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जयप्रकाश नारायण जयंती : गांधी यदि हिमालय थे तो “जेपी” एवरेस्ट

By HindusthanSamachar | Publish Date: Oct 9 2018 8:21PM
जयप्रकाश नारायण जयंती : गांधी यदि हिमालय थे तो “जेपी” एवरेस्ट
राम बहादुर राय ‘पद्मश्री’
 
लोकनायक जयप्रकाश नारायण  के साथ करीब 10-11 साल तक कुछ दूरी से कुछ नजदीक से साथ काम करने का मुझे मौका मिला. उनके साथी और उनको मानने वाले दोनों तरह के लोग उन्हें जेपी कहते थे. जब उन्हें 10-11 साल का बच्चा भी जेपी कहता था तो उनके चेहरे पर कोई इस तरह का भाव नहीं आता था कि वे उन्हें कोई विशेषण लगा कर क्यों नहीं पुकारते. जेपी के व्यक्तित्व की यह विशेषता थी.
 
5 जून 1974 की घटना है. उन्होंने संपूर्ण क्रांति का उन्होंने जैसे ही नारा दिया. पटना के गांधी मैदान में बड़ी सभा थी. लोग याद करते हैं गांधी मैदान की वह सभा उसी तरह की थी जिसकी तारा जी ने दिनकर की कुछ पंक्तियां सुनाकर याद किया.  1946 में जब जेपी आगरा की जेल से छूटकर दिल्ली होते हुए पटना आए थे, तब गांधी मैदान जितना भरा था उससे भी ज्यादा 5 जून 1974 को गांधी मैदान भरा. उस विशाल सभा को देखकर लगता है स्वत: सरस्वती ने, महात्मा गांधी और ईश्वर ने उन्हें प्रेरणा दी और उन्होंने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया. जेपी के आगे एक शब्द जुड़ा लोकनायक.
 
लोकनायक उनके नाम से ऐसा जुड़ा जैसे मोहनदास करमचंद गांधी के साथ महात्मा जु़ड़ा. जब मैं गांधी और जेपी की बात करता हूं तो मैं पाता हूं कि महात्मा गांधी 1948 में चले गए, लेकिन यदि महात्मा गांधी का विस्तार अगर देखना हो तो जेपी में पाया जा सकता है.  1948 में बाद महात्मा गांधी जो-जो करते यदि उसकी कोई कसौटी बनाई जाए तो देखेंगे वही जेपी ने किया. पुरानी पीढ़ी जेपी को जानती है. नई पीढ़ी के लिए सवाल हो सकता है जे पी कौन थे? क्या थे उनके सपने? उनका यश अक्षुण्ण रहेगा या नहीं? किन कारणों से वे लोकनायक बने? भारत के नव निर्माण से उनके सपनों का क्या कोई नाता है? ऐसे तमाम सवाल हो सकते हैं.
 
आइए जेपी को जाने और समझे. उनके तप त्याग से नाता जोड़े जो आदमी भारत का प्रधानमंत्री हो सकता था उसने सत्ता की राह नहीं ली. ये मैं अपनी ओर से बढ़ा चढ़ाकर कल्पना लोक की बात नहीं कर रहा हूं. हो सकता है कि भले ही आज सत्ता का राजनीति का जैसा माहौल बन गया है उसमें कोई कल्पना भी नहीं करे कि क्या जेपी ने ऐसा किया. लेकिन यह हकीकत है. यह इतिहास का तथ्य है.
 
जयप्रकाश और जवाहरलाल नेहरु के भाईयों जैसे संबंध थे. जयप्रकाश उनको बड़ा भाई कहते थे. 1953 में नेहरु ने जेपी से कहा कि तुम और तुम्हारे साथी मंत्रिमंडल में आ जाओ. मान लीजिए यदि जेपी जवाहर लाल के मंत्रिमंडल में जाते तो 1964 में क्या जेपी उनके उत्तराधिकारी नहीं हो सकते थे. हो सकते थे, क्योंकि लाल बहादुर शास्त्री से जेपी का कद बड़ा था.
 
सवाल उठता है कि क्यों जेपी ने उनका प्रस्ताव ठुकराया. जेपी के सपनों को जानने के लिए मैं एक छोटी सी घटना बताना चाहता हूं.
 
वर्धा सेवाग्राम से 13 किलोमीटर दूर धाम नाम की एक नदी है. उसके किनारे एक आश्रम है जिसका नाम पवनार आश्रम है. विनोबा भावे को जब महात्मा गांधी ने 1940 में उन्हें पहला सत्याग्रही घोषित किया तो उसी धाम के किनारे व्यक्तिगत सत्याग्रही के लिए झंडा लेकर भ्रमण किया और सत्याग्रही माने गए. बाद में विनोबा जी ने आश्रम बनाया और वह महिलाओं का आश्रम था.
 
एक दिन जेपी वहां गए. आश्रम की महिलाओं ने उन्हें घेर लिया. महिलाओं ने उनसे पूछा आपके जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा क्या है. यह तब की बात है जेपी वहां विनोबा से मिलने गए थे. बिहार आंदोलन उठान पर था और दिख रहा था कि विनोबा इंदिरा गांधी के साथ खड़े होने जा रहे थे.
जेपी विनोबा से यह कहने गए थे कि आप संपूर्ण क्रांति आंदोलन के साथ खड़े होइए. महिला आश्रम की महिलाओं ने उनसे पूछा कि आपके जीवन की सबसे बड़ी महत्वकांक्षा थी. वे जो जवाब देते हैं उसीमें जेपी का सपना छुपा हुआ है.
 
जेपी ने कहा कि जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था गांधी युग की शुरुआत नहीं हुई थी, तब बंगाल के एक क्रांतिकारी के संपर्क में आया. क्रांति को समझने के लिए सुबह नहा-धोकर गीता पढ़ता था. गीता में से क्रांति को समझने की कोशिश करता था. जब मैं गीता पढ़ता था उस समय वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा थी. जब गांधी युग शुरु हुआ और गांधी को मैंने सुना तो स्वाधीनता मेरे जीवन में आ गई और स्वाधीनता मेरा सबसे बड़ा सपना हो गया.
 
उसी बातचीत में जेपी कहते हैं कि जब आजादी मिली तो कांग्रेस से अलग हटकर सोशलिस्ट पार्टी बनाई, चुनाव लड़वाता था लेकिन कभी इस बात का ख्याल नहीं आया कि चुनाव लड़ना है. इसलिए जब जवाहर लाल नेहरु ने उनसे कहा होगा कि मंत्रिमंडल में आ जाओ तो उन्होंने सोचा होगा कि यह हमारा काम नहीं है.
 
फिलिप नोएल बेकर का नाम सुना होगा. इस व्यक्ति को बहुत साल पहले नोबल का शांति पुरस्कार मिला था और उस विश्वविख्यात बेकर ने अपने साहित्य और भाषणों में लिखा है कि मैं भारत को तीन बातों के लिए याद करता हूं-हिमालय, गांधी और जेपी.
 
यदि आज बेकर होते तो मैं उनसे कहता कि यदि गांधी अगर हिमालय हैं तो जेपी हिमालय की वह चोटी है जिन्हें एवरेस्ट कहते हैं. हिमालय की पर्वतमाला में जो सबसे ऊंची चोटी है वह एवरेस्ट है. गांधी से जुड़े जो नाम है उन नामों में यदि जेपी को बिठाकर देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ऊंची चोटी का नाम जेपी है.
इस अर्थ में मैं जेपी को गौरी- शंकर कहता हूं. क्रांतिकारी जीवन गाथा का प्रारंभ स्वाधीनता संग्राम के गांधी युग से पहले ही होता है. जब वे हाईस्कूल में पढ़ते थे तभी से उनके दिमाग में क्रांति का कीड़ा था वह 1979 तक बना रहा. वे जीवन के हर पड़ाव पर वे क्रांति की मशाल लेकर आगे बढ़े.
 

(कोलकता में  कर्मयोगी जुगल किशोर जेठालिया स्मृति व्याख्यान के तीसरे आयोजन के मौके पर  “‘जेपी के सपनों का भारत” विषय पर  दिया गया “हिन्दुस्थान समाचार” के समूह संपादक राम बहादुर राय के व्याख्यान का अंश) 

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