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समकालीन वैभव को आज भी प्रदर्शित कर रही कोलगढ़ी त्योंथर की पुरासम्पदा

By HindusthanSamachar | Publish Date: Feb 11 2019 3:09PM
समकालीन वैभव को आज भी प्रदर्शित कर रही कोलगढ़ी त्योंथर की पुरासम्पदा

विनोद

रीवा, 11 फरवरी (हि.स.)। जिले में अदिवासियों का अधिपत्य रहा है और उत्तर-प्रदेश की सीमा से लगा हुआ त्योंथर की कोलगढ़ी में मौजूद शैलचित्र, शैलाश्रम, पाषाण खंडित प्रतिमाएं, मठ, गढ़ी, तालाब एवं टीले आदि पुरा सम्पदा यह सिद्ध करती है कि यह अंचल आदिकाल से ही मानव सभ्यता एवं समकालीन सांस्कृतिक धरोहर का भी केन्द्र रहा है।

इस अंचल में शैव, शाक्त, एवं बौद्ध अनुयायियों का एक साथ सामंजस्यपूर्ण विकास एवं विस्तार हुआ है। यही कारण रहा है कि इस अंचल में आदिवासी राजाओं का शासन होने के तथ्य इतिहास के पटल पर सामने आ रहे हैं। त्योंथर की कोलगढ़ी को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने संरक्षित स्मारक घोषित किया था। यह कोलगढ़ी इस बात को सिद्ध करता है कि यहां कभी आदिवासी राजाओं ने भी राज्य किया था। त्योंथर के समीप स्थित सोहागी, चिल्ला, सहिजवार, अमिलकोनी आदि बौद्ध के समय में विकसित नगर की श्रेणी में थे।

यहां की पुरासम्पदा आज भी समकालीन वैभव को प्रदर्शित करती है। इस अंचल में विस्तृत तालाबों की श्रंखला नगर को मनोरम एवं जीवनोपयोगी बनाते थे। जिनके अस्तित्व आज भी देखे जा सकते हैं। त्योंथर नगर की प्राचीन बस्ती एक टीले पर स्थित है। यह टीला त्योंथर नगर पंचायत क्षेत्र की सामान्य धरातल से लगभग 10 मीटर ऊंचा है। त्योंथर में कई बार आई विनाशकारी बाढ़ में भी यह भू भाग कभी नहीं डूबा, जबकि इस बस्ती के चारों तरफ पानी भर जाता है। इसी टीले पर एक प्राचीन गढ़ी है जो पहले स्थानीय प्रशासन के आधीन थी अब राज्य शासन द्वारा कोलगढ़ी के रूप में संरक्षित कर दी गई है। गढ़ी की निर्माण अवधि 19वीं शताब्दी की है। मंदिर के समीप दिकपाल प्रतिमा, सरस्वती प्रतिमा, महिसासुर मर्दिनी प्रतिमा, शैव स्तम्भ एवं सूर्यनारायण आदि की खण्डित प्रतिमाएं हैं जो 11वीं शताब्दी की हैं।

त्योंथर की कोलगढ़ी का वर्तमान में जो स्वरूप है वह बघेल शासनकाल में बहुत कुछ संभव है। इस अंचल में 100 से अधिक शैल चित्र बने हैं जो लाल गेरू रंग के हैं। इन शैलचित्रों राजा और उसकी सेना का वर्णन है। चित्र में दिखता है कि एक मानव के सिर पर मुकुट लगा है संभव है कि वह समकालीन राजा या कबीले का सरदार हो। साथ ही तलवार लिऐ हुए सैनिक और चित्र भाला लेकर द्वारपाल के शैल चित्र मौजूद है। ढखरा जंगल के भित्ती चित्र को यदि सही मानें तो यहां आदिवासी राजा का राज्य मानव सभ्यता के विकास के साथ ही प्रारम्भ हो गया था। त्योंथर के समीप राजापुर गांव है जो यहां राजा की उपस्थिति को सिद्ध करता है। इसी गांव में छितरानाला के समीप एक प्राचीन मंदिर है जिसमें मोर्यकालीन ईंटों का उपयोग हुआ है।

जनश्रुति एवं साहित्यिक साक्ष्य से यह पता चलता है कि यहां आदिवासी राजा के बाद बेनवंशी राजा गंगा तट झूंसी से त्योंथर आए और त्योंथर में अपनी राजधानी बनाया। त्योंथर की गढ़ी को लेकर एक दंतकथा यह भी कही जाती है कि कोलगढ़ी में आदिवासी राजा का अधिकार था। झूंसी से बेदखल होकर आए वेन वंशी राजा को राज्य स्थापना एवं सुरक्षा की दृष्टि से किले की आवश्यकता थी वे आदिवासियों को युद्ध में सीधे पराजित करने की स्थिति में नहीं थे। ऐसी स्थिति में उन्होंने छलबल का सहारा लेते हुए गढ़ी में निवासरत आदिवासी राजा की कन्या से विवाह का प्रस्ताव रखा। वेनवंशी राजा की सेना बाराती बनकर किले में प्रवेश कर गई और बारात के रास-रंग में मदहोश आदिवासी राजा को मारकर किले पर कब्जा कर लिया।

हिन्दुस्थान समाचार

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