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अच्छी कहानी की कमी अश्लीलता से पूरी की जा रही है भोजपुरी फिल्म में : जावेद रहमान खान

By HindusthanSamachar | Publish Date: Jan 11 2019 5:08PM
अच्छी कहानी की कमी अश्लीलता से पूरी की जा रही है भोजपुरी फिल्म में : जावेद रहमान खान

आलोक

विशेष साक्षात्कार

पटना, 11 जनवरी (हि.स.)। अस्सी  के दशक में बिहार में भोजपुरी फिल्मों की नींव रखने वाले फिल्म लेखक और निर्देशक जावेद रहमान खान अब भले ही मिस्र सरकार के साथ मिलकर ‘लव इन कैरो’ जैसी फिल्मों का निर्माण कर रहे हों लेकिन बिहार के प्रति उनका प्रेम आज भी बरकार है। तभी तो इस फिल्म में उन्होंने बिहारी कलाकारों को भी मौका दिया है। फिल्म ‘लव इन कैरो’ तीन भाषाओं हिन्दी, अंग्रेजी और अरबी में बनी है और बहुत जल्द ही रिलीज होने वाली है। इतना ही नहीं इंडो-मोरक्को फिल्म को-प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली एक अन्य विदेशी फिल्म में भी उन्होंने बिहारी कलाकारों को मौका दिया है।

अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. जावेद रहमान खान ऑस्कर फिल्म पुरस्कार के निर्णायक मंडल के सदस्य भी रह चुके हैं और फिल्मों के सिलसिले में कई मुल्कों का दौरा भी कर चुके हैं। 'हिन्दुस्थान समाचार' के साथ एक खास बातचीत में उन्होंने वर्तमान में भोजपुरी फिल्मों के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करने के साथ ही देश और दुनिया के फिल्म जगत से जुड़े कई पहलुओं पर खुलकर चर्चा की। पेश हैं उनसे की गई बातचीत के मुख्य अंश।

हि.स. : आप तो भोजपुरी फिल्मों के स्वर्ण युग से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में भोजपुरी फिल्मों में परोसी जा रही अश्लीलता के बारे क्या कहेंगे?

जावेद रहमान : मेरी पहली भोजपुरी फिल्म थी “बाजे शहनाई हमार”। 1980 में रिलीज हुई थी। उस समय नाजीर हुसैन और सुजीत कुमार जैसे लोग भोजपुरी फिल्म बना रहे थे और उनमें खुद भी काम कर रहे थे। बिहार से गिरीश रंजन, तपेश्वर प्रसाद और शिवेंद्र सिन्हा जैसे लोग भोजपुरी फिल्मों में सक्रिय थे। वो लोग समाज को गहराई से समझते थे। फिल्म बनाने के पहले कहानी और स्क्रिप्ट पर खूब मेहनत करते थे। हर चीज का बारीकी से ख्याल रखा जाता था। अब सबकुछ उलट गया है। पहले लोग स्टार इंतजाम करते हैं और फिर कहानी की तलाश करते हैं। कहानी के नाम पर इनके पास बॉलीवुड फिल्मों की नकल करने के आलावा कुछ नहीं होता है।इस समय भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की प्रक्रिया में अश्लीलता को भी महत्व दिया जा रहा है। अच्छी कहानी की कमी को अश्लीलता परोस कर पूरा करना चाहते हैं।

हि.स.: भोजपुरी फिल्मों के गानों का भी स्तर काफी गिरा है। क्या कारण है?

जावेद रहमान : असल बात यह है कि अब भोजपुरी फिल्मों में बेहतर और कलात्मक तरीके से सोचने वाले लोग नहीं हैं। इनका बस एक ही मकसद होता है पैसा लगाओ और पैसा कमाओ। इसके लिए ये किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हैं। ऐसी हालत में गानों के स्तर में भी गिरावट लाजिमी है। जिस ट्रैक पर भोजपुरी फिल्में चल रही हैं उससे आप कुछ उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं। सब को पैसा बनाने की जल्दी है।

हि.स.: भोजपुरी फिल्मों से बॉलीवुड और बॉलीवुड से विदेशी फिल्मों तक का सफर आपका कैसा रहा?

जावेद रहमान : बिहार से निकलने के बाद मैं लंबे समय तक मुंबई में काम करता रहा। वहां कई फिल्मी संस्थाओं से भी जुड़ा रहा। वहां पर शुरुआत डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्मों से की थी। फिर हिन्दी फिल्म मैं तुम्हारी हूं, पद्मश्री, पुलिस केस, उनसे कह दो जरा, कानून तुम्हारा जंग हमारी, मजबूर तुम मजबूर हम जैसी फिल्मों को लिखने और निर्देशित करने का अवसर मिला। इस दौरान मैंने फिल्मों पर कई किताबें भी लिखी और लेक्चर देने के लिए दूसरे मुल्कों में भी जाने लगा। लेक्चर के दौरान ही मेरी मुलाकात मिस्र सरकार के कुछ अधिकारियों से हुई। उन्होंने मुझसे कहा कि क्या आप कोई ऐसी फिल्म बना सकते हैं जिसमें पूरा मिस्र दिखाई दे। उन्होंने मुझे महज 18 दिन में पूरी स्क्रिप्ट लिख कर लाने को कहा। और यहीं से ‘लव इन कैरो’ के निर्माण की भूमिका बनी। उनलोगों ने मेरी लिखी स्क्रिप्ट को काफी पसंद किया और इस फिल्म को बनाने के लिए हरी झंडी दे दी।

हि.स.: भोजपुरी फिल्म, बॉलीवुड फिल्म और विदेशों में बनने वाली फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया में क्या अंतर है ?

जावेद रहमान : भोजपुरी फिल्मों में संजीदा लोगों की कमी है। यही वजह है कि यहां पर मौलिक काम नहीं हो रहा है। सबकुछ नकल पर चल रहा है। बॉलीवुड फिल्मों में इंडिविजुअल प्रोड्यूसरों के दिन लद गये हैं। फिल्म निर्माण पर कॉरपोरेट वर्ल्ड का कब्जा हो चुका है। वे लोग अपने हिसाब से फिल्में बना रहे हैं। कहानी और स्क्रिप्ट के बजाये स्टार कास्ट पर जोर देते हैं जबकि विदेशों में आज भी फिल्म बनाने से पहले वहां के लोग हजार बार सोचते हैं। बेहतर स्टोरी और स्क्रिप्ट की तलाश करते हैं। फ्रांस में स्क्रिप्ट बैंक होता है। अगर आपके पास कोई अच्छी स्क्रिप्ट है तो स्क्रिप्ट बैंक में जमा कर दें। यदि किसी को पसंद आया तो पूरी फिल्म बनाने का खर्च एक बार में ही आपको मिल जाएगा। यहां एक बात आपको बता देना चाहता हूं कि फाइनेंस के मामले में सबसे ज्यादा अराजकता भोजपुरी फिल्मों में ही है। थोड़े से पैसे में ही फिल्म बनाना शुरु कर देते हैं और आगे चल कर पूरी फिल्म लटक जाती है।

हि.स.: अब तक बिहार में फिल्म का इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों नहीं डेवलप हो सका ?  क्या इसकी उम्मीद है ?

जावेद रहमान : फिल्मों को लेकर यहां की सरकारों की स्पष्ट समझ कभी नहीं रही। और जिस तरह के यहां के हालात हैं उसे देखते हुये लगता है कि आने वाले समय में भी फिल्म इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास नहीं हो सकता है। किसी कोने में कुछ जमीन एक्वायर करके स्टूडियो बना देने से कुछ नहीं होने वाला है। ऐसे लोगों को जो फिल्मों में सक्रिय हैं उनको यहां लाने और माहौल बनाने की जरुरत है। लेकिन जब यहां काम ही नहीं है तो वे आएंगे क्यों? हिन्दुस्थान समाचार

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