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हल्द्वानी, 1 अप्रैल (हि.स.)। हिन्दू धर्म के आदि पंच देवों में एक रुप माता शक्ति का भी माना गया है। माता शक्ति को देवभूमि में मुख्य रूप से मां भगवती के रूप में माना गया है। वहीं हर हिन्दू माता शक्ति को पहाड़ों वाली माता के नाम से भी जानता है, ऐसे में देवभूमि यानि देवताओं की भूमि उत्तराखंड में देवी माता का विशेष निवास माना गया है। आज नवरात्रि के अवसर पर हम आपको देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल के पांच प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में बता रहे हैं। इन्हें आज भी अत्यंत चमत्कारी माना जाता है, जिसके प्रमाण समय समय पर मिलते भी रहते हैं...
नंदा देवी मंदिर: अल्मोड़ा में स्थित “नंदा देवी मंदिर” का एक विशेष धार्मिक महत्व है। यह मंदिर चंद वंश की “ईष्ट देवी” मां नंदा देवी को समर्पित है। मां नंदा देवी को “बुराई के विनाशक” के रूप में माना जाता है। इसका इतिहास 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है।
पूर्णागिरी मंदिर: चम्पावत में “मां पूर्णागिरि” का दरबार है। जो काली नदी के दांये किनारे पर स्थित है। टनकपुर से 19 किलोमीटर दूर यह शक्तिपीठ मां भगवती की 108 सिद्धपीठों में से एक है। यह अन्नपूर्णा चोटी के शिखर में लगभग 3000 फीट की उंचाई पर स्थापित है।
नैनादेवी मंदिर: यह मंदिर नैनीताल झील के उत्तरी छोर पर है। मान्यता है कि यहां आने वालों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। श्रावण अष्टमी व नवरात्रों में यहां मेला लगता है। यह देवी 51 शक्तिपीठों में से एक हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे।
हाट कालीका मंदिर: पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में प्रसिद्ध सिद्धपीठ हाट कलिका मंदिर है। यह भारतीय सेना के कुमाऊँ रेजीमेंट की आराध्य देवी हैं, जो रणभूमि में जवानों की रक्षक करती हैं। मान्यता है कि माता के दरबार में श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चनाकरने से माता समस्त रोग, शोक, दरिद्रता व विपदाओं को हर लेती हैं। मान्यता अनुसार माता हर रात यहां विश्राम करती हैं, जिससे हर रोज बिछाए जाने वाले बिस्तर में सुबह सिलवटें देखने को मिलती हैं। स्कंदपुराण के मानसखंड में भी इस मंदिर का वर्णन मिलता है।
कसारदेवी मंदिर: अल्मोड़ा में स्थित कसारदेवी मंदिर की ‘असीम’ शक्ति से नासा के वैज्ञानिक भी हैरान रह गए। अपनी अद्भुत चुंबकीय शक्ति के लिए प्रसिद्ध यह स्थान ध्यान और योग के लिए आदर्श माना जाता है। मां कत्यायनी माता के प्रकट होने के प्रमाण यहां की चट्टान में साफ दिखते हैं। माँ कत्यायनी, देवी दुर्गा का छठवां रूप हैं। यहां तक कि स्कंद पुराण में भी कसार देवी मंदिर के महत्व का वर्णन मिलता है।
पूर्णागिरी मंदिर समिति अध्यक्ष किशन तिवारी ने बताया कि ये सभी मंदिर हमारी आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं, वैसे भी देवी मां को पहाड़ों वाली माता ही कहा जाता है। भगवान शिव की अर्धांगिनी होने के कारण इनका भी वास यहीं है। पुजारी नंदा देवी मंदिर हरीश जोशी ने बताया कि मां भगवती की हमारी देवभूमि पर असीम कृपा है। ऐसे में वह यहां कई स्थानों पर अपने कई रूप धारण कर विराजमान हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / DEEPESH TIWARI