सूरत के बारोदिया गांव की मां-बेटी ने कम लागत में प्राकृतिक खेती में पाई सफलता
-सरलाबेन ने शिक्षक की नौकरी छोड़कर अपनी मां के साथ मिलकर शुरू की प्राकृतिक खेती -2.50 बीघा जमीन में केले व हल्दी की फसल तैयार कर हर माह कमा रही तीस हजार रुपये सूरत, 1 अप्रैल (हि.स.)। सूरत जिले की महुवा तहसील के बारोदिया गांव की 44 वर्षीय आदिवासी
बारोदिया गांव की सरलाबेन राठोड और उनकी मां नयनाबेन ने पिछले 3 वर्षों से गाय के गोबर और गौमूत्र आधारित जैविक खाद का उपयोग कर केले और हल्दी की प्राकृतिक खेती कर रही हैं।


बारोदिया गांव की सरलाबेन राठोड और उनकी मां नयनाबेन प्राकृतिक खेती से प्राप्त हल्दी की पिसाई कर पैकेट बनाकर आय प्राप्त करती हैं।


-सरलाबेन ने शिक्षक की नौकरी छोड़कर अपनी मां के साथ मिलकर शुरू की प्राकृतिक खेती

-2.50 बीघा जमीन में केले व हल्दी की फसल तैयार कर हर माह कमा रही तीस हजार रुपये

सूरत, 1 अप्रैल (हि.स.)। सूरत जिले की महुवा तहसील के बारोदिया गांव की 44 वर्षीय आदिवासी महिला किसान सरलाबेन राठोड और उनकी 65 वर्षीय मां नयनाबेन ने पिछले 3 वर्षों से गाय के गोबर और गौमूत्र आधारित जैविक खाद का उपयोग कर केले और हल्दी की प्राकृतिक खेती कर रही हैं। इस तरह की खेती से उन्हें उत्कृष्ट कृषि उत्पादन और आर्थिक समृद्धि प्राप्त हो रही है।

मांडवी प्रायोजन कार्यालय द्वारा संचालित ‘टिश्यू कल्चर बनाना योजना’ के तहत सरलाबेन को 2.50 बीघा जमीन में 1500 टिश्यू कल्चर केले के पौधे, 45 बैग सिटी कम्पोस्ट, 10 बैग यूरिया, 8 बैग पोटाश और अन्य फफूंदनाशक दवाएं प्राप्त हुईं। इस योजना की मदद से उन्होंने आत्मनिर्भरता हासिल की और सफलतापूर्वक केले की खेती शुरू की।

सरलाबेन राठोड कहती हैं, “2013 में पिता के निधन के बाद मैंने अपनी मां के साथ खेती में रुचि लेना शुरू किया और धीरे-धीरे मेरी दिलचस्पी बढ़ती गई। मैंने शिक्षक की नौकरी छोड़कर पूरी तरह से खेती करने का फैसला किया। इस दौरान मुझे आत्मा परियोजना कार्यालय से प्राकृतिक खेती की जानकारी मिली, जिसके बाद मैंने नवसारी कृषि विश्वविद्यालय में प्राकृतिक खेती पर आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया। वहां से ज्ञान प्राप्त करने के बाद मैंने पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाने का निर्णय लिया।”

प्राकृतिक खेती अपनाने की शुरुआत में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे बताती हैं, जब हमने प्राकृतिक खेती शुरू की तो आसपास के किसान हम पर हंसते थे और कहते थे कि महिलाएं खेती के लिए नहीं बनी हैं, वे घर के कामों के लिए होती हैं। लेकिन आज, हम उनसे बेहतर उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं और सम्मान भी पा रहे हैं।”

सरकारी सहायता से खेती में सफलता

सरलाबेन बताती हैं, वर्ष 2021-22 में मैंने केले के पौधों के लिए ऑनलाइन आवेदन किया, जो मंजूर हुआ और मुझे 1500 केले के पौधे प्राप्त हुए। इसके साथ ही, 45 बैग सिटी कम्पोस्ट, 10 बैग यूरिया, 8 बैग पोटाश और अन्य फफूंदनाशक दवाएं भी मिलीं। 2.50 बीघा भूमि में 1500 पौधों का रोपण किया और अब केले की फसल तैयार हो गई है।

खेती के खर्चों के बारे में उन्होंने कहा, निंदाई और खेत तैयार करने में कुल 80,000-90,000 रुपये का खर्च आता है, जिसमें से सरकारी सहायता मिलने के बाद मैंने लगभग 30,000 रुपये ही खर्च किए। 1500 पौधों से प्राप्त उत्पादन के आधार पर, मुझे केले की फसल से 13-15 रुपये प्रति किलो के भाव से लगभग 3 लाख रुपये की आय होगी। सभी खर्चों को घटाने के बाद मुझे लगभग 2.50 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा प्राप्त होगा।

हल्दी की खेती से अतिरिक्त आय

उन्होंने आगे बताया कि, केले के साथ-साथ हमने हल्दी की भी खेती की है। इस हल्दी को संसाधित कर हल्दी पाउडर तैयार किया जाता है और सोशल मीडिया के माध्यम से इसका विपणन किया जाता है। इससे हमें हर महीने 30,000 रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है।

राज्य सरकार की मदद से बनीं आत्मनिर्भर

सरलाबेन कहती हैं, राज्य सरकार की किसान-समर्थक योजनाओं के माध्यम से हम जैसे छोटे किसान भी आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। मुझे हल्दी पाउडर पीसने वाली पल्वेराइजर मशीन पर 22,140 रुपये, पावर टीलर मशीन पर 32,250 रुपये, झटका मशीन पर 10,000 रुपये और प्रेशर पंप मशीन पर 8,000 रुपये की सब्सिडी प्राप्त हुई है। इन सरकारी योजनाओं की मदद से मैंने आत्मनिर्भरता हासिल की है, और इसके लिए मैं सरकार का आभार व्यक्त करती हूं।

प्राकृतिक खेती को अपनाकर सरलाबेन राठोड और उनकी मां नयनाबेन न केवल खुद आत्मनिर्भर बनी हैं बल्कि वे अपने क्षेत्र और पूरे राज्य के किसानों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत बन गई हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिनोद पाण्डेय