युगवार्ता

Blog single photo

जीते पर, लक्ष्य से पीछे

13/11/2019

जीते पर, लक्ष्य से पीछे

सुधीर जोशी

भाजपा व शिवसेना के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटों से कहीं अधिक सीटे हैं, लेकिन यह सच्चाई है कि दोनों ही पार्टियां 2014 की संख्या बरकरार नहीं रख पाईं।

भाजपा, शिवसेना के पास सरकार बनाने के लिए जितनी सीटें चाहिए, उससे कहीं ज्यादा सीटें हैं। हां, इतना जरूर है कि विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या पिछली बार की तुलना में इस बार कम रहेंगी। वहीं दूसरी ओर 2014 के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतकर राकांपा तथा कांग्रेस गठबंधन पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूती से विधानसभा में सरकार के खिलाफ आवाज उठाने में सक्षम होगी। राज्य के मतदाताओं ने कांग्रेस तथा राकांपा दोनों को ताकतवर बनाया है। सन 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 42 तथा राकांपा को 41 सीटें मिली थी। हालांकि राकांपा तथा कांग्रेस को 2009 के विधानसभा चुनाव जैसी सफलता नहीं मिल पायी, लेकिन उन्होंने अपनी हालत में 2014 के मुकाबले जरूर सुधार किया है।
राकांपा सुप्रीमो शरद पवार की सक्रियता ने चुनाव परिणाम बदलने में अहम भूमिका अदा की है। शरद पवार की भरी बरसात में ली गई सभा ने पूरा चुनावी गणित ही बदल दिया। मतगणना के बाद हालांकि दिल्ली में नरेंद्र और मुंबई में देवेंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा भले ही सच साबित होने जा रही हो पर हकीकत की धरातल पर देखा जाए तो भाजपा का प्रदर्शन 2014 के मुकाबले उतना अच्छा नहीं है। भाजपा ने अपने बूते पर 140 से ज्यादा सीटें जीतने का सपना देखा था, लेकिन वह संभव नहीं हो पाया, इतना ही नहीं अबकी बार 220 के पार का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका। भाजपा शिवसेना दोनों ही 2014 का आकड़ा भी नहीं छू पाईं। दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव में राकांपा तथा कांग्रेस दोनों को मिली सफलता पर संतोष व्यक्त करते हुए शरद पवार ने कहा कि भाजपा द्वारा दूसरे दलों के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करना मतदाताओं को पसंद नहीं आया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत केंद्र के कई वरिष्ठ मंत्रियों की सभाएं होने के बावजूद महायुति का अपना लक्ष्य पूरा न कर पाना यही बता रहा है कि मतदाताओं ने राज्य के वर्तमान नेतृत्व के कामकाज को उतना पसंद नहीं किया, जितना मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत भाजपा के अन्य नेता अपनी सभाओं में बता रहे थे। राजनीतिक पंडितों का यह भी दावा है कि चुनावी जंग में आदित्य ठाकरे के उतरने के कारण शिवसेना संतोषजनक सीटें जीतने में सफल रही है। दूसरी तरफ इस चुनावी जंग में उतरे मनसे तथा वंचित बहुजन आघाड़ी को सिरे से नकारने वाली महाराष्ट्र की जनता ने कांग्रेस के मुकाबले राकांपा को ज्यादा महत्व दिया।
यही कारण है कि भाजपा नेताओं द्वारा पूरी ताकत लगाने के बावजूद बारामती से अजित पवार ने भाजपा के उम्मीदवार को 60 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से हराया। चुनावी जंग में परली से भाजपा प्रत्याशी तथा राज्य की परिवार कल्याण मंत्री पंकजा मुंडे तथा मुक्ताईनगर से एकनाथ खड़से की पुत्री रक्षा खड़से की पराजय से भाजपा को करारा झटका लगा है। पंकजा मुंडे को उनके चचेरे भाई तथा राकांपा नेता धनंजय मुडे ने परली से हराकर अपने बढ़े हुए राजनीतिक कद का एहसास करा दिया है। मुक्ताई नगर विधानसभा क्षेत्र से एकनाथ खडसे की पुत्री रक्षा खड़से को उम्मीदवारी तो दी गई, लेकिन वे अपनी सीट नहीं बचा सकीं। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का कहना है कि 2019 के चुनाव परिणाम सभी राजनीतिक दलों की आंखे खोलने वाले हैं।
मतदाताओं ने अपना फैसला सुना दिया है और आने वाले दिनों में क्या होगा यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि पिछली बार के मुकाबले इस बार सरकार में शिवसेना की हिस्सेदारी ज्यादा होगी और बहुत संभव है कि राज्य की नई सरकार में युवा सेना प्रमुख आदित्य ठाकरे को उपमुख्यमंत्री पद के अलावा गृहमंत्री का पद भी शिवसेना की झोली में जा सकता है। इस चुनाव का एक निष्कर्ष यह भी है कि राज ठाकरे की मनसे को मतदाताओं ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। बंचित 2 सीटें पाने में कामयाब भी हो गई लेकिन मनसे तो अपना खाता ही नहीं खोल पाई, यानि राज ठाकरे के भाषण को राज्य के मतदाताओं ने गंभीरता से नहीं लिया। इस जीत के बाद भी भाजपा तथा शिवसेना को यह विश्लेषण जरूर करना चाहिए कि उनका लक्ष्य पूरा क्यों नहीं हो पाया। सवाल है कि क्या भाजपा अकेले लड़ती तो उसे ज्यादा लाभ होता, इस पर भी विश्लेषण करना जरूरी जान पड़ता है।


 
Top