूल रहता है और दूसरा रुकवाने में। यानी मामला आह शराब और वाह शराब का है। एक तरफ सरकारें खजाना भरती हैं और दूसरी ओर नशा-विरोधी अभियानों में खाली करती हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि एक विभाग मद्य निषेध का है और दूसरा आबकारी का। एक विभाग शराब छोड़ने के तौर-तरीके बताता है। शराब के आदती लोगों का माइंडवाश करता है। उन्हें शराब के नुकसान बताता है। उनका इलाज कराता है और दूसरा विभाग शराब की बिक्री करवाता और उससे सरकार के लिए आबकारी टैक्स जुटाता है। सरकार के स्वभाव का यह विरोधाभास सभी राज्यों में है। लॉकडाउन में शराब बिक्री के लिए मदिरालय खोलने की सर्वप्रथम मांग कांग्रेस नीत पंजाब सरकार ने ही की थी। सवाल है कि क्या किसी सरकार को अपने ही राज्य के बाशिंदों की सेहत से खेलने की इजाजत सिर्फ इसलिए मिलनी चाहिए, क्योंकि इससे उसका खजाना भरता है।

सवाल है कि अगर नशाखोरी से राज्य के लोगों का अहित हो रहा है तो ऐसी कमाई किस काम की? गुजरात में लंबे समय से शराबबंदी है। बिहार में भी नीतीश सरकार ने शराबबंदी कर रखी है। क्या इससे इन राज्यों में राजस्व की कमी हो गई है? वैसे एक तथ्य यह भी है कि भले ही इन दोनों राज्यों में शराबबंदी है लेकिन शराब तस्करों के पौ बारह हैं। जानकारों के मुताबिक प्रत्येक ब्रांड की शराब बड़ी आसानी से उपलब्ध है। खैर राजस्व जुटाने की दलील में कितनी सच्चाई है यह तो नहीं पता लेकिन वास्तविकता यह है कि तमाम राज्यों में शराब लॉबी व राजनेताओं का नापाक गठजोड़ सरकारों को उनके सामने झुकने को विवश कर देता है। अपने ही राज्य के लोगों की जिंदगी और सेहत की तबाही की कीमत पर नशाखोरी का यह चलन गहरी चिंता का विषय है।


 
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