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-आधुनिक शिक्षा में आध्यात्मिकता के एकीकरण पर व्याख्यान
नई दिल्ली, 29 मार्च (हि.स.)। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (एआईसीटीई) ने ब्रह्मा कुमारीज के सहयोग से एआईसीटीई मुख्यालय में शनिवार को `आधुनिक शिक्षा में आध्यात्मिकता का एकीकरण: वर्तमान समय की आवश्यकता' विषय पर व्याख्यान आयोजित किया। इसमें प्रसिद्ध आध्यात्मिक वक्ता बीके शिवानी ने शिक्षा प्रणाली में आध्यात्मिकता के महत्व और इसके समग्र विकास पर प्रभाव को उजागर किया। कार्यक्रम में छात्र, एआईसीटीई के कर्मचारी और शिक्षा क्षेत्र के प्रमुख व्यक्ति उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि बीके शिवानी ने अपने संबोधन में अच्छे आचार-व्यवहार को अपनाने और ध्यान जैसी आध्यात्मिक प्रथाओं के माध्यम से तनाव और अवसाद से निपटने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की शुरुआत आत्म-जागरूकता से होती है, जिसे ध्यान के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। विद्यालय स्तर पर ही ध्यान को शामिल किया जाना चाहिए और इन्हें शिक्षकों एवं बच्चों को सक्रिय रूप से अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि स्थायी परिवर्तन लाया जा सके। सभी संस्थानों में एक काउंसलर होना चाहिए जो मानसिक स्वास्थ्य और अवसाद मामलों में छात्रों और शिक्षकों का मार्गदर्शन कर सके। इसके साथ ही संस्थानों को डिजिटल वेलनेस प्रोग्राम भी अपनाने चाहिए।
उन्होंने शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। एक सफल और संतुष्ट जीवन जीने के लिए उन्होंने आवश्यक चार प्रमुख सिद्धांत साझा करते हुए कहा कि संस्कार दुनिया को आकार देते हैं, विचार सृष्टि को आकार देते हैं, इच्छाशक्ति सफलता की कुंजी है और कर्म ही भाग्य को निर्धारित करता है। इन सिद्धांतों को अपनाकर व्यक्ति एक स्वस्थ, सुखी और सामंजस्यपूर्ण जीवन जी सकता है।
इससे पहले एआईसीटीई के अध्यक्ष प्रो. टी.जी. सीताराम ने छात्रों और शिक्षकों के समग्र विकास के प्रति परिषद् की प्रतिबद्धता पर जोर दिया। उन्होंने परिषद् की विभिन्न पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि परिषद् के सेल्फ लर्निंग प्लेटफॉर्म स्वयं पर ध्यान, योग, खुशी और पेशेवर नैतिकता पर पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। इससे छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलता है।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डी.पी. सिंह ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के महत्व पर प्रकाश डाला और कहा कि यह नीति न केवल छात्रों को ज्ञान से सुसज्जित करती है बल्कि आत्म-जागरूकता के माध्यम से उन्हें मानवता की प्रगति में अपना योगदान देने के लिए भी तैयार करती है। प्रोफेसर सिंह ने जोर दिया कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने में आध्यात्मिकता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह छात्रों को जीवन और शिक्षा के सच्चे उद्देश्य को समझने में सहायता करती है। यह कार्यक्रम शिक्षा के ढांचे में आध्यात्मिक शिक्षाओं के एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जो आधुनिक दुनिया में व्यक्तिगत और पेशेवर विकास का समर्थन करता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार