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पैदा भी नहीं हुए “जियो इंस्टीट्यूट” को मिल गया “प्रतिष्ठित संस्थान” का दर्जा, बढ़ा विवाद

By HindusthanSamachar | Publish Date: Jul 10 2018 4:13PM
पैदा भी नहीं हुए “जियो इंस्टीट्यूट” को मिल गया “प्रतिष्ठित संस्थान” का दर्जा, बढ़ा विवाद

नई दिल्ली,10 जुलाई (हि.स.)। देश के सबसे बड़े उद्योगपति गुजराती मुकेश अंबानी का विश्वस्तरीय शैक्षणिक संस्थान “जियो इंस्टीट्यूट” अभी केवल कागज पर है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसको देश के 6 “प्रतिष्ठित संस्थान” में से एक का दर्जा दे दिया है। इन संस्थानों में से दुनियाभर में प्रसिद्ध इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस बेंगलुरू, आईआईटी मुंबई, आईआईटी दिल्ली हैं। ये तीन सरकारी संस्थान हैं, जिन्होंने बहुत पहले से ही अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर रखी है।

सरकारी तंत्र द्वारा इन्हें बहुत ही उत्तम गुणवत्ता वाले शिक्षण संस्थान का तगमा दिये जाने, प्रतिष्ठित संस्थान घोषित करने या नहीं करने से इनके साख पर कोई फर्क नहीं पड़ता। इनके अलावा बाकी जो 3 हैं, वे देश के बड़े निजी शिक्षा व्यवसाइयों,उद्योगपतियों के हैं। ये हैं डा. टीएमए पाई का मनीपाल एकेडमी आफ हायर एजुकेशन, बिड़ला का बिट्स पिलानी और मुकेश अंबानी का अभी जो गर्भ में है, पैदा भी नहीं हुआ है,बना भी नहीं है, केवल कागज पर है “जियो इंस्टीट्यूट”।

मुकेश अंबानी के रिलायंस फाउंडेशन के अंतर्गत भविष्य में बनने वाले “जियो इंस्टीट्यूट” को “प्रतिष्ठित संस्थान” की श्रेणी में रखने के लिए गजब की शब्दों की बाजीगरी की गई है। इसे संभावित नए “प्रतिष्ठित संस्थान” की श्रेणी में रखा गया है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और “प्रतिष्ठित संस्थान” चुनने वाले पैनल के अध्यक्ष पूर्व चुनाव आयुक्त ए.गोपालस्वामी के इस कारनामे पर राजनीतिकों के अलावा शिक्षा व उद्योग जगत के लोग भी हतप्रभ हैं। इनमें ज्यादातर का कहना है कि यह हो क्या रहा है। इस बारे में गोपाल स्वामी का तर्क है कि यह (जियो इंस्टीट्यूट) केवल एक मात्र परियोजना प्रस्ताव मिला था जिसे हमने व्यावहारिक व करने योग्य पाया। इसे ध्यान में रखते हुए उसे अभी केवल इस आशय (“प्रतिष्ठित संस्थान”) की मान्यता देने का पत्र दिया गया है। उसे अभी “प्रतिष्ठित संस्थान” की मान्यता नहीं दी गई है। जब वह ( जियो इंस्टीट्यूट ) सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर देगा, तो उसको इस आशय का पत्र दिया जाएगा कि 3 वर्ष की समय सीमा में यदि वह संस्थान को बना देगा, उसके बाद उसको “प्रतिष्ठित संस्थान” का दर्जा दे दिया जाएगा।

इस बारे में कुछ उद्योगपतियों व नेताओं का कहना है कि ए. गोपाल स्वामी अपना और केन्द्र सरकार तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय मंत्री के फेस सेविंग के लिए यह तर्क दे रहे हैं। उनके इस तर्क में कोई दम नहीं है। सरासर जनता की आंख में धूल झोंकने वाला है। इस प्रोजेक्ट पर बैंकों से मोटा ऋण दिलाने की खेल वाला है। बड़े विदेशी शिक्षण संस्थानों से भागीदारी में सहयोग बढ़ाने वाला है, क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय के पत्र का उपयोग रिलायंस फाउंडेशन एक साख के तौर पर करेगा।

इस बारे में एक पूर्व कुलपति का कहना है कि एयरटेल के मालिक ने सत्य भारती विश्वविद्यालय,दिल्ली और वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल ने वेदांता विश्वविद्यालय, ओडिशा को “प्रतिष्ठित संस्थान” घोषित करने के लिए आवेदन दिया था। ऐसे अन्य तमाम विश्वविद्यालयों ने आवेदन दिया था, जो बहुत अच्छे हैं । लेकिन उनको नहीं दिया गया और पैदा भी नहीं हुए “जियो इंस्टीट्यूट” के लिए “प्रतिष्ठित संस्थान” का दर्जा एडवांस में आरक्षित कर दिया गया। यह तो हद ही कर दिया गया।

इस बारे में कांग्रेस महासचिव शक्ति सिंह गोहिल का कहना है कि मुकेश अंबानी के पैदा भी नहीं हुए संस्थान “जियो इंस्टीट्यूट” को पैदा होने के 3 साल पहले से ही “प्रतिष्ठित संस्थान” का दर्जा आरक्षित कर देना, शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता का मानक तय करने वाले सरकारी संस्थानों, व्यक्तियों की ईमानदारी पर बट्टा लगाने वाला कार्य है। इससे इनकी ईमानदारी की कलई खुल गई है। इससे मानव संसाधन विकास मंत्रालय और यूजीसी की कार्य पद्धति व साख संदेह के घेरे में आ गई है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्री, उनका मंत्रालय और उनके बास क्या कर रहे हैं।

हिंदुस्थान समाचार/कृष्णमोहन

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