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उदयपुर, 29 मार्च (हि.स.)। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन के महाराणा सांगा को गद्दार कहने के विरोध में भारतीय इतिहास संकलन समिति उदयपुर की ओर से आयोजित परिचर्चा में इतिहासविदों ने ऐतिहासिक तथ्यों को संदर्भों के प्रकाश में प्रस्तुत कर सांसद के बयान को न केवल मिथ्या, अपितु अपने वोट बैंक में सस्ती लोकप्रियता पाने का एक उपक्रम करार दिया। लेकिन, उनके इस बयान से न केवल ऐतिहासिक तथ्यों पर सवाल खड़े हुए, बल्कि भारत माता के सच्चे सपूत की छवि पर इस तरह के बयान से हर मन आहत हुआ।
इतिहास संकलन समिति की ओर से शनिवार को आयोजित परिचर्चा में राजस्थान के संगठन मंत्री छगनलाल बोहरा ने कहा कि राज्यसभा में चर्चा के दौरान भारत सम्राट महाराणा सांगा पर बिना ऐतिहासिक संदर्भाें को जाने भारतीय संसद के उच्च सदन में बयान देने आपराधिक कृत्य है। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भों की साक्षी में कहा कि महाराणा सांगा ने बाबर के पास कभी कोई प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा। इसका प्रमाण यह है कि ऐसा विषय सिर्फ तुजुक-ए-बाबरी से मिलता है। इस पुस्तक का फारसी से हिन्दी अनुवाद मुंशी देवी प्रसाद ने किया है। वहीं, राणा सांगा के पुरोहित अक्षयनाथ की पांडुलिपि में बताया गया है कि बाबर ने राणा सांगा से इब्राहिम लोदी के खिलाफ सहायता मांगी थी। इसलिए इब्राहिम लोदी के खिलाफ राणा सांगा की जगह बाबर को राणा सांगा की आवश्यकता थी, यह स्पष्ट हो जाता है।
तुजुक-ए-बाबरी के सिवाय किसी अन्य पुस्तक में बाबर के पास महाराणा सांगा द्वारा अपने दूतों को भेजने को कोई उल्लेख नहीं मिलता। लेकिन, बाबर द्वारा स्वयं लिखित तुजुक-ए-बाबरी, अफगान इतिहासकार अहमद यादगार की पुस्तक तारीख-ए-सल्तनत-ए-अफगान, हुमायूं के निजी लेखक जौहर आफताबची, तजकिरत-उल-वाकियात और जहांगीर के दरबारी लेखक नियामतउल्ला की तारीख-ए-मखजन-ए-अफगान में दौलत खां लोदी व आलम खान के द्वारा बाबर को इब्राहिम लोदी पर आक्रमण करने का निमंत्रण देने के प्रमाण मिलते हैं। ऐसे में सिर्फ बाबर द्वारा लिखा गया दैनंदिनी बयान सत्य कसौटी पर खरा नहीं उतरता। उन्होंने कहा कि सांसद रामजीलाल सुमन ने सदन में कहा था कि इब्राहिम लोदी को हराने के लिए राणा सांगा बाबर को भारत लेकर आए थे। वह गद्दार थे। जो कि तथ्यहीन है।
दौलत खां लोदी के बाबर को बुलाने के प्रमाण
-इतिहासविद एवं चित्तौड़ प्रांत के महामंत्री डॉ. विवेक भटनागर ने कहा कि अफगानी इतिहासकार अहमद यादगार की पुस्तक तारीख-ए-सल्तनत-ए-अफगान में लिखा हुआ मिलता है कि बाबर काबुल में अपने बेटे कामरान के निकाह की तैयारी में मसरूफ है। उस समय दिल्ली में सुल्तान इब्राहिम लोदी सत्तासीन है। उसका चाचा दौलत खां लोदी पंजाब का सूबेदार है। सुल्तान ने अपने चाचा को देहली बुलाया। इस पर चाचा दौलत खां लोदी खुद नहीं जाता है और अपने बेटे दिलावर खान को भेजता है। दौलत खां की इस नाफरमानी से सुल्तान इब्राहिम लोदी चिढ़ जाता है और चचेरे भाई दिलावर खां को गिरफ्तारी करने का आदेश देता है। दिलावर वहां से जान बचा कर भागा और लाहौर अपने पिता को इसकी सूचना देता है। इस पर दौलत खां लोदी को आगे की परेशानी दिखाई देती है। वह जानता था कि सुल्तान उसे नहीं बख्शेगा। ऐसे में इब्राहिम लोदी को दिल्ली की गद्दी से उतार कर उस पर कब्जा करना ही एक साधन बचा था जो दौलत खां और उसके बेटे को बचा सकता था। दौलत खां लोदी ने तत्काल अपने बेटे दिलावर खान और आलम खान को बाबर से मुलाकात करने के लिए काबुल रवाना किया। दिलावर खां ने काबुल में पहुंच कर चारबाग में बाबर से मुलाकात की। बाबर ने उस से पूछा- तुमने सुल्तान इब्राहिम का नमक खाया है तो ये गद्दारी क्यों? इस पर दिलावर खां ने जवाब दिया कि लोदीयों के कुनबे ने चालीस साल तक दिल्ली की सत्ता संभाली है, लेकिन सुल्तान इब्राहिम लोदी सभी अमीरों के साथ बदसलूकी करता है। पच्चीस अमीरों को उसने मौत के घाट उतार दिया है। किसी को फांसी पर लटका कर तो किसी को जला कर मार डाला। अब सभी मीर उसके दुश्मन बन गए हैं और उसकी खुद की जान खतरे में है। उसे अनेक अमीरों ने बाबर से मदद मांगने भेजा है। निकाह में मसरूफ बाबर ने एक रात की मोहलत मांगी और चार बाग में इबादत की-‘ए मौला, मुझे राह दें कि हिन्द पर हमला कर सकूँ। अगर हिन्द में होने वाले आम और पान उसे तोहफे में मिलते हैं तो वह मान लेगा कि रब चाहता है कि वो हिन्द पर आक्रमण करे।
अगले दिन दौलत खां के दूतों ने शहद में डूबे अधपके आम उसे भेंट किये। ये देख बाबर उठ खड़ा हुआ और आम की टोकरी देख वो सजदे में झुक गया और अपने सिपहसालारों को हिन्द पर कूच करने का हुक्म दिया। इसके अलावा यह संदर्भ भी मिलता है कि दिलावर और आलम खां से मुलाकात के बाद बाबर ने महाराणा सांगा से इब्राहिम लोदी के खिलाफ मदद मांगी थी। इसके लिए उसने अपना दूत भी मेवाड़ राज दरबार में भेजा था, लेकिन सांगा ने उसकी मदद करने से बिल्कुल मना कर दिया।
ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता
-परिचर्चा में इतिहास संकलन के चित्तौड़ प्रांत अध्यक्ष डॉ. जीवन सिंह खरकवाल ने कहा कि बाबर अपनी पुस्तक बाबरनामा में यह रिकॉर्ड छिपा कर सांगा द्वारा पत्र लिखा जाना और हिन्द पर आक्रमण करने का न्यौता देने का जिक्र करता है। इस प्रकार की कहानी सिर्फ बाबरनामा में ही मिलती है और कहीं नहीं। इसलिए बाबर का रिकॉर्ड सत्य नहीं माना जा सकता। जबकि, दौलत खां के दूतों का काबुल जाना और उसका पत्र ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में उपलब्ध है। तजकिरत-उल वाकियात में हुमायूं का लेखक जौहर आफताबची और जहांगीर के काल में तारीख-ए-मखजने अफगना का लेखक नियामतुल्लाह दोनों ही दौलत खां लोदी के पत्र लिखने की बात का वर्णन करते हैं। नियामतउल्ला 1609 में जहांगीर के दरबार में काम करता है और इसमें दिल्ली के अफगान सुल्तानों तथा अफगानी कबीलों के बारे में पर्याप्त जानकारी देता है। इस ग्रन्थ में सुल्तान बहलोल लोदी से लेकर इब्राहीम लोदी तक के समय का वर्णन मिलता है। इतिहास संकलन समिति ने एक मत से पारित किया कि इन विषयों को विद्यालयी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
परिचर्चा में इन्होंने भी रखे विचार
-परिचर्चा में रमेश शुक्ल, चैनशंकर दशोरा, डॉ. महामाया प्रसाद चैबीसा, कौशल मूंदड़ा, डॉ. हेमेन्द्र चैधरी, डॉ. मनीष श्रीमाली, लव वर्मा आदि ने भी विचार रखे।
समिति ने किए बाबर के समर्थकों से सवाल
1. राणा सांगा इब्राहिम लोदी को दो बार खातोली और बाड़ी के युद्ध में पराजित कर दिल्ली के आस-पास समेट चुके थे। इसलिए इब्राहिम पर नियंत्रण के लिए उन्हें किसी बाबर की क्या आवश्यकता थी।
2. राणा सांगा के काल में मेवाड़ का अखिरी राजस्व गांव दिल्ली के निकट बुराड़ी था। तो इब्राहिम लोदी का दिल्ली में होना ही संशय पैदा करता है। बाबर द्वारा उसे दिल्ली का सुल्तान कहने पर प्रश्न चिह्न है।
3. बाबर स्वयं बाबरनामा में लिखता है उस वक्त भारत में दो बड़े काफिर राजा हैं, एक विजयनगर का कृष्णदेव राय और दूसरा राणा सांगा, ऐसे में राणा सांगा बाबर से मदद के बारे में सोचेंगे भी क्या।
4. बाबरनामा के अनुसार बाबर को लगता था कि उसकी भारत जीतने की इच्छा है, लेकिन इसमें प्रमुख बाधा महाराणा सांगा है। स्पष्ट है कि इब्राहिम लोदी के खिलाफ बाबर को राणा सांगा की आवश्यकता थी न कि राणा सांगा को बाबर की। ऐसे में राणा सांगा को बाबर से मदद की आवश्यकता का सवाल ही कहां पैदा होता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता