श्रीराम के दर्शन मात्र से ही इन्द्र व अहिल्या का उद्धार हो गया:  अतुल कृष्ण भारद्वाज
अयोध्या, 2 अप्रैल (हि.स.)। रामजन्मोत्सव पर श्रीराम जन्मभूमि परिसर के अंगद टीला पर श्री राम जन्मभूमितीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा आयोजित रामकथा के चतुर्थ दिवस पर बुधवार को कथा व्यास अतुलकृष्ण भारद्वाज महाराज ने कहा कि दुनिया भर के कौए गंदगी में वास कर
श्रीराम के दर्शन मात्र से ही इन्द्र व अहिल्या का उध्दार हो गया:  अतुल कृष्ण भारद्वाज


अयोध्या, 2 अप्रैल (हि.स.)। रामजन्मोत्सव पर श्रीराम जन्मभूमि परिसर के अंगद टीला पर श्री राम जन्मभूमितीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा आयोजित रामकथा के चतुर्थ दिवस पर बुधवार को कथा व्यास अतुलकृष्ण भारद्वाज महाराज ने कहा कि दुनिया भर के कौए गंदगी में वास करते हैं। परन्तु कागभुशुण्डीजी ने भगवान के जन्म के उपरान्त संकल्प किया कि जब तक भगवान पाँच वर्ष के नहीं हो जाएंगे। तब तक सब कुछ त्याग, मै अवध में ही वास करूंगा तथा राजा दशरथ के महल की मुंडेरी पर बैठ भगवान की बाल लीलाओं के दर्शन कर जीवन धन्य करूंगा। इसको वर्णित करते हुए सूरदास जी का प्रचलित भजन जन-जन की जिह्वा पर आज भी अंकित है।खेलत खात फिरै अंगना, पगु पैजनिया अरु पीली कछोटी । काग के भाग कहा कहिए, हरि हाथ से ले गयो माखन रोटी।

कागभुशुडी जी ने संकल्प लिया था कि भगवान के हाथ का जो झूठन गिरेगा। वही प्रसाद ग्रहण करूंगा। कथा व्यास महाराज ने कहा कि कागभुशुण्डी जी कोई सामान्य कौवा नहीं थे। उनकी दक्षता का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि भगवान भोलेनाथ जी भी कागभुशुण्डीजी से श्रीराम कथा सुनने स्वयं जाया करते थे। आगे की बाल लीला में भगवान श्रीराम के धूल में खेलने और राजा दशरथ के कहने पर माता कौशिल्या द्वारा धूलधूसरित प्रभू को उठाकर दशरथ जी के गोद में डालने का सुन्दर चित्रण किया।नामकरण की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यह नाम ही मनुष्य का भाग्य, भविष्य तय करता है। प्रभु श्रीराम का नाम लेने मात्र से ही मनुष्य धन्य हो जाता है। उन्होने कहा की हमारे समाज में जो बुराईयाँ व्याप्त है उनका कारण शिक्षा का अभाव ही है, आज जो भारत में शिक्षा दी जा रही है। वह संस्कृति के अनुरूप नहीं है। हमारी संस्कृति में शिक्षा धर्म से जोड़ने वाली, त्यागमयी जीवन जीने वाली, व दूसरों का हित करने वाली शिक्षा होती थी। बचपन का संस्कार व्यक्ति निर्माण में सहायक होता है। हमारे शास्त्रों में ग्रह नक्षत्र के आधार पर ही नामकरण करने की व्यवस्था थी। श्रीराम के नाम करण एवं भगवान श्रीराम के बचपन की लीलाओं का वर्णन किया गया। व्यास जी ने कहा हिन्दू धर्म में 16 संस्कार बताये गये हैं, इनमें नामकरण संस्कार भी है, यही संस्कार किसी भी बालक के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होते हैं। नाम ही मनुष्य का भाग्य भविष्य तय करता है। पूज्य व्यास जी ने कहा कि नाम भी राशि और ग्रह नक्षत्र के आधार पर होना चाहिए।जो आनन्द सिंधु सुख राशि सिकर त्रैलोक सुपासी। सो सुखधाम असनामा, अखिल लोकदायक विश्रामा ।

पूज्य व्यास जी द्वारा नामकरण संस्कार का वर्णन करते हुए कहा विश्व भरण पोषण कर जोई, ताकर नाम भरत अस होई इस चौपाई का जाप करने से घर में कभी भी दरिद्रता नहीं आती, परिवार में सुख बना रहता है। लच्छन धाम राम प्रिय, सफल जगत, आधार, गुरू वशिष्ट तेहि राखा लक्ष्मण नाम उदार। यह अपने लक्ष्य में लीन रहते हैं इनका लक्ष्य भगवान की प्राप्ति ही है।

जाके सुमरन ते रिपुनाशा, नाम शत्रुधन वेद प्रकाशा इस चौपाई के उच्चारण मात्र से ही हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है। कथा व्यास जी ने मनुष्य के चार प्रकार का सुन्दर वर्णन किया है- नर राक्षस - जो सदैव दूसरे को नुकसान पहुंचाते हैं, जो पापाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार, लूटपाट, अनेक पापों में लिप्त रहते हैं।नर पशु ये मनुष्य अपने जीवन को निरीह प्राणी की तरह जीते हैं जैसे तैसे अपने जीवन का यापन कर इस संसार को छोड़ जाते हैं। सामान्य नर-ये लोग अच्छा जीवन यापन करते हैं, अच्छे संस्कार परन्तु ये लोग न तो अच्छे का साथ देते हैं, व न तो बुरे लोगों को उनके कर्मों में रोकने व अच्छे सन्मार्ग में ले जाने का प्रयास करते हैं, केवल स्वयं का चिंतन करते हैं। नरोत्तम- ये मनुष्य में सबसे उत्तम प्राणी होते हैं, अपने जीवन से परोपकार धर्म, संस्कार, दूसरों की चिंता, समाज एवं राष्ट्र के चिंतन पर जीवन यापन करना इनका कार्य होता है।आगे की कथा व्यास जी अपने व्याख्या में बताये कि भगवान श्रीराम के दर्शन मात्र से इन्द्र एवं गौतम ऋषि के श्राप से शीला रूपी अहिल्या का उद्धार हो गया।इस दौरान पदमश्री प्रख्यात ज्योतिषाचार्य डा पंकज किशोर गौड़, मन्दिर व्यवस्थापक गोपाल राव ,भाजपा नेता वैश्य विनोद जायसवाल, टिकैतनगर नगरपालिका अध्यक्ष जगदीश गुप्ता ,राममंदिर पर 2005 में हुये आतंकी हमले को नाकाम करने वाले पूर्व इंस्पेक्टर अविनाश विशेष रूप से उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / पवन पाण्डेय